Monday, December 23, 2024

विश्वासघात

विश्वासघात
सुंदरवन में जामुन पेड़ पर रहता था एक बंदर।
नीचे एक नदी थी जिसमें,राहत था एक मगर।
दोनों गहरे मित्र थे,घुलमिल कर बातें करते थे।
दोनों मिल जामुन खाते,नदी का पानी पीते थे।
एक दिन बहला बंदर को,पीठ पर मगर बैठाया।
कहा मगरनी ने आज है,दावत पर तुझे बुलाया।
पहुंचे जब वे बीच नदी,मगर ने बंदर को बताया।
मैं तो दोस्ती का वास्ता दे,छल से तुझे ले आया।
कोई दावत नहीं भाई! न मगरनी ने तुझे बुलाया।
तेरा कलेजा मीठा होगा,तूने जामुन बहुत खाया।
इसीलिए तुझे मार कर मैं,कलेजा तेरा खाऊंगा।
बहुत दिनों पर मन की,हसरत आज मिटाऊंगा।
कहा मगर से झट बंदर ने,काबू रखकर भय पर।
मैंने तो कलेजे को सुखने,दिया है पेड़ के ऊपर।
जल्दी से मुझको पेड़ तक,वापस तुम पहुंचा दो।
उठा पेड़ से अपना कलेजा,झट मैं तुम्हें थमा दूं।
पेड़ तक उसको ले आया,मगर ने बातों में आकर।
झट से पेड़ पर चढ़ बैठा,बंदर ने छलांग लगाकर।
ऊंँची डाली पर चढ़कर बोला-सुन रे कपटी मित्र।
कलेजा पेड़ पर सुखता ,यह बात नहीं है विचित्र।
जो जन अपने ही मित्रों से, विश्वासघात करते हैं।
कोई उसका मित्र न होता,सभी जन दूर रहते हैं।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आया बंदर

आया बंदर 

कूद- कूदकर आया बंदर। 
    मेरी मधु बगिया के अंदर।। 
        आमों की डाली पर झूला। 
            अपनी करनी पर खूद फूला।। 

चुटकियों में फूल मसलकर। 
    नन्हें- नन्हें पौध कुचलकर।। 
        सब तहस-नहस कर डाला। 
            पके फलों को तोड़ उछाला।।

बीच चबूतरे पर चढ़ बैठा। 
    थके देह को थोड़ा ऐठा।।
         चोरी- चोरी चुपके- चुपके। 
             धीरे -से मैं पहूँची छुप के।।

लम्बी पूंछ उसकी झट पकड़ी। 
    हथेलियों में कसकर जकड़ी।। 
         बंदर बोला खीं- खीं करके। 
             पूछ छोड़ मैं भागी डर के।।

उछल कर बंदर आगे आया। 
    आँख दिखाकर मुझे डराया।।
         चिल्लाई मैं माँ-माँ कहकर। 
            बंदर भागा तुरंत उछल कर।।

                      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, December 20, 2024

घड़ी

घड़ी

टंगी हुई दीवार पर
        टिक-टिक-टिक गाना गाती। 
अपने दोनों हाथ घुमाकर, 
         हमें समय का भान कराती। 
कभी न रुकती,कभी न थकती। 
       गतिशील होना हमें सिखाती। 
निरंतर आगे बढ़ती जाती, 
         पथ पर बढना, हमें बताती।
भोर हुआ उठ पढो सभी, 
       अलार्म बजाकर हमें जगाती। 
समय से करना,काम सीखाती, 
      समय का हमें पावंदी बनाती। 
समय से मेरे काम कराती, 
          इसीलिए हम सबको भाती। 
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

हम देश को बनाएँगे

हम देश को बनाएंँगे 

हम देश को बनाएंँगे,गुलशन से भी प्यारा। 
बन जाए हिन्द मेरा,संसार में न्यारा। ।
बन जाए हिन्द मेरा............ 
इसकी गली-गली में, बसे प्यार के ही घर हों। 
बसी प्यार की ही बस्ती,बसे प्यार के नगर हों। 
पगडंडी प्यार की हो, और प्यार के डगर हों। 
मंदिर भी प्यार की हो,पूजा जिधर- जिधर हो। 
स्वर प्यार के ही गूंजे, संकल्प हमारा।
बन जाए हिंद................ 
इसके वन- उपवन में घने वृक्ष प्यार के हों। 
पर्वतों में इसकी चोटियाँ, प्यार की हों। 
फूलवारियों खिलती कलियाँ भी प्यार की हों। 
पेड़ों की डालियों में, लदे फल भी प्यार के हों। 
नदियों के दोनों कुल में, बहे प्रेम की धारा।
बन जाए हिन्द मेरा................. 
हम रोशनी करेंगे,प्यार का दिया जलाकर। 
दूर होगें तम यहाँ से,नफरतों को मिटाकर। 
जब राह न मिले तो,नव पथ हम गढेंगे। 
हम साथ-साथ चलकर मंजिल तरफ बढेंगे। 
अपने सभी जनों को देकर के हम सहारा।
बन जाए हिन्द मेरा........... 
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, December 19, 2024

लालच बुरी बलाई

लालच बुरी बलाई

चार मित्र एक बार शाम को, 
टहल रहे थे पथ पर। 
वहाँ उन्होंने जाते देखा, 
एक सेठ को रथ पर। 

रथ से पथ पर एक पोटली, 
गिर पड़ी वहाँ फिसलकर। 
रथ बढ गया आगे तब, 
मित्रों ने झट उछल कर। 

उठा लिया उस पोटली को, 
फिर देखा उसको खोल। 
उस पोटली में थे बंधे, 
रतन बड़े अनमोल। 

देख रतन को उनके मन में, 
लालच ने आ घेरा।
बड़े प्यार से उन मित्रों ने, 
हाथ रतन पर फेरा। 

झट से बेच दिए रत्नों को, 
जौहरी के घर जाकर। 
बाट लिए पैसे आपस में, 
उन चारो ने बराबर। 

इतने में आ घेरा उन्हें, 
सिपाहियों के दल ने। 
कह चोर गिरफ्तार किया, 
लगे हाथ वे मलने। 

यदि पोटली रत्न भरी वह, 
सेठ को वापस देते। 
अपनी सज्जनता पर कुछ,
इनाम भी पा लेते। 

पर लालच में आकर समाज में, 
चोर बने वे भाई। 
इसीलिए तो कहते हैं कि,
लालच बुरी बलाई। 
       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

रेल

रेल 
छुक-छुक करती रेल चली। 
करती कितने खेल चली।।
इंजन दौड़े आगे-आगे।
उसके पीछे डब्बे भागे।।
 रेल हमारी बड़ी सवारी।
 ढोती माल भारी भारी।।
छुक छुक भाई छुक छुक। 
प्लेट फॉर्म पर जाती रुक।।
यात्री चढ़ने और उतरते।
फिर अपने गंतव्य पर बढ़ते।।
लोहे की पटरी पर चलती।
कभी न रुकती कभी न थकती।।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, December 18, 2024

अधूरा ज्ञान

अधूरा ज्ञान 

कहां कबूतर-सुन भाई तीतर!
              घोंसला बनाने सीखाओ।
बोला तीतर-तिनके लेकर,
                 गोल-गोल उसे घुमाओ।
थोड़ा समझकर,कहता कबूतर,
               हांँ-हाँ मैं सब समझ गया।
अधूरा पाकर, ज्ञान कबूतर,
           कभी घोंसला नहीं बना पाया।
जो जन ज्ञान अर्जित करने में,
                    चित को नहीं लगाते हैं।
वे कभी अपने जीवन में,
                     सफल नहीं हो पाते हैं।
         
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'