Tuesday, June 30, 2020

चलता चल ( प्रेरणा गीत )

चलता चल,चलता चल।
ओ राही तू चलता चल।
सोंच-सोंच और समझकर,
संभल-संभल कर चलता चल।

कई मुश्किलें, कई अटकलें ,
जीवन में आते हैं।
लेकिन जीवन की बाधाओं से,
वीर न घबराते हैं।
खम से ठेल विघ्न और बाधा,
हर मुश्किल से लड़ता चल।
चलता चल................

राह नहीं है छोटा भाई,
बहुत दूर चलना है।
चल-चल कर ही इस राह की
दूरी कम करना है।
तय करने मंजिल की दूरी,
कदम-कदम तू बढ़ता चल।
चलता चल.................

आँधी और हिमपात से लड़कर,
जलधारा में थमकर।
तूफानों में अडिग खड़ा हो,
बौछारों को सहकर।
चट्टानों को रौंद कदम से,
पर्वत-पर्वत चढ़ता चल।
चलता चल..........
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित,सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, June 29, 2020

देखते-देखते ( गज़ल )


क्या अजब हो गया देखते-देखते।
क्या गजब हो गया देखते-देखते।

जिसकी आगोश में है सारा जहाँ,
कोरोना  छा गया देखते- देखते।

चैन अमनों-चमन का है लुट गया,
है त्राहिमां मच गई देखते- देखते।

हम अपने ही घर में हैं कैद पड़े,
नजरबंद हो गए देखते-देखते।

मुफ्त जानें गई बेकसूरों की यहाँ।
काल बन छा गया देखते-देखते।

जो लगते थे स्वस्थ्य-निरोगी यहाँ,
वे ही फना हो गए देखते-देखते।

मन में है अजब भय समाया हुआ,
घबराया है दिल देखते- देखते।

जाने कब-तक रहेगी इसकी कहर।
है यह डर सता रहा देखते-देखते।

हे ईश्वर है बस अब तेरा आसरा,
दुःख हर ले जरा देखते- देखते।

आशा की किरण मन में है जगी,
तू दुआ बन के आ देखते- देखते।
                   सुजाता प्रिय
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

आधुनिकता की होड़ में पर्यावरण की सुरक्षा कैसे करें

यह सच है कि आज हमारा समाज आधुनिकता के दौर से गुजर रहा है।हम गाँव की अपेक्षा शहरों मे रहना अधिक पसंंद करते हैं।छोटे घरों की अपेक्षा आलिशानों में रहने में गर्व महसूस करते हैं।निकट स्थानों में भी वाहनों द्वारा ही जाना चाहते हैं।सच पूछें तोआधुनिकता के इस होड़ में हम प्रकृति का दोहन करने लगते हैं जिससे हमारा पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है ।
अब हमें सचेत होना होगा।पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए।हम आधुनिक बनकर भी पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं।
हमारी पहली कोशिश होनी चाहिए की भवन-निर्माण के समय अकारण पेड़ -पौधे को नष्ट न करें।अपने घरो में पेड़-पौधों के लिए भी थोड़ा स्थान रखें।गमलों में भी छोटे-छोटे पेड़-पौधे एवं फूल लगाकर हरियाली बढ़ायें।
  नदी तालाबों ,जलाशयों जंगल मैदानों का अतिक्रमण कर गृह निर्माण न करें।वल्कि उनकी साफ-सफाई तथा रख-रखाव की जिम्मेदारी व्यक्तिगत या सामुहिक रूप से लें।
निकट के हाट- बाजार,मंदिर,विद्यालय आदि स्थानों पर वाहन से न जाकर पैदल जाने की आदत डालें ।इस प्रकार हम स्वस्थ्य भी रहेंगे औरवाहनों से निकलने वाले धूएँ से हमारा वायु भी प्रदूषित होने से बचेगा।
हम अपने घरों को तो साफ-सुथरा   रख लेते हैं लेकिन घर के कूड़े-कचरे सड़कों तथा नदी-तालाबों में फैला देते हैं।इन आदतों में सुधार लाना होगा।
यूं कहें जल,जंगल और जमीन की सुरक्षा कर ही हम पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं।सच्चे अर्थों में पर्यावरण की सुरक्षा और संतुलन ही हमारी सच्ची आधुनिकता होगी।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, June 26, 2020

गज़ल

ना ही रहने को आलिशान घर चाहिए।
ना ही बसने को बड़ा-सा शहर  चाहिए।

जिसकी गलियों में कूड़े की ढेर न हो,
हमको गंदगी से परे वो नगर चाहिए।

जिसमें छल - कपट का निवास न हो,
मुहब्बत से भरा हमें वो जिगर चहिए।

जिसकी नजरों में हर चीज प्यारा लगे,
परखने वालों की ऐसी नजर चाहिए।

जिसे सुनकर दिल में उमंग भर उठे,
मुझको सुनने को ऐसी खबर चाहिए।

बेखटक पहुँचाए जो मंजिल हमें,
वह सीधी, सरल- सी डगर चाहिए।

जो कर दूसरे की सेवा को तत्पर रहे,
स्वयंसेवकों का ऐसा ही कर चहिए।

जो दूसरे का हित में जीये उम्र भर,
दिल वालों को लम्बी उमर चाहिए।
       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आत्मनिर्भर भारत के सपने एवं चुनौतियाँ

  अँग्रेजी दास्ता से मुक्त होने के बाद हमारा देश भारत आत्म-निर्भर हो हर क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों को बड़ी संजीदगी से निभाता चला गया।अपनी विशालता को अक्षुण बनाए रखने के लिए विकास के सपने देखने लगा । उन सपनों को साकार करने के लिए बहुत सारे कल-कारखानें , शिक्षण-संस्थानों एवं बहुउद्येशी कंपनियों एवं परियोजनाओं का संचालन-परिचालन का काम सुचारू रूप से करने के लिए कृतसंकल्प हो उठा।देशवासियों के सुख वैभव के लिए अनेकों निर्माण योजनाएँ चलाए और कामयाबी भी मिली।अपितु अभी भी भारत के सम्मुख कुछ चुनौतियाँ विराजमान हैं जिसमें सर्वप्रमुख है शिक्षा -यहाँ प्रतिभा की कमी नहीं  किन्तु शिक्षण-संस्थानों एवं शिक्षकों के आभाव के कारण या तो उनकी प्रतिभा कुण्ठित हो जाती है या फिर विश्व गुऱु कहलाने वाला भारत के होनहारों को उच्च शिक्षा एवं रोजगार के लिए विदेशी शिक्षण-संस्थानों एवं कंपनियों की शरण लेना पड़ता है।
दूसरी प्रमुख समस्या बेरोजगारी की है । मजदूर वर्ग अपने राज्य को छोड़ दूसरे राज्यों के प्रवासी हो जाते हैं ।अगर विदेशी उत्पादों के आयात रोककर अपने शहर अथवा राज्यों में ही छोटे-छोटेे कल-कारखानें खोलकर रोजगार उपलब्ध कराया जाए तो वे दूसरे राज्यों एवं देशों मे पलायन न करें।छोटे-छोटे इलेक्ट्रॉनिक सामानों के लिए हम चीन जैसे मतलबी और धोखेवाज देशों पर निर्भर न होकर अपने ही देश में उनका निर्माण कार्य करें।दुख उस समय सबसे ज्यादा होता है जब दीपावली के दीये मोमबत्तियाँ स्वस्तिक-झालर एवं सजावट के अन्य सामान भी 'मेड इन चाइना' होते हैं।इस प्रकार देश वासियों की प्रतिभा को पंगू बनाकर हम विदेशी उत्पादों पर निर्भर हो जाते हैं।अगर उन सामानों का निर्माण-कार्य  अपने देश में प्रारम्भ किया जाए तो देश वासियों को रोजगार भी उपलब्ध होगा और हमारा देश आत्म निर्भर बन एक एक सशक्त ऱाष्ट्र के रूप में उभर कर दुनियाँ के समक्ष शान से खड़ा होगा।
कौशल विकास के लिए लघु-उद्योग,कुटीर उद्योग घरेलु उत्पादों को बढ़ाबा देना एवं बाजार उपलब्ध कराना प्राथमिक जिम्मेदारियों की श्रेणी में रखना होगा।इन छोटे-छोटे उद्योगों 'द्वारा भी लोगों को रोजगार मिलेंगे और जरूरत के छोटे-छोटे सामान भी उपलब्ध होंगे। चीनी एप के बंद होने से देश वासियों में जो खुशी है , उससे कई गुना खुशियाँ स्वदेशी सामानों का निर्माण एवं इस्तेमाल से मिलेगा। स्वदेशी अपनाना आज भारत के लिए महत्वपूर्ण एवं सर्वप्रमुख चुनौती बनकर खड़ी है।
      सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Wednesday, June 24, 2020

हम दो, हमारे दो ( लघु-कथा )

आज अर्चना का मन बड़ा बेचैन था।उसकी माँ की तवियत ज्यादा खराब है।लेकिन मोहन को छुट्टी नहीं।वह अकेली चली जाती।लेकिन दोनों बच्चों की परीक्षा चल रही है। उन्हें वह ले भी नहीं जा सकती।ना ही छोड़ सकती है।
मोहन अकेले उन्हें सम्हाल नहीं सकते।किसके पास उन्हें छोड़कर जाए।पिछली बार जब वह खुद बीमार पड़ी थी तो मोहन ने पड़ोस में उन्हें छोड़ दिया था।उन्होंने उन्हें ठीक से खिलाया-पिलाया।किन्तु उनके बच्चों ने उन्हें जाने कैसी-कैसी गंदी हरक्कतें , शैतानियाँ एवं गालियाँ  सिखा दी।इसीलिए जब मोहन का एक्सीडेण्ट हुआ तो उन्हें घर में ही एक कमरे में बंद कर चली गई ।लेकिन जब वापिस आई तो देखी उतनी देर में उन्होंने कितने सारे सामान तोड़-फोड़ डाले।शरीर में कितनी जगह चोटें लगा ली।आपस में लड़कर एक-दूजे का शारीरिक नुकसान भी कर लिया।
     काश कोई घर में उन्हें देख-भाल करने वाला होता।
पर कोई देख-भाल करने वाला होता कैसे ? उसकी अंतरात्मा ने उससे पूछते हुए याद दिलाया। तुम तो किसी को अपने साथ रहने नहीं देती।अभी भी घर से आते वक्त मोहन साथ में अपनी माँ को लाना चाहता था तो तुमने उसेे मना करते हुए कहा था हमारे घर में बस हम दो , हमारे दो ही रहेंगे। कभी भी माँ-पिताजी या कोई परिवार का सदस्य आ गया तुम्हारी तवियत बिगड़ जाती है या खाना बनाना भूल जाती हो।पिछली बार पिताजी आए थे तो उन्हें बार-बार मैगी खाने दे देती थी।जबकि तुम्हें पता है कि उन्हें मैंगी नहीं पसंंद।
लेकिन उनके रहने पर मुझे अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती है।फिर बच्चे उनसे चिपके रहते हैं और समय पर पढ़ाई -लिखाई नहीं कर पाते।उसने अपने आप से कहा।
तो फिर तुम्हारी मदद कोई कैसे कर सकता है। तुम एकल परिवार में रहोगी तो बच्चों को संयुक्त परिवार की सुरक्षा कैसे मिलेगी ?
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

हम सैनिक भारत देश के

हम सैनिक भारत देश के।
हाँ सैनिक भारत देश के।

बर्दी हमारी खाकी रंग की।
पैरों में बूट सिर पर है टोपी।
एकरूपता की शान लिए हम,
लगते हैं अच्छे यह वेश में।
हम सैनिक भारत देश के।

जब भी मुख हम खोलते।
भारत की जय हम बोलते।
महा मंत्र है यही हमारा ,
जपते जय-जय देश की।
हम सैनिक भारत देश के।

बढ़ते जाते हम सीना तान।
हथेली पर हम रखकर जान।
जान की अपनी दे कुर्वानी,
रक्षा करते हम देश की।
हम सैनिक भारत देश के।

कदम न अपना रूकने देंगे।
झंडे को हम ना झुकने देंगे।
माँ की रक्षा करते जाएँ,
हम सारे दुश्मन देश से।
हम सैनिक भारत देश के।
    सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
        स्वरचित