Tuesday, October 5, 2021

मां दुर्गा की भोग आराधना गीत


मां दुर्गा की भोग आराधना गीत
              (लावणी छंद)

नवरात्रि में नवदुर्गा माता को मनभावन भोग लगाइए।
मां के चरणों में शीश नवाकर,मनचाहा वर को पाइए।

प्रथम दिवस शैलपुत्री मां के चरणों में गौ का घी चढ़ाइए,
अपनी प्यारी काया को, सुंदर-स्वच्छ, निरोग बनाइए।

द्वितीय दिवस ब्रह्मचारिणी मां को,शक्कर भोग लगाइए,
माता से आशीष पाकर,अपनी आयु को दीर्घ बनाइए।

तृतीय दिवस चन्द्र घंटा मां को खीर-मिठाई खिलाइए,
सदा सुखी का वरदान लिजिए, दुःख से मुक्ति पाइए।

चतुर्थ दिवस कुष्मांडा मां को, मालपुआ खिलाइए,
बुद्धि विकसित कर देंगी मां, निर्णय शक्ति बढ़ाइए।

पंचम दिवस स्कंदमाता को,कदली का भोग लगाइए,
काया कंचन सदा रहेगी, शरीर को स्वस्थ्य  बनाइए।

षष्ठम दिवस कात्यायनी मां को, मीठा शहद खिलाइए,
सुंदर,धौम्य सुकुमार शरीर, व्यक्तित्व आकर्षक पाइए।

सप्तम दिवस कालरात्रि मां को, गुड़ का भोग लगाइए,
अकास्मिक आने वाले, सारे संकट से छुटकारा पाइए।

अष्टम दिवस महागौरी मां को, नारियल भोग लगाइए,
बंध्यापन को दूर करें,और संतति के सुख को पाइए।

नवम दिवस सिद्धिदात्री मां को,तिल का भोग लगाइए,
अकास्मिक मृत्यु के भय से,सदा के लिए राहत पाइए।

दसम दिवस माता रानी के,चरणों में शीश नवाइए।
शुभाशीष, शुभकामनाएं पाकर, यात्रा शुभ बनाइए।

प्रेम से बोलो जय माता की 🙏🙏
                              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, October 4, 2021

कल हाथ पकड़ना मेरा



कल हाथ पकड़ना मेरा (लघुकथा)

सब्जियों की थैली ले कांपते कदमों से शम्भु प्रसाद जी बार-बार सड़क पार करने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन तेज रफ्तार से आती गाड़ियों को देख उनकी हिम्मत जवाब दे जाती।ना चाहते हुए उनकी नजरें मनीष को ढूंढ रही थी।वे उसका एहसान नहीं लेना चाहते थे।इतने में मनीष लपकता हुआ उनके निकट आया और उनका हाथ पकड़ कर सड़क पार कराने लगा। सड़क पार कर दोनों साथ-साथ चलने लगे। शम्भु प्रसाद ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा- बेटा तुम्हारे आफिस से आने और मेरे सब्जियां लाने का समय एक ही है। अक्सर हमारी-तम्हारी भेंट हो जाती है।तुम स्वयं थके-हारे आते हो फिर मुझे...........
शम्भु प्रसाद की बातें काटते हुए मनीष ने कहा आप भी तो आफिस से थके आते थे चाचा जी ! जब हम छोटे थे। विद्यालय से आते समय आप मेरे सभी साथियों को हाथ पकड़ कर सड़क पार कराते थे। मां ने कहा था किसी के साथ नहीं जाना।पता नहीं कैसे लोग हों क्या मकसद हो उनका। इसलिए हम आपके साथ नहीं जाना चाहते थे। आखिर मैंने आपसे एक दिन पूछ ही लिया कि क्यों आप हमें सड़क पार कराते हैं? आपने कहा था-बच्चे नासमझ और बूढ़े कमजोर होते हैं । इसलिए उन्हें सड़क पार करने में मदद करनी चाहिए।जब मैं बूढ़ा हो जाउंगा तब तुम भी मेरा हाथ पकड़ कर सड़क पार करना। आपकी यह शिक्षा मुझे बहुत अच्छी लगी।सचमुच आज वही स्थिति हो गयी। मेरे कार्यालय से आने का और आपके सब्जी लाने का समय एक ही है।जब मैं आपको सड़क पार करने में असमर्थ पाता हूं आपको सड़क पार करा देता हूं। इतना ही नहीं कहीं भी मैं किसी बच्चे और बुजुर्ग को सड़क पार करने में असमर्थ पाता हूं उन्हें जरूर मदद करता हूं।
शम्भु चाचा ने सोचा -हमारे कार्यों एवं संदेश से किसी को तो सीख मिली। हो सकता है अन्य बच्चे भी यह कार्य करते होंगे। मनीष संयोग से यहीं है इसलिए मुझे मदद करता है।उनका मन प्रसन्नता से भर गया।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, October 1, 2021

और कहानी छप गयी

किसी नगर में एक निर्धन और विद्वान ब्राह्मण रहते थे।उनके द्वार पर उनके शिष्यों भीड़ लगी रहती।सभी को वे उत्तम शिक्षा देते थे।गुरु दक्षिणा के रूप में वे स्वेच्छा से जो कुछ दे देते उसे संतुष्ट भाव से स्वीकार करते। उन्हें कहानियां लिखने का बड़ा शौक था।जब भी समय मिलता अच्छी और शिक्षाप्रद कहानियां लिखकर लोगों को सुनाते।सभी लोग उनकी कहानियों की खूब प्रशंसा करते। उन्हें लगता काश उनकी कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में छपती। लेकिन, निर्धनता के कारण वे अपनी कहानियों को छपबा नहीं पाते।
उनकी पत्नी मुर्ख और झगड़ालू स्वभाव की थी।आये दिन वह उनसे झगड़े करती।उनके द्वारा कहानी लिखें जाने को मुर्खतापूर्ण व्यवहार तथा कागज रोशनाई और समय की बर्वादी कहती।अवसर पाते ही उनके शिष्यों को डांट-फटकार कर भगा देती। उन्हें बस टोले-पड़ोसियों की निंदा सुनने एवं चुगली करने में ही मज़ा आता। पंडित जी उन्हें समझाते की निंदा एवं चुगली करना बुरी बात है। संसार में भांति-भांति के लोग हैं। दुर्गुणों और दुराचारियों की ओर ध्यान न देकर भले मानस और गुणवानों की कद्र तथा संगति करनी चाहिए। परंतु पंडिताइन पर उनके उपदेशों का कोई असर नहीं होता।
पंडित जी ने एक पुस्तक में पढ़ी थी कि महापुरुषों की सफलता में किसी-न-किसी नारी का साथ रहा है। वे सोचते मां-बहन तो है नहीं। पत्नी ऐसी मुर्ख है जिसकी दृष्टि में शिक्षा से बुरा कोई कार्य हो ही नहीं सकता। वे सोचते काश वे मुर्ख होते और उनकी पत्नी पत्नी कालिदास और तुलसीदास की पत्नी जैसी।
एक दिन पंडित जी किसी काम से बाहर आते हुए थे। पंडित जी की पत्नी झाड़ू लगा रही थी। अचानक उनकी दृष्टि पंडित जी के बिछावन पर पड़ी, जहां पंडित जी द्वारा लिखी गई एक नयी कहानी रखी थी। उसने सोचा? क्यों ना इसे बाहर फेंक दूं। यदि मैं उनके लिखे पन्ने को फेंकती जाऊं तो पंडित जी ऊब कर लिखना ही छोड़ दें।ऐसा सोचकर वह कहानी के पन्नों को उठाकर कूड़े के ढेर पर फेंक आयी।
संयोग से उस समय वहां से जा रहे एक पत्रकार की नजर उस पन्ने पर पड़ी। उन्होंने उसे कुछ जरूरी कागजात समझकर उठाया और कहानी पढ़ी। उन्हें वह कहानी बहुत ही रोचक और शिक्षाप्रद लगी। अंत में पंडित जी का नाम पता लिखा था। पत्रकार ने उस कहानी को उनके नाम-पते के साथ छपबा दिया।
 जब पंडित जी घर लौटकर आते तो अपने द्वार पर भीड़ देखकर अचंभित हो गये।उनके एक विद्यार्थी ने उन्हें अखबार दिखाते हुए कहा- अखबार में आपकी बहुत अच्छी कहानी छपी है। पंडित जी किंकर्तव्यविमूढ़ सा उन्हें देखते हुए सोच रहे थे-मुझे तो छपबाने सामर्थ ही नहीं फिर मेरे कहानी कैसे छप गयी ? अखबार लेकर पढ़ी। सचमुच यह तो उनके द्वारा लिखी गरी कहानी है। कहानीकार के स्थान पर उनका ही नाम है।साथ में उन्हें इस कहानी लिखने के लिए पुरस्कृत करने के लिए आमंत्रित किया गया है। आखिर यह चमत्कार हुआ कैसे?
वे घर आकर अपनी लिखी हुई कहानी ढूंढने लगे।
पत्नी ने उन्हें ऐसा करते देख तो पूछा क्या ढूंढ रहे हो?
उन्होंने कहा-यहां मैंने एक कहानी लिखकर रखी थी।
पत्नी ने कूढ़ते हुए कहा-उसे तो मैंने कूड़े पर फेंक दिया।
अब पंडित जी को सारी बात समझ में आ गयी।वे अपनी मुर्ख पत्नी को देखकर मुस्कुरा उठे।आज उन्हें अपनी मुर्ख पत्नी के कारण यह सफलता प्राप्त हुई थी।
                             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

सेवा का संकल्प



सेवा का संकल्प (लघुकथा)

बिस्तर पर पड़े दादा जी का मल-मूत्र साफ कर रहे पिताजी को देख राजीव और संजीव का मन व्यथित हो गया। आखिर राजीव ने बोला ही दिया-क्या पिताजी आप अपने से यह सब करते हैं।एक केयर-टेकर रख लेते।
और क्या-अभी दो महीने पहले ही जब हम इन्हें लाने पटना गये थे तो देखा था देखा था चाचाजी इन लोगों के लिए केयर टेकर रख दिया था।जब दादा-दादी को कोई जरुरत होती कौंल कर देते और उधलोग आकर सब साफ़ सफाई कर देते।कुछ पैसे की ही तो बात है। संजीव ने उसकी बात खत्म होते ही कहा।
बात पैसे की नहीं बेटा! स्नेह-प्रेम और कर्त्तव्य की है। तुम्हारे चाचा बिजनेसमैन हैं।उनके पास समय का अभाव था। ‌तुम्हारी चाची भी अक्सर बीमार रहती हैं। ऊपर से घर के सारे काम नौकरों से करवाना। सो उन्होंने केयर-टेकर रख लिया ‌।
पैसे की कमी हमारे पास भी नहीं ।हम भी आदमी रख सकते हैं, इनकी देखभाल के लिए। लेकिन जब इन्हें जरुरत होगी तब तो नहीं आएगा।और जब-तक नहीं आएगा तब-तक इन्हें मल-मूत्र पर ही पड़े रहना होगा। इसलिए मैं आफिस जाने से पूर्व इनकी साफ- सफाई कर लेता हूं तो आत्मसंतुष्टि मिलती है। तुमलोग को पाल-पोस कर हमने देखा लिया कि मां बाप को बच्चों को पालन-पोषण और पढ़ाने-लिखाने में मां-बाप को क्या-क्या कष्ट उठाने पड़ते हैं। किन-किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है। फिर वही बच्चे अपने शारीरिक रूप से लाचार मां-बाप की सेवा करने से कतराते हैं।अगर तुम्हारी चाची बीमार नहीं पड़ती तो तुम्हारे चाचू इन्हें कभी आने नहीं देते।अब हमें मौका मिला है तो हमें सहृदय इनकी सेवा करनी चाहिए। 
दादा-दादी के लिए दलिया बनाकर लाती हुई मां ने कहा-हां आप ठीक कहते हैं इस पुण्य कार्य में मैं हमेशा आपके साथ हूं।हमें इनकी सेवा अवश्य करनी चाहिए। 
दादा-दादी के लिए गर्म पानी लेकर आती दीदी ने कहा और हम भी।
और हम भी उनकी बातें सुनकर अनायास दोनों भाइयों के मुंह से निकल गया।
मां-पिताजी संतुष्ट-भाव से बच्चों को निहार रहे थे ।और तीनों भाई- बहन मन -ही- मन यह संकल्प लें रहे थे कि हम भी अपने मां-पिताजी की सेवा स्वयं करेंगे।पैसे की अधिकता से पंगु नहीं होंगे।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 स्वरचित, मौलिक

Thursday, September 30, 2021

नदिया की धार



कल-कल करती बहती जाती,नदिया की धार रे।
संगीत सुनाती ऐसी जैसे,भौरे करें गूंजार रे।

तेज चाल से बढ़ती जाती,मन में लेकर शान।
चलना ही है काम इसका, इस पर इसे गुमान।
जरा न रुकती,जरा न थकती,चलती मन को मार रे।
संगीत सुनाती.....................
दोनों कूल में देख उठी है कैसी आज उफान।
ऐसा लगता आज है आया सागर में तूफान।
आज है जैसे बनकर आई यह धरती की हार रे।
संगीत सुनाती...................
कभी थिरकती,कभी मचलती,मन में ले गुमान।
झूमती-गाती इठलाती-सी चल रही सीना तान।
कभी भंवर बन नाच दिखाती,सौ-सौ ठूमके मार रे।
संगीत सुनाती...................
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, September 29, 2021

घर का जोगी



घर का जोगी

होली का त्योहार निकट है। सभी घरों में जोर-शोर से तैयारियां चल रही है। कपड़ों एवं रंग-गुलाल के साथ-साथ पकवानों एवं लजीज व्यंजनों की भी सूची बन रही है।
रंजना ने अपनी सहेलियों से मालपुआ की बात छेड़ी।
रजनी ने कहा-पुआ तो हम सभी घरों में खाते हैं।पर, समृद्धि भाभी जैसा लजीज और खास्ता पुआ किसी का नहीं होता।
रंजना की भाभी ने कहा-अपना-अपना हूनर है, वरना मेवे मलाई तो सभी डालते हैं। किन्तु क्या चीज कितनी मात्रा में डालना है यह सभी को अंदाज नहीं होता।
रंजना ने कहा-चलो हमलोग समृद्धि भाभी से ही पूछ लें।
फिर क्या था, सभी चल पड़ी समृद्धि भाभी के घर।संयोग से समृद्धि भाभी घर में अकेली थी। उन्होंने सबका बड़े प्यार से स्वागत किया।
उनकी व्यवहार कुशलता की तारीफ सभी ने किया। फिर मिलने आने का मकसद भी बता दिया।
समृद्धि भाभी ने माल पुए को खास्ता करने के गुर्र सभी को दिल खोलकर बताया।
होली के दिन सभी संध्या को रंग-गुलाल ले एक-दूसरे के घर चल पड़े। बहुत ही सुंदर संयोग था जब समृद्धि भाभी रंजना के घर पहुंची तो उसकी सहेलियां भी वहां मौजूद थीं। सभी ने एक-दूसरे को गुलाल लगाया।
रंजना की भाभी ने गरम-गरम माल पुआ लाकर सभी को परोसा।
समृद्धि भाभी की सासु मां ने उन्हें फटकारते हुए कहा-लो खाओ पुआ।देखो कितना बढ़िया बना है।यह तो बढ़िया पुआ बना ही नहीं पाती है।
समृद्धि भाभी की ननद ने छुटते ही कहा-मैं तो पहले ही बोली थी कि रंजना या उसकी भाभी से पुछकर बनाइएगा। लेकिन इन्हें पूछने में अपमान लगता है।अरे! सीखने में कैसा संकोच ?
दूसरी ननद ने हां -में-हां मिलाते हुए कहा-ऐसे लोग कभी सीख नहीं पाते।
सासु मां ने हाथ नचाते हुए कहा-क्या करोगी ?सबके किस्मत अच्छे नहीं होते। मैं तो तरस कर ही रह गयी कि मेरे घर कोई अच्छा व्यंजन बने।
रश्मि कहना चाहती कि हमलोग ने तो इन्हीं से सीखा पुआ बनाना। लेकिन रंजना ने उसे चुप रहने का इशारा किया।वह नहीं चाहती थी कि समृद्धि भाभी को और भी खरी-खोटी सुनाना पड़े।
रंजना की सभी सहेलियां समृद्धि भाभी का उदास और रुआंसा चेहरा देख सोंच रही थी-
सारे मुहल्ले में समृद्धि भाभी सर्व गुण संपन्न और निपुण हैं। लेकिन घर के लोग उसे फुहड़ और बेबकूफ समझते हैं।इसे ही कहते हैं -घर का जोगी जोगड़ा आन गांव के सिद्ध।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, September 25, 2021

जागो-जागो ऐ इंसान

जागो-जागो ऐ इंसान

मत कर मानव झूठी शान,धरा रह जाएगा गुमान।
जरा तू मेरी भी तो मान,जागो-जागो ऐ इंसान।
छल-छद्दम से दो पैसे जब, हाथ कभी पा जाते हो।
तुझ-सा बड़ा न कोई प्राणी,ऐसी अकड़ दिखाते हो।
तू है बहुत बड़ा नादान,जागो-.......
धन-दौलत का गर्व क्यों करते,इसका कोई मोल नहीं।
साथ न तेरे जाएगा यह,जाएगा तू छोड़ यहीं।
गर्व क्यूं करता है इंसान,जागोे.......
लाख जतन से महल बनाया,सब सुविधाओं से भरपूर।
खोल न पाते मन की खिड़की,खुली हवा से रहते दूर।
डाला ख़तरे में क्यों जान,जागो......
क्यों इठलाता रे मन-मुरख इस माटी की मूरत पर।
अस्थि-मज्जा से बने वदन पर, सुंदर गोरे सूरत पर।
यह तो ईश्वर का वरदान जागो.......
रूप का मत अभिमान करो, यह तो कल ढल जाना है।
ईश्वर की रचना सब सूरत,अपना न ताना-बाना है।
मत कर इस पर तू अभिमान, जागो..........
बोली एक अमोल रतन है,इसे समझ ना पाते हो।
तीखी बोली बोल जहां में, कड़वाहट भर जाते हो।
क्यों है इससे तू अंजान,जागो........
                                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'