Saturday, May 16, 2020

नव किसलय से भरा धरातल

नयन उठाकर देख धरा पर,
नव किसलय से भरा धरातल।
नन्हें-नन्हें पत्तों से ढककर,
लगता कितना हरा धरातल।

धरा-गर्भ में फूटे नवांकुर,
कोमल रेशमी डोर लिए।
सूरज की किरण फैली है,
आसमान में भोर लिए ।

हर्षित होकर आज वसुंधरा,
पहनी चुनरी धानी है।
किसलय का श्रृंगार रचा है,
दुनियाँ की पटरानी है।

मन के सब संताप मिटा है।
पल कितना सुखदायी है।
खुशियों से विभोर होकर,
मंद-मंद मुस्कायी है।

अब धरती का तपन मिटा है,
पुलकित होकर ली अँगड़ाई।
हरियाली है चहुँ दिशा में,
हरियाली है मन मन में छाई।
     सुजाता प्रिय

Thursday, May 14, 2020

दूर क्षितिज में

प्रथम रश्मि ले आया सूरज,
    फैलाकर किरणों के तार।
       दूर क्षितिज में फैली लाली,
            स्वर्ण-मंजूषा सा उपहार।

शाम ढली,चंदा मुस्काया,
    अब तो राज हमारा है।
        काली रात के अंधियारे में,
             हमसे ही उजियारा है।

रजनी ने ओढ़े तिमिरांचल,
     सुभग सितारें जड़े हुए।
         नन्हें-नन्हें दीप सरीखे,
             झिलमिल करते सजे हुए।

दूर कहीं है छाया बादल,
      लगता बड़ा सुहाना है।
        झूम-झूम लहराकर हँसता,
            रिमझिम जल बरसाना है।

दूर क्षितिज में उड़ते जाते,
    खग-कुल अपने पंख पसार।
        चहक-चहक कलरव करते हैं,
             पाकर क्षितिज का विस्तार।

असीम क्षितिज का है संदेशा,
    कि यहाँ कोई विराम नहीं है।
        बढ़ना है, बढ़ते जाओ तुम,
            रुकने का अब नाम नहीं है।
     .       
                     सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Wednesday, May 13, 2020

हाल प्रवासी मजदूरों का

पैसे कमाने की ले आस।
मजदूर परिवार गए प्रवास।

पेट की भूख मिटाने को ।
दो पैसे भीे घर लाने को।

गाँव घर से दूर टाउन में।
फँस गए लॉक डाउन में।

लौट रहे ट्रकों मे लदकर।
बड़े दिनों पर अपने घर।

जान को जोखिम में डाल।
पहुँच रहे वे होकर बेहाल।

पत्नी देखो लटकी है ऊपर।
बच्चा गिरने वाला है भू पर।

साथ में लेकर पूरा परिवार।
बे पैसे के लौट रहे लाचार।

हा-हा कैसा ये गजब हुआ ।
देखते-देखते अजब हुआ।

कहर कोरोना का छा गया।
सबको है दुखी बना गया।
        सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Wednesday, May 6, 2020

हम चलते जाएँ साथ

हाथ में लेकर हाथ।
हम चलते जाएँ साथ ।

मौसम बड़ा सुहाना है,
हमको घर भी जाना है,
चलो, चलें अब हम-तुम
दोनों करते जाएँ बात।
हम चलते जाएँ साथ।

साथ-साथ चलते जाएँ,
मुश्किल में ना घबराएँ,
हवा का रुख चाहे बदले
हम साथ रहें दिन-रात ।
हम चलते जाएँ साथ।

सदा रहे यह साथ हमारा,
सदा रहे यह जीवन प्यारा,
हँसते जाएँ हम जीवन भर
यही हो बस सौगात ।
हम चलते जाएँ साथ।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, May 5, 2020

उठो वीर

उठो वीर तुम अपनी सीमा की ओर बढो़ जवानों।
भारत माँ की रक्षा  करने तुम दौड़ पड़ो जवानों।

सीमा के भीतर रावण कोई आने कभी न पाए ।
आ भी जाए तो वह बचकर,जाने कभी न पाए ।
साहस संचित कर दुश्मन को खदेड़ बढ़ो जवानों।
भारत माँ की रक्षा   करने तुम दौड़ पड़ो जवानों।

तुम ही राम हो,तुम ही लक्ष्मण,सीता के रखवाले।
तुम ही  हो महावीर देश के, लंका  को ढाने वाले।
अयोध्या के सुख-वैभव को तुम छोड़ बढ़ो जवानों।
भारत माँ की रक्षा  करने तुम दौड़ पड़ो जवानों।

हिम्मत मत हारो करते जाओ देश की तुम रखवाली।
विजय पाकर लौटोगे तब, मनाएँगे हम खूब दीवाली।
बम पटाखों-सा दुश्मन सेना पर फोड़ बढ़ो दीवानों।
भारत माँ की रक्षा  करने तुम दौड़ पड़ो जवानों।
                                   सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, April 30, 2020

धरती के दो तारे टूटे

धरती वाले भयभीत खड़े थे,
उल्का पिण्ड टकराने वाला है।
धरती से वह टकराकर अब,
उथल-पुथल मचाने वाला है।

उल्का तो गुजर गया दूर से,
पर धरती के दो तारे टूटे।
ध्रुवतारा- से जगमग करते,
फिल्मी दुनियाँ के सितारें टूटे

दुनियाँ के रंग मंच पर वे,
अंतिम अभिनय दिखा गए ।
कभी साथ अभिनय करते वे,
अंतिम साँस तक निभा गए।

सारी दुनियाँ को यह दुःख है,
शोक-संतप्त हैं भारत के लोग।
दोनों ने साथ अभिनय किया था,
था कैसा यह  अंतिम संयोग।
       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, April 25, 2020

झील किनारे

आज रात इक सपना आया।
पुलकित मेरा मन मुस्काया।

मैं जा बैठी हूँ झील किनारे।
जल में अपना पाँव पसारे।

मुस्कुरा रही है सुनहरी उषा।
लेकर खुशियों की मंजूषा।

झील में है हरियाली छाई।
लग रही थी बड़ी सुखदाई।

पत्ते बिखर-बिखर फैले हैं।
कोमल कमल फूल खिले हैं।

मंद-मंद बह रहा था बयार।
तुझसे मिलने का अभिसार।

हाथ बढ़ाकर फूल को छू ली।
उनींदी आँखों में मैं सब भूली।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि,स्वरचित