बढ़ता जा तू पग- पग प्रतिपल
जीवन भर बढ़ता जा।
मंजिल की गर राह न सूझे,
पंथ नया गढ़ता जा।
जीवन को तू करले रोशन।
खुशियोँ से तू भरले तन- मन।
इस दुनियाँ में रंग बहुत है ,
हर रंगों से रंग ले जीवन ।
रंग लगाकर, प्यार जमाकर ,
कंचन-से मढ़ता जा।
बढ़ता जा.....
मारूत से तू बढ़ना सीखो ।
जल-धारा से बहना सीखो।
इस जीवन की राह बड़ी है ,
चंदा से तू चलना सीखो ।
अग्नि- धूम से शिक्षा लेकर ,
पर्वत पर चढ़ता जा ।
बढ़ता जा............
सुजाता प्रिय , स्वरचित, मौलिक