नयन उठाकर देख धरा पर,
नव किसलय से भरा धरातल।
नन्हें-नन्हें पत्तों से ढककर,
लगता कितना हरा धरातल।
धरा-गर्भ में फूटे नवांकुर,
कोमल रेशमी डोर लिए।
सूरज की किरण फैली है,
आसमान में भोर लिए ।
हर्षित होकर आज वसुंधरा,
पहनी चुनरी धानी है।
किसलय का श्रृंगार रचा है,
दुनियाँ की पटरानी है।
मन के सब संताप मिटा है।
पल कितना सुखदायी है।
खुशियों से विभोर होकर,
मंद-मंद मुस्कायी है।
अब धरती का तपन मिटा है,
पुलकित होकर ली अँगड़ाई।
हरियाली है चहुँ दिशा में,
हरियाली है मन मन में छाई।
सुजाता प्रिय