Monday, August 3, 2026

जब जिद ठान ली (संस्मरण)

जब ज़िद ठान ली 

मेरे मायके के गाँव में,दादाजी के जमाने में बहुत अच्छी खेती होती थीं। खेती के सारे साधन मौजूद थे। एक बार हमलोग वहांँ थे।मजदूरनियों के मुख से खेत में होने वाले कामों के बारे में सुनकर मन में उत्सुकता जागी कि खेती कैसे होती है देखना चाहिए। लेकिन दादा -दादी की शख्त हिदायत मिली कि लड़कियों को खेत की ओर नहीं जाना है। क्यों नहीं जाना है यह पूछने पर उन्होंने डराते हुए कहा -वहाँ बहुत सारे साँप-बिच्छू और भूत-प्रेत रहते हैं।बाल बिखराती  किच्चिनिया बैठी होती हैं जो बच्चों को पकड़कर झोली में बैठाकर ले जाती हैं। साँप -बिच्छू तथा भूत-प्रेत का नाम सुन मन में एक अलग जिज्ञासा जागृत हुई कि साँप-बेच्छू,भूत-प्रेत कैसे होते हैं।सभी लोग उनके बारे में कह कर डराते हैं।जरा एक बार देखूँ तो सही-"वे कैसे दिखते हैं।" बस हमने यह जिद्द ठान ली कि खेत देखने जरूर जाउँगी।
अन्य खेतों के अलावा हमारा एक जगह बाईस बिघे का एक प्लॉट था जहांँ उस समय खेती का काम चल रहा था।वह खेत घर से अधिक दूर था इसलिए हम दोनों बहनों ने आपस में तय किया कि जब दादाजी खेत की ओर जाएंँगे,हम उनके पीछे चल देंगे।जब दादाजी जाने लगे तो थोड़ी दूरी बनाकर हम भी छिपते-छिपाते खेत तक पहुंँच गयीं।वहाँ हमारे एक चाचा मोटर पंप को ठीक करवाने में लगे थे। उन्होंने हमें देखते ही पूछा तुम लोग क्यों आईं।उनकी बातें सुन दादाजी ने हमें प्यार से देखा तो तनिक गुस्सा कर हमें वहीं बैठाया और कहा -घर अकेली मत जाना जब हमलोग चलेंगे तब चलना।
   खेतों में ट्रैक्टर चलते देख हमने उसपर चढ़ाने की जिद की।चाचा ने कहा जाओ अंदर टेबल पर स्वीच बोर्ड है उसका हरा बटन दबा दो तब ट्रैक्टर पर चढ़ाएंगे।जब हमने हरा बटन दबाया तो मोटर चलने की बड़ी तेज आवाज हुई। घबराकर दोनों बहनें जोर से चीखती हुई एक-दूसरे से लिपट गई।दादाजी ने सोचा हमें करेंट लग गया। चाचा से गुस्से से कहा-मार दिया न दोनों को? चाचा ने जाकर जब हमें सही -सलामत देखा तो मन बहलाने के लिए  खेतों की ओर ले चले।एक खेत में घूसते ही हमें भूतों के दर्शन होने लगे। बिना सिर बारे भूत, खेतों में बोझ ढोते सिर्फ दो पैरों वाले भूत,खेतों में कीचड़ से नहाये, पौधे उखाड़ते भूत। पेड़ों पर झूलते और उछल-उछल कर चढते-उतरते हुए भूत।एक बूढ़ी खेत की क्यारी पर बैठी दो बच्चों को अपने पास पकड़कर बैठाई थी,उनके बाहर निकले बड़े-बड़े दातों को देख हमने उन्हें किचिन मान लिया।अब हमारी नजरें चारों ओर साँप-बिच्छू भी ढूंढ रही थीं।डर के मारे हम रोने लगीं। चाचा ने डाटते हुए कहा-और जिद्द ठानों खेत घूमने की।अभी तो सिर्फ भूत  देखी हो ।अब कभी आओगी तो पकड़कर ले भी जाएंगे अपने साथ। फिर उन्होंने हमें घर पहुंचा दिया।घर में हमारी खोज हो रही थी। पिताजी ने चाचा से हमारे खेत पहुँचने की सारी बात जानी। हमने डरते हुए उन भूतों के बारे में पिताजी को बताया। हमें इस प्रकार डरी-सहमी देखकर पिताजी दूसरे दिन हमें लेकर फिर खेत पहुंँचे। उन्होंने हमें मोटर का स्वीच ऑन- ऑफ करना सिखाया, फिर मकई के खेतों में खड़े पूतलों के बारे में बताया,कि यह मकई खाने आने वाली चिड़ियों को डराने के लिए लगाया जाता है।ताड़ -खजूर पर चढ़कर ताड़ी उतारने के बारे में बताया कि -कैसे वह आदमी हाथों को पेड़ के ऊपर बाधकर पैरों को ऊपर खीचते हुए चढता है और पेड से ताड़ी का लवनी उतार लाता है।बोझ उठाकर चलते मजदूरों को दिखाते हुए कहा ये जो फसलों के बोझे लेकर चल रहे इसलिए इनका आधा शरीर फंसलो के बोझ से ढका हुआ है ,ये सिर्फ दो पैर वाले भूत नहीं। इस प्रकार जब हमने ज़िद ठानी तो झूठे भूतों के बारे में बहुत सारी भ्रांतियां जानी।
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

2 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 06 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

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  2. वाह!! यह भी खूब रही

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