Saturday, July 25, 2020

गज़ल

तुम आ रहे हो,ये खबर हो गई।
रास्तें में तेरी, यह नजर हो गई।

सुबह से खड़ी थी,राहों में तेरी,
खड़ी ही रही,  दोपहर हो गई।

तब से खड़ी थी, शाम ढले तक,
शाम ढली  राह, बेनजर हो गई।

रात कटी अब, तारों को गीनते,
इंतजार करते,अब सहर हो गई।

फिर से ये नजरें,लगीं राह तकने,
तकते-हुए फिर,इक पहर हो गई।

आखिर को तुम,आ ही गए अब,
तेरी-मेरी अब इक, डगर हो गई।

तुझको 'प्रिय'यह,बता दूँ अभी मैं,
कि अब मैं तेरी, हमसफर हो गई।

     सुजाता प्रिय'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

4 comments:

  1. आ० दीदीजी को सादर नमन।मेरी रचना को सांध्य दैनिक मुखरित मौन में साझा करने के लिए बहुत-बहुत आभार दी।आपका प्यार-दुलार लेखनी को शक्ति प्रदान करता है।
    सादर धन्यबाद।

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  2. बेहद खूबसूरत रचना सखी

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  3. बहुत-बहुत धन्यबाद सखी।नमन

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  4. सादर धन्यबाद भाई

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