Thursday, July 18, 2024

हिन्दी की आराधना।

               हिन्दी की आराधना 

हिन्द देश के वासी कर लो, हिन्दी की आराधना।
जब मुख खोलो हिन्दी बोलो, होगी सच्ची साधना।।

अपनी है यह प्यारी हिन्दी,इसे सभी सम्मान कर।
दुनिया में जाकर हिन्दी का,खुलकर तुम गुणगान कर।
सारी दुनिया में यह छाये,मन में रख लो कामना।।
जब मुख खोलो हिन्दी बोलो, होगी सच्ची साधना।।

हर भाषा को लिखना-पढना, माना अच्छी बात है।
हर भाषा का ज्ञान बढाना,जीवन की सौगात है।
हिन्दी भाषा सबसे अच्छी,रख लो मन में भावना।
जब मुख खोलो हिन्दी बोलो,होगी सच्ची साधना।

संस्कृत की बेटी है हिन्दी, सुंदरता की खान है।
हर अच्छी बोली-भाषा को,इसपर ही अभिमान है।
देश की क्षेत्रीय भाषा की,करती  है यह सामना।
जब मुख खोलो हिन्दी बोलो, होगी सच्ची साधना।

अपने प्यारे हिंद देश की, हिन्दी से पहचान है।
हिन्दी से ही प्यार हमें है, हिन्दी पर ही शान है।
इसे तज विदेशी भाषा में, स्वयं को तुम न बांधना।
जब मुख खोलो हिन्दी बोलो, होगी सच्ची साधना।
                         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

माँ जगजननी गीत

बोल -सौ साल पहले मुझे तुम से प्यार था 

माँ जगजननी को, भक्तों से प्यार था,
आज भी है और कल भी रहेगा।

जो मैया के निकट जाता,माँ उसकी झोली भरती हैं।
जो हैं दुःख-चिंता से व्याकुल,उनका संकट भर्ती हैं।
शेरोंवाली मैया को भक्त हजार था,
आज भी है और कल भी रहेगा।
माँ जगजननी को.........
माँ के अंखियों में देखो,छवि भक्तों की बसी प्यारी।
माँ का हर रूप न्यारा,इनकी ममता है न्यारी।
मैया जी को बेटों से सदा ही दुलार था ,
आज भी है और........
सुन विनती माँ अम्बे, हमें बल-बुद्धि दो इतनी।
हम सबके हैं साथी, सहायता माँगे जो जितनी।
युग-युग पहले माँ का सजा दरबार था,
आज भी है और.........
                             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, July 17, 2024

तुलसी पूजा गीत

तुलसी गीत 
बोल जगदम्बा से लाड़ो सुहाग मांगे )

मेरे आंगन में शोभे श्याम तुलसी।
श्याम तुलसी,हरे राम तुलसी।

सोने सुराही में गंगा-जल भरके,
नित उठ पटाऊँ मैं श्याम तुलसी।

सोने की डलिया में बेली चमेली,
तोड़ -तोड़ चढ़ाऊँ मैं श्याम तुलसी।

सोने की थाली में दाख-छुहारा,
नित भोग लगाऊँ मैं श्याम तुलसी।

सोने की दीया, रेशम की बाती,
घृत डाल जलाऊँ मैं श्याम तुलसी ।

सोने की थाली कपूर की बाती,
नित आरती उतारूँ मैं श्याम तुलसी।

मेरे आँगन में शोभे......
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, July 13, 2024

मेरा वृक्ष मेरा परिवार (दोहा)

मेरा वृक्ष,मेरा परिवार (दोहा )

मत काटो तुम वृक्ष को,यह मेरा परिवार।
इनका भी मेरी तरह, धरती पर अधिकार।।

इनके कारण जी रहे, धरती पर सब जीव।
फिर इसको जन काटते, बातें लगे अजीब।।

यह देता भोजन हमें, इंधन देता साथ।
सांस लेने शुद्ध हवा,इसे झुकाओ मार।।

छाया देता धूप में,तब दें शुद्ध समीर।
गर्मी से व्याकुल रहें,होता जीव अधीर।। 

वृक्ष हमारे मित्र हैं,ईश प्रदत्त उपहार।
काम आते हमें सदा , बनकर ये परिवार।।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

बच्चे (चौपाई )

बच्चे  (चौपाई )

बच्चे सबसे अच्छे होते।
भोले -भाले सच्चे होते।।

मन में कोई कपट न लाते।
मिलजुल रहना हमें सीखाते।।

सीखते हमसे हमें सिखाते 
जैसे ढालों वह ढल जाते।।

तुतली बोली इनकी भाती।
खूब लुभाती खूब हँसाती।।

सबको भाते नटखट बच्चे।
सबको लगते हैं ये अच्छे।।
      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, July 11, 2024

केवट की विनती (मगही भाषा)

केवट की विनती (मगही भाषा)

पाँव न सटैहा,हो रघुरैया।
नारी न बन जाए कहीं मोर नैया।
पाँव न सटैहा......
तू जो पथलवा में पाँव सटैला।
पल भर में ओकरा तू नारी बनैला।
पैला जग में बडै़या हो रघुरैया।
पाँव न सटैहा .........
जब तोहें चढ़बा नैया में हमर।
चरण पखारे के दें दा तू अवसर।
नै लेबो हमें चरणा-धोलैया हो......
पाँव न सटैहा.......
पहले हम रामजी के पाँव पखारब।
और सीता मैया के चरण फखारव,
फखारब तब तोर लक्ष्मण भैया 
पाँव न सटैहा...............
हँस कर रामजी नाव में बैठला।
लखन जी राम के पीछे बैठला।
संगबा में बैठली सीता मैया।
पाँव न सटैहा........
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, July 10, 2024

लक्ष्य (मुक्तक)

लक्ष्य (मुक्तक )

लक्ष्य पाने के लिए तुम,सत्य पथ पर बढ़ चलो।
राह में पर्वत भी आये, हौसला ले चढ़ चलो।
दृढ़ हृदय ले बढ़ते जाओ,राह तुम भटको नहीं-
राह कोई न दिखे तो,नव रास्ते गढ़ते चलो।

चाह रखो तुम हृदय में,राह भी मिल जाएगी।
दृढ़ हो निश्चय तुम्हारा, चट्टान भी हिल जाएगी।
ठोक कदमों से उसे तुम, दूर कर दो राह से -
पाषाण की छाती को चिर, सुंदर कली खिल जाएगी।

हृदय में हिम्मत बढ़ा चल, तुम कभी मत हारना।
जीतकर ही आयेंगे हम,मन में रखो धारना।
रास्ते के ठोकरों को, ठेलकर बढ़ते चलो-
पग कभी उसपर पड़े तो, तुम भी ठोकर मारना।

अधिकार तेरा लक्ष्य पाना, लक्ष्य पाना धर्म है।
लक्ष्य हेतु संग्राम करना, भी हमारा कर्म है।
जीत कर संग्राम को तुम, लौट कर घर आओगे-
तब तुम्हें यह ज्ञात होगा, लक्ष्य ही तो मर्म है।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'