Thursday, April 16, 2020

बचा लो भगवन

बड़ा भयंकर रोग है छाया।
सबके मन में भय समाया।

यह कैसी आयी महामारी।
जिससे डरती दुनियाँ सारी।

नागिन से भी यह भयंकर।
बिन देखे सब भागे डरकर।

सब जन थर-थर काँप रहे हैं।
कहाँ तक पहुँची भाँप रहे हैं।

अपने घर में हैं छुपकर बैठे।
मित्र जनों से हम रहते ऐठे।

महीने भर से हैं कैद पड़े हम।
घर में भी भयभीत खड़े हम।

मानव से अब मानव हैं डरते।
नाक-मुँह को ढककर रखते ।

मिलने-जुलने से हैं कतराते।
पास जाने से भी हैं घबराते।

आकर हमें बचा लो भगवन।
भय से मुक्त करा दो भगवन।

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             १४/०४ /२०२०

Tuesday, April 14, 2020

उम्मीद न छोड़ो ( गजल )


अकेले खड़े हो मुझे तुम बुला लो।
मायुस क्यों हो ,जरा मुस्कुरा लो।

रात है काली और अँधेरा घना है,
तम दूर होगा तू दीपक जला लो।

उम्मीद न छोड़ो, मंजिल  मिलेगी,
जो मन में बुने हो सपने सजा लो।

देखो तो कितनी है रंगीन दुनियाँ,
इन रंगों को लेकर उर में समा लो।

रूठा न करना कभी भी किसी से,
रूठे हुए को जरा तुम मना लो।

पराये को अपना बनाना  कला है,
अपनों को अपने दिल में बसालो।

बुराई किसी की तू मन में न लाओ,
अच्छाईयों को भी अपना बना लो।

प्यार सिखाता जो वह गीत गाओ,
झंकार करता  गजल गुनगुना लो ।
           सुजाता प्रिय
           राँची झारखंड

Monday, April 13, 2020

सत्तु के गुण

सुन-सुन, सुन भाई सुन।
    सत्तु के हैं बड़े-बड़े गुण।
        बता रही सबको चुन-चुन।
           बनता है अनाजों को भुन।

  बहुत सरल आहार है यह।
       बना-बनाया तैयार है यह।
          खाने में बड़ा मजेदार है यह।
               भोजन का उपहार है यह।

शरीर में है ठंढक पहुँचाता।
    लू-गर्मी यह से हमें बचाता।
        बीमारियों को दूर भगाता।
 .          स्वस्थ्य-निरोग हमें बनाता।

गुथकर खाते ,घोलकर पीते।
    नमक, चीनी मिलाकर पीते।
        खूब सुहाती सत्तु-भरी रोटी।
   .        अच्छी लगती इसकी लिट्टी।

चने का सत्तु ,जौ का सत्तु।
   बहुत प्रकार के हो तो सत्तु।
       खा लो सत्तु औ पी लो सत्तु।
          आ बहना तुम भी लो सत्तु।
     
                सुजाता प्रिय (स्वरचित)
                      १४/०४/२०२०

बढ़ता जा (प्रेरणा गीत)

बढ़ता जा तू पग- पग प्रतिपल                   
जीवन भर बढ़ता जा।
मंजिल की गर राह न सूझे,
पंथ नया गढ़ता जा।

जीवन को तू करले रोशन।
खुशियोँ से तू भरले तन- मन।
इस दुनियाँ में रंग बहुत है ,
हर रंगों से रंग ले जीवन  ।
रंग लगाकर, प्यार जमाकर ,
कंचन-से मढ़ता जा।
बढ़ता जा.....

मारूत से तू बढ़ना सीखो ।
जल-धारा से बहना सीखो।
इस जीवन की राह बड़ी है ,
चंदा से तू चलना सीखो ।
अग्नि- धूम से शिक्षा लेकर ,
पर्वत पर चढ़ता जा ।
बढ़ता जा............

सुजाता प्रिय ,  स्वरचित, मौलिक

Thursday, April 9, 2020

हैवान

वह मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता।उसकी निगाहें निरंतर मेरा पीछा करती रहती है।मानसी खीज भरे लहजे में बोलते हुए रागिनी के पास बैठ गई।
   तुम मयंक की बात कर रही हो ? रागिनी ने पूछा।
हाँ और किसकी ? पहले तो सिर्फ कॉलेज में दिखता था।पर,अब तो मेरे मुहल्ले में भी दिखने लगा है। लगता है मेरे मुहल्ले में ही घर ले रखा है।घर से कभी भी बाहर निकलती हूँ, कहीं-न-कहीं वह मुझे घूरता हुआ नजर आता है।
दिखने में भी अजीव बहसी- हैवान-सा लगता है।रागिनी ने नफरत से मुँह बनाते हुए कहा।
हाँ ईश्वर ने उसे सूरत तो बहुत खराब नहीं दिया है ,पर उसके चेहरे के भाव इतने बुरे हैं कि वह दरिंदा -सा लगता है।
शैतान का नाम लो और शैतान हाजिर।रागिनी ने फुसफुसाते हुए आखों के इशारे से मानसी को उस ओर  दिखाया जिधर मयंक अपने दोस्तों के साथ अपनी लाल-लाल आँखों से उसे घूरता हुआ उस ओर चला आ रहा था।
चलो हमलोग उस पेड़ के नीचे बैठते हैं। उधर राजेश अपने साथियों के साथ बैठा है।मानसी  खुश होतीे हुई बोली और उठकर चल पड़ी।
हाँ ठीक कहती हो ।कम-से-कम उन दरिंदों से तो सुरक्षित रहेंगे।दोनो कॉलेज के पार्क में एक पेड़ के नीचे बैठ गई ।
थोड़ी देर बाद राजेश भी दोस्तों के साथ वहाँ पहुँच गया।सभी में बात-चीत होने लगी। उन लड़कों की चीकनी- चुपड़ी और रसीली बातों ने उनका मन मोह लिया। शुन्यकाल  समाप्ति की ओर था।राजेश के एक दोस्त ने प्रस्ताव रखा कि अगला क्लास हम नहीं करें। थोड़ी देर यहीं बैठकर  बात-चीत करेंगे।क्लास में पढ़ाया गया नोट्स किसी अन्य दोस्त से ले लिया जाएगा।
मानसी और रागिनी का भी मन बहल रहा था। इसलिए उनलोग भी ना नहीं कह सकीं । यहाँ मयंक का खौफ भी नहीं था।कुछ देर में उन्हें छोड़कर सभी छात्र क्लास में चले गए। पार्क में अब शांति और सन्नाटा छाया हुआ था।
रागिनी-मानसी भी बातों में मशगूल थी।
अचानक एक लड़के ने मानसी के बाजू में बैठते हुए कहा- यार आज मुड बड़ा रंगीन है।चलो कुछ मजा हो  जाए ।मानसी सहमकर चीख उठी। एक लड़के ने पीछे से उसके मुँह पर हथेली रखते हुए कहा-जरा भी मुँह से आवाज निकाली तो अंजाम बहुत बुरा होगा। दोनों सहेलियों की घींघी बंध गईं।उन्होंने सहायता के लिए राजेश की ओर देखा। उसने मुस्कुराते हुए  कहा- हमारी बात मान जा। हमलोग थोड़े न किसी से कहने जा रहे हैं।
अब मानसी और रागिनी को समझ में आ गया कि जिन्हें वे भला समझ रहीं थीं वे कितने बड़े शैतान हैं।वे वहाँ से भागना चाहीं पर उन्होंने उन्हें रोकते हुए कहा- जरा भी ना-नुकुर की  तो गोलियों से छलनी कर दी जाओगी।वे उन्हें झाड़ियों की ओर खींचने लगे।विरोध करने पर  पीटते चले जाते।
अब उनके पास भगवान को याद करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
तभी अचानक कुछ लड़के दौड़ते हुए उनकी ओर आए और राजेश तथा अन्य लड़कों पर कहर बनकर टूट पड़े। उन्हें पीटते हुए दोनों को उनकी चंगुल से छुड़ाए।
दोनों दल में जमकर मार- पीट एवं हाथा-पाई हुई।किसी ने पुलिस को फोन कर दिया।पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लियाऔर सभी ने बचाने वाले लड़के को शाबाशी दी।
मानसी ने देखा उन्हें बचाने वाले लड़के कोई और नहीं मयंक और उसके साथी थे। वह अजीव उलझन में पड़ गईं।जिसे वह वहसी हैवान समझती थीं,वह उनका रखवाला बना और जिसपर पूरा विश्वास करती थी वह बहसी और दरिंदा निकला।
मानसी ने रुंधे गले से कहा-मैं तुम्हारा  कर्ज जीवन भर नहीं चुका सकती मयंक।
लेकिन मैं तो कर्ज चुकाता रहुँगा बहन ! 
मानसी उसकी ओर देखने लगी।
मयंक ने कहा- अब से पहले मैं दूसरे शहर में रहता था।जहाँ इसी प्रकार मेरी बहन की इज्जत लूटी गई ।साक्ष्य छुपाने के लिए दरिंदों ने मेरी बहन को जलाकर मार डाला।तब से मैने यह संकल्प लिया कि यथासंभव मैं हर नारियों की इज्जत लुटने से बचाउँगा।इन बहसियों की शिकार हर नारी में मुझे अपनी बहन नजर आती है।और मैं उसकी रक्षा करने के लिए दौड़ पड़ता हूँ।मैं जब से यहाँ आया हूँ राजेश और उसके दोस्तों की नजरों में तुम्हारे लिए बुरे भाव देखे।इसलिए मैं हमेशा तुम्हारी रक्षा के लिए तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमता रहा।
मानसी सोंच रही थी- कितना दर्द छिपा है उसके दिल में और वह उसे हैवान समझती रही ।सचमुच किसी के रूप-रंग से किसी के मन के भावों का आकलन नहीं किया जा सकता कि वह हैवान है  या भगवान।
                       स्वरचित
                    सुजाता प्रिय
                १० .०४.२०२०

Wednesday, April 8, 2020

भक्त हनुमान को मेरा नमन है

चैत्र पूर्णिमा को जन्म लिए जो,
वीर हनुमान को मेरा नमन है।

शंकर सुवन केसरीजी के नंदन,
प्रतापी हनुमान को मेरा नमन है।

अंजनी के लाल पवन के लालन,
पुत्र हनुमान को मेरा नमन है।

जिनके हृदय में बसे राम-सीता,
सुहृदयी हनुमान को मेरा नमन है।

राम के चरणों में जो हैं सुशोभित,
भक्त हनुमान को मेरा नमन है।

जामवंत-सुग्रीव के संग में रहते,
मित्र हनुमान को मेरा नमन है।

लंका पहुँचकर सिया-सुधी लाए,
दूत हनुमान को मेरा नमन है।

रावण से कुपित हो,लंका जलाए,
गुणी  हनुमान को मेरा नमन है।

लक्ष्मण को जिलाने पर्वत लेआए,
महावीर हनुमान को मेरा नमन है।

भक्तों के बिगड़ी जो काम बनाते,
संकटमोचन हनुमान को मेरा नमन है।
                     सुजाता प्रिय
                     ०८ .०४.२०२०

Tuesday, April 7, 2020

हँसना नहीं जी


मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया।
बेफिक्र दिन-रात बिताता चला गया।

पहनने को कपड़े नहीं,तो कोई गम नहीं।
मुझे कोई गम नहीं,मुझे कोई गम नही।
मै बोरियों की शर्ट बनाती चला गया।

पैसे नहीं हैं जेब में तो कोई गम नहीं।
मुझे कोई गम नहीं,मुझे कोई गम नहीं।
मैं दूसरों की जेब उड़ाता चला गया।

पास नहीं है बाइक तो कोई गम नहीं।
मुझे कोई गम नहीं,मुझे कोई गम नहीं।
मैं दूसरे का बाइक चलाता चला गया।

हॉर्न नहीं है बाइक में तो कोई गम नहीं।
मुझे कोई गम नहीं, मुझे कोई गम नहीं।
मैं चम्मच से थाली बजाता चला गया।

दोस्त नहीं हैं पास में तो कोई गम नहीं।
मुझे कोई गम नहीं, मुझे कोई गम नहीं।
मैं मवालियों को दोस्त बनाता चला गया ।

भोजन नहीं है पास में तो कोई गम नहीं।
मुझे कोई गम नहीं, मुझे कोई गम नहीं।
मैं लंगर में लाइन बनाता चला गया।

रहने को घर नहीं है तो कोई गम नहीं।
मुझे कोई गम नहीं, मुझे कोई गम नहीं।
मैं मंदिरों में रात बिताता चला गया।
                  सुजाता प्रिय, राँची
                      ०७.०४.२०२०