थका हारा शक्ति आकर शोफै पर बैठे गया।
शारदा ने पूछा क्या आ रही हैं लड़कियाँ ?
नहीं मम्मा मैने कम से कम पचीस- तीस घरों में जाकर ढूंढा ज्यादातर लोग बोले मेरे घर तो लड़की है ही नहीं।कुछ लोग बोले मेरी बेटी तो बुआ घर अथवा नानीघर गई है।कुछ बोले कन्यापूजन के लिए पंडाल गई है ।अब मैं कहाँ- कहाँ ढूंढू ? मुझसे अब यह नहीं होगा।
शारदा ने पूरे नौ दिन उपवास रखकर श्रद्धा पूर्वक माता रानी का पूजन तथा दुर्गा शप्तशती का पाठ किया। लोगों से सुनी कन्यापूजन से अभिष्ट फल की प्राप्ति होती है । सो उसने भी अपने दोनों बेटों को भेज दिया मुहल्ले की बच्चियों को बुला लाने।तीन घंटे से पूजन सामग्री तथा मिष्ठान लेकर बैठी है।पर एक भी बच्ची कन्यापूजन के लिए नहीं मिली।
आशा की किरण जगी। छोटा बेटा भक्ति ने घर में प्रवेश किया।क्या आ रही है भवानी ? उसने उतावलेपन से पूछा। नहीं मम्मा मैं तो कितनी देर इंतजार किया । वह जिसके घर जाती है वहाँ से उसे कोई अपने घर से जाता है। उसके घरवाले को भी नहीं पता वह किसके घर है ?
माँ - बेटों की बातें सुनकर सुशीलजी बाहर निकले।बोले रुको मैं अपने अॉफिस के सुशांत जी को फोन करता हूँ।वे अपने मुहल्ले की बच्चियों को लेकर आ जाएँगे।लेकिन फोन पर बातें करने के बाद उन्होंने कहा - सुशांतजी कह रहे हैं कि उन्हें भी कन्यापूजन के लिए लड़कियाँ नहीं मिली ।अंततः वे अपनी इकलौती बेटी को ही बैठाकर कन्यापूजन कर लिए।क्या जमाना आ गया ? अब तो टोले - मुहल्ले में भी लड़कियाँ नहीं मिलती । पहले तो घर परिवार में ही इतनी लड़कियाँ मिल जाती थीं।
शारदा का मन उदास हो गया।सोंची काश उसे भी एक बेटी होती, तो उसे ही बैठाकर कन्यापूजन कर लेती ।
लेकिन तुम्हें भी एक बेटी होती कैसे ? उसके अंतर्मन ने उसे उसकी अतीत की याद दिलाते हुए कहा । तुमने तो स्वयं अपने पेट में पल रही बच्चियों को नष्ट करवाया ।
लेकिन मैं करती भी क्या ? परिवार की यही इच्छा थी। उसने मन -ही-मन अपने मन से कहा ।
तुम उनका विरोध तो कर सकती थी? तुम जानती थी कन्या भ्रुण हत्या घोर अपराध है। इसके लिए हमारे देश में कितना सशक्त कानून बना है । तुम चाहती तो उसका सहारा लेकर अपने गर्भस्थ बेटियों को बचा सकती थी।
लेकिन ऐसा करने से मेरा पूरा परिवार ही फँस जाता।
तो क्या वे बेटियाँ तुम्हारे परिवार की हिस्सा नहीं थीं ? आज दूसरे की बेटियों को ढूंढ रही हो और अपनी बेटियों को......................................
हाँ- हाँ मैं अपराधन हूँ ।उसने बुदबुदाते हुए अपने दोनों बेटों को देखा ।जिनकी उम्र में लगभग पाँच साल का अंतर था। इस बीच उसने तीन बार अपने भ्रुण का पता लगबाकर अपने गर्भस्थ बेटियों का गर्भपात करबाया। तो अन्य माँ भी ऐसा ही करती होंगी । फिर आज किसी के घर में कन्या कैसे मिलेगी ? अगर हमारे माता-पिता भी हमारे साथ ऐसा वर्ताव करते तो क्या आज हमारा अस्तीत्व होता ?
'हमारी जैसी माँओं को कन्यापूजन का ढोंग करना व्यर्थ है।'
सुशीलजी उसकी बुदबुदाहट सुन रहे थे। अपराधबोध से उनकी आँखें भर आईं।कन्यापूजन के लिए रखे सामग्रियों के पास जाकर वे अपना सिर झुका लिये।
सुजाता प्रिय
Saturday, October 5, 2019
कन्यापूजन ( हमारी जैसी माँओं को कन्यापूजन का ढोंग करना व्यर्थ है)
Friday, October 4, 2019
पर्दे की शोभा
मत गौर करो,
पर्दे की रंग -रूप सुंदरता पर,
पर्दे की शोभा तो बस लाज छुपाने में है।
नजरों से बचने
के लिए तन को ढकते हैं हम,
पर्दा तो नग्नता देख,नजरें घुमा हट जाने में है।
किसी पर्दा नशीं
को बेपर्दा न करो लोगों,
अच्छाई तो बेपर्दों की लाज बचाने में है ।
नजरें घुमाना पर्दा नहीं,
नजरें चुराना भी पर्दा नहीं,
पर्दा तो गलतियों पर , नजरों को झुकाने में है।
शर्मों-हया से खुद
गिर जाते हैं आँखों के पर्दे,
पर्दा तो केवल लाजवंतियों के शरमाने में है।
यूं तो , बेपर्दे ही ,
खुलेआम, नहाते हैं लोग,
पर ,असली पर्दा तो, हमाम में नहाने में है।
पर्दे की बातें,
पर्दे में ही लगती है अच्छी,
न की सरेआम ,सबको, सबकुछ दिखाने में है।
यूं ही तो नहीं ,
आया होगा, पर्दे का चलन,
इसकी रीत तो, हर युग और हर जमाने में है।
सुजाता प्रिय
Tuesday, October 1, 2019
रंग लाल है लाल बहादुर के
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के जन्म के ठीक ३५ वर्ष बाद २अक्टुबर को ही सन् १९०४ ई० को लाल बहदुर शास्त्री जी का जन्म हुआ था।पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव तथा माँ रामदुलारी श्रीवास्तव अपने इस दुलारे पुत्र को दुलार से नन्हें कहकर बुलाते थे।डेढ़ वर्ष की अल्पायु में ही उसके सर से पिता का साया उठ गया।
काशी विद्यापीठ से इन्होंने शास्त्री की उपाधि ग्रहण किया था। तब से वे श्रीवास्तव की जगह शास्त्री उपनाम लिखने लगे।इनका विवाह ललिता शास्त्री से हुआ था।
महात्मा गाँधी के सनिध्य में रहकर इन्होंने देश सेवा का व्रत लिया था ।गाँधीजी ने 'करो या मरो 'का नारा दिया।तो इन्होंने 'मरो नहीं मारो ' का नारा दिया जिससे देश की आजादी के दीवानों में नई स्फूर्ति और शक्ति का संचार हुआ,और वे मरने से पहले मारने को तत्पर हो उठे। 'उनका जय जवान जय किसान' का नारा आज भी किसानों को प्रोत्साहित करने में कारगर है।
स्वतंत्रता- संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों और आन्दोलनों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। असहयोग आंदोलन, दाण्डी मार्च तथा भारत छोड़ो आंदोलन में तो इनकी भागीदारी बढ़-चढ़कर रही ।
महात्मा गाँधी,पुरोषोत्तम दास टंडन और पंडित गोविंद बल्लभ पंत इनके राजनीतिक मार्गदर्शक थे।
१९२९ में वे भारत सेवक संघ की इलाहावाद इकाई के सचिव पद पर पदास्थापित हुए।नेहरू जी के मंत्रीमंडल में गृहमंत्री भी बने और १९६४ में भारत देश के प्रधानमंत्री पद को प्राप्त किया।अपने कार्यकाल में खाद्यान मुल्यों को बढ़ने से रोकने में काफी सफल रहे।उनके सारे क्रियाकलाप व्यवहारिक और जनता की जरूरतों के अनुकूल हुआ करती थी।
१९६५ में जम्मू-कशमीर के विवादित प्रांत पर पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई का इन्होंने हिम्मत और दृढता से सामना किया।१०जनवरी १९६६ को लाल बहदुर शास्त्री जी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयुब खान के साथ रूस के ताशकंद में एक समझौता किया कि भारत और पाकिस्तान अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं करेंगे और आपसी झगड़ो का निपटारा शांतिपूर्ण तरीके से करेंगे। सादगी और देशभक्ति उनमें कूट-कूटकर भरी थी। ११ जनवरी १९६६ को देश के इस वीर सपूत का देहावसान ताशकंद में ही हो गया।१९६६ में ही इन्हें मरणोंपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
सुजाता प्रिय
Sunday, September 29, 2019
जल-भुन जाते
तारीफ
अपनी
तारीफ सुन
खुश हो जाते।
मन-ही-मन पूरा इतराते।
तारीफ करना तो
दूर किसी की।
सुन तारीफ
हम जल-भुन जाते।
सुजाता प्रिय
अपनी गलती
दूसरे
को गलत तो
सभी लोग कहते हैं,
पर शायद ही हैं लाखों में
जो अपनी गलती मान लेते हैं।
सुजाता प्रिय
Friday, September 27, 2019
आ सुर मिला लें (गीत)
आ सुर मिला लें जरा,
एक नए अंदाज में।
साथ गुनगुना लें जरा,
एक सुर के राग में।
सुर को सँवार लें,
लय को निखार लें।
बेसुरे रागों को,
थोड़ा हम सुधार लें।
सुर को सजा लें जरा,
एक प्यारे अंदाज में।
साथ गुनगुना लें जरा,
एक सुर के राग में।
आ साथ मिलके हम,
छेड़े आज सरगम।
मधुर -मधुर तान दे,
तरs रs तरम पम।
दिल बहला लें जरा,
एक नए अंदाज में।
साथ गुनगुना लें जरा,
एक सुर के राग में।
मिल्लतों की रीत हो,
सबको सबसे प्रीत हो।
सबके सुरों में आज,
एकता के गीत हो।
एक लय में गा लें जरा,
एक नए अंदाज में।
साथ गुनगुना लें जरा,
एक सुर के राग में।
सुजाता प्रिय
Wednesday, September 25, 2019
अच्छा वरदान माँग
पारसमणि नाम का एक बड़ा ही आलसी व्यक्ति था।दूसरे का धन-दौलत,इज्जत-सोहरत से उसे बड़ी ईर्ष्या होती।वह सबसे सुंदर,धनवान और यशस्वी बनना चाहता था । लेकिन ,इन्हें प्राप्त करने के लिए मेहनत नहीं करना चाहता था।
एक दिन उसे एक महात्मा से भेंट हुई।उसने उनसे अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण होने का कोई सरल-सा उपाय पूछा। महात्मा जी ने कहा- मैं तो केवल महान कार्य एवं उद्वेश्यों का मार्ग बतलाता हूँ।" मनोकामनाएँ पूर्ण तो सिर्फ ईश्वर की इच्छा से होती है।"
पारसमणि ने उनसे ईश्वर से साक्षात्कार का उपाय पूछा।महात्माजी ने उसे ईश्वर से साक्षात्कार के लिए एक मंत्र देते हुए कहा- तुम इस मंत्र का नियमपूर्वक जाप करो।कृपालु भगवन एक दिन अवश्य दर्शन देकर तुम्हारी सारी कामनाएँ पूर्ण करेंगे।
पारसमणि को महात्मा जी का यह सुझाव बहुत पसंंद आया।वह वन जाकर महात्मा जी के बताए अनुसार तप करने लगा।
उसके तप से प्रसन्न होकर एक दिन भगवान ने उसे दर्शन दिया और कहा- वत्स ! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। कहो तुम्हें क्या वरदान चाहिए ?
पारसमणि ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक कहा - हे परमेश्वर! मैं समस्त प्राणियों से सुंदर धनवान और विजयी बनना चाहता हूँ।इसलिए हे अंतर्यामी! आप मुझे मेरे मन की सारी अभिलाषाएँ पूर्ण होने का वरदान दें।
परम पिता परमेश्वर ने कहा- हे भद्रे ! तुम अपने मन से तीन भावों का त्याग करो और मन में तीन भावों को ग्रहण करो तुम्हारी सारी कामनाएँ पूरी हो जाएगी।
पारसमणि ने परित्याग करने के और ग्राह्य करने के उन तीनों भावों के बारे ईश्वर से पूछा।ईश्वर ने कहा-परित्याग करने के लिए तीन भाव हैं- ईर्ष्या-द्वेष और आलस्य।तथा ग्राह्य करने के लिए तीन भाव हैं-सेवा,त्याग और परिश्रम।
लेकिन पारसमणि को भगवान का बताया यह मार्ग बड़ा ही वक्र और कठिन लगा।वह उनसे इसके बदले तीन वरदान देने की जिद करने लगा। उसकी हठ भरी याचना से उबकर भगवान ने उसे तीन वरदान मांगने को कहा।लिकिन आलसी पारसमणि ने वर सोंचते-सोंचते तीन दिन लगा दिए।उबकर भगवान ने कहा-जब तुम्हें वरदान याद पड़े मुझे याद कर लेना। और वे अंतरध्यान हो गए।
वरदान की आस में पारसमणि और आलसी हो गया।बैठे-बैठे वह बस यही सोंचा करता कि ऐसा कौन सा वरदान भगवान से माँगू ,जिससे समाज में मेरी मान - प्रतिष्ठा बढ़ जाए। इस प्रकार कोरे आत्मसम्मान के लिए वह अपना लाभ और सबका हानि की बात सोंचने लगा।
इसी बीच उसकी भेंट एक सेठ परिवार से हुई।सेठजी का ऊँच कोटि- का आन-बान-शान देख उसका मन विद्वेष से भर गया।वह सोंचा सेठ का धन- दौलत नष्ट हो जाय तो उसका सारा ठाट-बाट चकनाचूर हो जाएगा।आव-देखा-न-ताव उसने झट से ईश्वर को स्मरण किया और दर्शन पाकर हाथ जोड़कर उनसे विनित स्वर में कहा- हे प्रभो ! आपने हमें तीन वरदान देने का वचन दिया है,इसलिए मेरे प्रथम वरदान के रूप में इस सेठ के सारे धन-दौलत नष्ट कर डालें।
कृपालु भगवन ने उसे समझाते हुए कहा- उसके धन नष्ट हो जाने से तुम्हें कोई लाभ तो नहीं।इसलिए तुम उसकी बुराई की अपेक्षा अपने हित के लिए कोई वर मांगो।
लेकिन विद्वेषी पारसमणि ने उनकी बातों पर ध्यान दिए बिना बड़े-ही कठोर शब्दों में कहा - आपने हमें वरदान देने का वचन दिया है।अतः मैं वरदान माँग रहा हूँ ।आप हमें ये व्यर्थ की बातें समझाकर टालने की कोशिश ना करें।
उसकी इस कटु वाणी से नाराज होकर ईश्वर ने उसके प्रथम वरदान स्वरूप सेठ के सारे धन-दौलत नष्ट कर दिया।ईर्ष्यालु पारसमणि सेठ को कंगाल देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ।सोंचा कोई तो ऐसा है जिससे मैं धनवान हूँ। इस प्रकार एक दिन मैं सबसे धनवान व्यक्ति बन
जाउँगा।
कुछ ही दिनों बाद उसका एक चचेरे भाई सागर ने अपनी जान- जोखिम में डालकर किसी को नदी में डूबने से बचा लिया।जिस कारण वह सारे शहर में प्रसंशा का पात्र बन गया।उसकी इतनी सराहना सुन पारसमणि को फिर ईर्ष्या ने आ घेरा ।आनन-फानन में उसने तुरंत ईश्वर का आह्वान किया।वचन के हारे भगवान तुरंत पधारे।उन्हें देख पारसमणि ने कहा- भगवन अब आपको मेरा दूसरा वरदान देने का वक्त आ गया।अपने वचनानुसार मेरे दूसरे वरदान के रूप में मेरे चचेरे भाई की सारी प्रसंशा खत्म कर दें।
भगवान को उसके तुच्छ विचारों पर बड़ी तरस आई।उन्होंने पूर्व की तरह फिर उसे समझाने की कोशिश की और उसे अपने लिए कोई अच्छा-सा वर माँगने के लिए प्रेरित किया।लेकिन मूढ़मति पारसमणि अपने निर्णय पर अडिग रहा।
भगवान ने सोंचा इसे सुधारने का एकमात्र उपाय भी यही है।अपनी माया का ऐसा चक्र चलाया कि कल की अच्छी बातें आज बुराई में बदल गई।हुआ यूं महल्ले मे आग लगी।और आग लगने का सारा आरोप महल्ले वालों ने सागर पर लगाया ।इस प्रकार जितना लोग कल उसकी प्रसंशा कर रहे थे सब उसकी निंदा करने लगे।उसके माथे पर लगा कलंक ने पारसमणि के ईर्ष्यालु मन को बहुत ठंढक पहुँचाई।
जब वह भगवान से अपने तीसरे वरदान के बारे में सोंचने लगा।कौन-सा ऐसा वर माँगू जिससे बहुत कुछ हासिल हो जाए।
तभी उसके अंतर्मन ने उसे धिक्कारते हुए कहा -मुर्ख! तूने दो वरदान माँगकर ही क्या हासिल कर लिया ? क्या तुम सेठ से ज्यादा धनवान हो गए ? या फिर सागर से ज्यादा यश प्राप्त कर लिया ? ईर्ष्या और द्वेष में घिरकर दूसरे की क्षति की जगह यदि तुम अपने लिए धन और यश की माँग करते तो आज तुम भी बहुत धनवान और यशस्वी होते।
उसके ग्यान चक्षु खुल चुके थे।आत्मग्लानि से भर अपनी करनी पर पाश्चाताप करते हुए भगवान का आह्वान किया।जब उन्हें देखा तो उनके चरणों में गिरकर विनम्रता से प्रा्र्थना करते हुए कहा - हे अंतर्यामी आपने हमें तीन वरदान देने का वचन दिया।परन्तु अग्यानतावश मैंने जो आपसे दो वरदान माँगे उसके लिए मैं अक्षम्य पाप का भागी हूँ।इसलिए हे जगदीश अपने इस पाप के प्रायश्चित के लिए मेरी आपसे विनती है कि तीसरे वरदान के रूप में मेरे मन के दुर्विचारों को दूर करें और जिस प्रकार दो बार मुझे अग्यानता के मार्ग पर भटकने से रोकने की कोशिश की उसी प्रकार सदा मेरी संमार्गदर्शक बने रहें।
भगवान प्रसन्न होकर एम्वस्तु के भाव से मुस्कराए और अपने दूसरे भक्तो की ओर बढ़ चले।
उस दिन से पारसमणि लोभ-मोह, ईर्ष्या-द्वेष क्रोध-आलस्य सभी को त्याग दिया।अब वह किसी की प्रसंशा और दौलत देख जलने की अपेक्षा स्वयं अच्छे कर्म करता । खूब परिश्रम कर धन कमाता और उससे जरुरतमंदों की मदद करता।इस प्रकार उसके यश का शुभ्र प्रकाश दसो दिशाओं में फैल गया। सभी लोग उसके गुणों के प्रसंशक बन गए।अपने अच्छे कर्म में और सद्विचारों द्वारा धनवान गुणवान और यशस्वी हो गया।अब वह काफी प्रसन्न और संतुष्ट रहने लगा,जिससे उसका चेहरा देदीप्यमान हो उठा और वह काफी प्रभावशाली दिखने लगा।
अब वह सभी को उपदेश देता-ईश्वर बड़ा दाता है ।उससे अच्छा वर माँग जिससे जगत के समस्त जीवों सहित तेरा भी कल्याण हो।
सुजाता प्रिय