Tuesday, August 29, 2023

तिरंगा (दोहा छंद)

तिरंगा (दोहा छंद)

अमर तिरंगा ध्वज,भारत की पहचान ।
हम भारत के लोग को, इस झंडे पर  शान।।

तीन रंग का मान अब,समझ रहे सब लोग ।
तीन रंग काअर्थ है ,तभी मिला संयोग।।

*ऊपर रंग केसरिया, शक्ति का है प्रतीक।*
*सफेद रंग है बीच में,दें सच्चाई की सीख।*

*नीचे में है रंग हरा*, हरियाली की शान।
*बीच में यह चक्र सदा*, करता है गतिमान।

*इस तिरंगे पर ही तो*,हमको है अभिमान।
*इस झंडे की खातिर हम*, देंगे अपनी जान।।

जब तिरंगा लहराता, शोभित कर आकाश।
बढ़ती देश की समृद्धि, खुशियांँ आती पास।
 
जब-तक सूरज चाँद है, धरती गगन वितान।
तब-तक यह संसार में,रखे देश का मान।।

पकड़ तिरंगा हाथ में, बढ़ते वीर जवान।
देश की रक्षा के लिए,देते अपनी जान।।

नमन करें हम भारती, जोड़ कर अपने हाथ।
इस तिरंगे के आगे,झुका लें अपना माथ।।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

रेशम की डोरी (लघुकथा)

रेशम की डोरी

कसीदाकारी की हुई चांँदी की सुंदर भारी राखियांँ संभालती हुई मिनाक्षी ने कहा -"सुनो जी !अब आपकी बहन नहीं आने वाली।उसे पता था कि मुझे भी अपने भाइयों को राखी बांँधने जाना है। फिर भी आने में इतनी देर की।हो सके तो मुझे स्टेशन का छोड़ दो। मैं स्वयं ही चली जाऊंगी ।
"लेकिन बच्चों का कल से टेस्ट है ?".. 
"इसीलिए ना तुम्हें छोड़ा है। तुम इनका टेस्ट दिलवाना मैं दो-तीन दिन बाद ही आउंगी ।सोचा था  दो-चार दिन तुम्हारी बहन को यहांँ रोककर आराम से मैके घूमुंगी।" फिर वह भाई-भाभियों को देने वाली महंगे संदेशों से भरा बड़े बैग को घसीटती हुई बाहर निकल गई । 
सुशील ने घड़ी देखी और मामले की गंभीरता को देखते हुए गाड़ी निकाल ली ।थोड़ी देर बाद ही वे स्टेशन पर थे। 
कुछ देर के इंतजार के बाद ट्रेन आई और मीनाक्षी उस पर सवार होकर अपने मायका चल दी।
 गाड़ी को प्लेटफार्म छोड़ते ही सुशील को ध्यान आया। सचमुच आज सुगंधा न आई और न ही फोन कर अपने आने अथवा नहीं आने की कोई सूचना ही दी।उसने फोन का नम्बर मिलाया पर फोन स्विच ऑफ।उसका मन परेशान हो उठा। आखिर बात क्या है ?
उसने दोनों बच्चों को गाड़ी में बैठाया और गाड़ी को सुगंधा के घर की ओर मोड़ ली।
उसके घर में लटक रहे ताले को देख कर उसका मन और भी घबरा उठा।
बगल वाले से जाकर पूछा तो पता ‌चला कि उन्हें गाड़ी वाले को सरकारी नर्सिंग होम ले चलने के लिए कहते सुना।
वहाँ पहुंच उसने सुगंधा सिन्हा का नाम लिया तो रिशेप्शनिष्ट ने कहा ग्यारह नम्बर कमरा।वहाँ जाकर देखा -सुगंधा बेड पर पड़ी थी और बेड के निकट पालने में फूल -सी सुंदर और कोमल बच्ची........
उसकी सासु माँ ने पुकारा -"देख बहू तेरे भैया अपनी भांजी को देखने आ गये।
भांजी ....? सुशील का मन खुशी से झूम उठा। मैंने कई बार फोन किया लेकिन...............
बहू की तबियत अचानक इतनी खराब हो गई कि हमें फोन बगैरह लेने-सुनने की सुध ही नहीं रही।
सुगंधा ने कहा -"भैया की राखी भी घर ही में रह गयी।"फिर उसने अपने हाथ में बंधी उस रेशम की डोरी को खोली जिसे सुबह पंडित जी ने सुरक्षा का आशीर्वाद-मंत्र पढ़ते हुए उसकी कलाई पर बाँधी थी।उसे खोल उसने झट उसके तीन टुकड़े कर डाले।
सासु-माँ ने कहा -क्यों थोड़ी इसे पूरा बाँध देती ?"
लेकिन उसने कहा - "एक डोरी मेरे भैया की और दो  इनकी।" उसका संकेत भतीजों की ओर था।
फिर उसने तीनों के दीर्घ और स्वस्थ जीवन की कामना के साथ बड़े प्यार से उनकी कलाइयों पर बांँध दी। सुशील ने उसे आशीष देते हुए अपने बेटों से कहा -"देखो आज तुम दोनों की भी 'राखी' बहना आ गयी।"
सभी नवजात बच्ची के नामकरण पर हँस पड़े । सुशील की नजरें अपने कलाई पर बंधी प्यारी डोरी पर ........
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, August 23, 2023

राखी और संदेश

राखी और संदेश

धागों का  त्योहार  आया।
बहना के मन प्यार आया।
कच्चे धागे की राखी बना।
बेटों के हाथ में दिया थमा।
धरा मांँ बोली कहना मान।
चढ़ जा जाकर तू चंद्रयान।
चंदा मामा को दे आ संदेश।
अब दूर नहीं मामा का देश।
हमेशा मिलने हम आयेंगे।
तेरे घर भी झंडा फहरायेंगे।
     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, August 21, 2023

क्यों रूप बदलते चंदा मामा (कविता)

क्यों रूप बदलते चन्दा मामा


आंँगन में एक खाट पड़ी थी।
  उसके ऊपर इक टाट पड़ी थी।
     रात को उसपर मैं सो रही थी।
        मीठे -स्वप्नों में मैं खो रही थी।

चंदामामा आये हैं आंँगन मेरे।
   मेरी ओर अपना मुखड़ा फेरे।
      कर रहे हैं हंँस वे मुझसे बातें।
         शिकायत मेरी क्यों ना आते।

उसी समय टूट गई मेरी नींद।
   सुस्वप्न टूट जाने की मानिंद।
      ढूंढ़ी चंदा को मैंआँंखें खोल।
         इत-उत हथेलियों से टटोल।

अनायास ऊपर उठीं निगाहें।
   रुक गई  मेरी टटोलती बाहें।
     आसमांँ में  तारे विचर रहे थे।
        चम-चम करते निखर रहे थे।

   चंदामामा भी थे उनके साथ
      हंँस-हंँस उनसे कर रहे बात।
         चंँदामामा का देख आकार।
           मेरे मन में यह उठा विचार।

कहांँ छुपाया इन्होंने आधा अंग?
   किसी के प्रहार से हुए हैं भंग?
      एक रात देखी मैं हँंसियाकार।
          एक रात दिखते थे जैसे तार।

एक रात रूप था गोल-मटोल।
   आज मैं इनकी खोलूंगी पोल।
      मांँ से पूछा मैंने  इसका राज।
      चंँदामामा आधा क्यों है आज ?

मांँ बोली-निज धूरी पर चंदा घूमता।
   सूर्य-प्रकाश पा है चाँद चमकता रद्द ।
      प्रकाश उसपर जितनी दूर पड़ता।
        उतना ही अंग उसका हमें दिखता ।
                 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

मेरे मन की बात (कविता)

मेरे मन की बात

ऐसी इच्छा है कुछ मन में,जनहित ऐसे काम करें।
विचलित न हों कर्मपथ से,कभी नहीं विराम करें।।
जग-प्राणि के हित-साधक हो,काम वही करते जाएँ ।
जिससे जन रोशनी पाये,अहर्निश ज्योति जलाएँ ।।
भ्रष्टाचार मुक्त हो भारत,खोखला करे न देश को।
छद्म-रूप धर जो लूटता,उतारू उसके वेश को।।
भेद-भाव को दूर करें हम,जो देश का जंजाल है।
ऊँच-नीच और जाति-धर्म,मन का माया-जाल है।।
विदेशी वस्तुओं का प्रयोग,देश से दूर भगाएंँ हम।
स्वनिर्मित सामान बनाकर,स्वदेशी अपनाएँ हम।।
नव भारत के नववृंद में, नयी चेतना लाएँ हम।
विकास की सीढ़ी गढ़,ऊंँच शिखर चढ़ जाएंँ हम।।
दलगत राजनीति त्याग,शांति-सद्भाव बनाएँ हम।
समाजिक-समता बंधुत्व के,सुंदर भाव जगाएँ हम।।
दीन-दुखी,व असहायों को, सदा ही सुख पहुंचाएँ।
झूठ-विषमता को तज,सच्चाई का अलख जगाएँ।।
हमको अपने भारत को, विकसित राष्ट्र बनाना है।
भेद-भाव को दूर भागकर,समरसता अपनाना है।।
अर्थ-व्यवस्था ऐसी हो,गरीबी की रेखा मिट जाए।
अपना प्यारा देश फिर,सोने की चिड़िया कहलाए।।
जनकल्याण,राष्ट्र-हित में,अपना कर्तव्य निभाएंँ।
पुनः हमारा भारतवर्ष ,विश्वगुरू बन छा जाए।।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, August 17, 2023

परी ने कहा (बाल गीत)

परी ने कहा
सपने में आई एक परी।
हाथ में ले जादू की छड़ी।

सुंदर सफेद पहने कपड़े ।
बाल थे उसके बहुत बड़े ।

सिर पर था चांँदी का ताज।
बड़ी मीठी उसकी आवाज।

बात-बात में यह कह दिया।
दुनिया की  मैंने सैर किया।

है दुनिया भर में देश अनेक। 
तेरा भारत है लाखों में एक
कहकर वह पीछे मुड़ गयी।
औ पंख फैलाकर उड़ गयी।

        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, August 16, 2023

हम भारत के लोग (रूप घनाक्षरी)

हम भारत के लोग (रूप घनाक्षरी छंद)

अलग है बोली भाषा,
  इच्छा और अभिलाषा,
     फिर भी रखते आशा,
         हम भारत के लोग।

अलग है परिधान,
  अलग है खान-पान,
     करें सबका सम्मान,
        हम भारत के लोग।

संस्कृति में अनेकता,
   रिवाजों में अनेकता,
      रखें मन में एकता,
          हम भारत के लोग।

हिंदू या मुसलमान,
  मुगल हो या पठान,
    करते सबका मान,
     हम भारत के लोग।
     
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'