Wednesday, July 27, 2022

सावन महीना (कजरी )



          सावन महीना
हरि बोलो ! सावन महीना पावन, मनमा हरसे हरि बोलो।
हरि बोलो ! रिमझिम रिमझिम, मेघा बरसे हरि बोलो।

गड़-गड़, गड़ -गड़ बोले बदरिया।
चम-चम,चम-चम चमके बिजुरिया।
हरि बोलो !अजब आवाज आबे, अम्बर से हरि बोलो।
हरि बोलो!सावन महीना...........

वर्षा की देखो है बुंदे ये न्यारी।
लगती है यह हर जन को प्यारी।
हरि बोलो ! कड़क -कड़क कर,बदरा गरजे हरि बोलो।
हरि बोलो!सावन महीना .........

धरती पर छायी है हरियाली।
हरी- भरी है पेड़ों की डाली।
हरि बोलो ! खेतों की क्यारी में, पौधे लरजे हरि बोलो।
हरि बोलो !सावन महीना...........

       सुजाता प्रिय समृद्धि

Tuesday, July 26, 2022

तुझको मेरा प्रणाम



               तुझको मेरा प्रणाम

आजादी के दीवाने ! तुझको मेरा प्रणाम।
बारम्बार प्रणाम तुझको, बारम्बार प्रणाम।
प्रणाम- प्रणाम -प्रणाम, प्रणाम- प्रणाम -प्रणाम।

तूने ऐसा कदम उठाया,भागे अँग्रेज यहाँ से।
जिधर घूम तुम धूम मचाये भागे वे वहाँ से।
अँग्रेजी शाशन का तुमने,कर दिया काम तमाम।
बारम्बार प्रणाम तुझको..............

गाँधी की आँधी चली तो उड़े यहाँ से फिरंगी।
सिर पर पाँव रखकर भागी उनकी सेना सतरंगी।
फिर यहाँ आने की उसने लिया कभी ना नाम।
बारम्बार प्रणाम तुझको.............

भारत पर शासन करते थे,अँग्रेज यहाँ कुटनीति से।
प्रबुद्ध जनों को ज्ञात हुआ जब छलियों की राजनीति से।
अपनी रणनीति से उसको भगा दिया सरेआम।
बारम्बार प्रणाम तुझको............

उनकी मनमानी से पीड़ित हो जब वीर भारत के जागे।
पश्चिम के गोरे-छलिये तब,टिके नहीं उनके आगे। 
आजादी के विगुल के आगे टिके नहीं इक शाम।
बारम्बार प्रणाम तुझको.............
                     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आजादी कैसे मिलती है।

आजादी कैसे मिलती है

आजादी कैसे मिलती है,पूछो तुम उन वीरों से।
जिन्होंने अपना सिर टकराया, गुलामी की जंजीरों से।
जिन्होंने अपना सिर..........
अथक परिश्रम और प्रयास से आजादी दिलवाई थी।
अपने जीवन का दांव लगा, दुश्मन को धूल चटाई थी।
कितने युद्ध किया था उसने पूछो उन रणधीरों से।
जिन्होंने अपना सिर................
आजादी की खातिर जिसने,अपना खून बहाया था।
भारत को आजाद कराने,अपना सिर कटवाया था।
जीवन के अंतिम छण तक,डटे रहेे,डरे नहीं बलवीरों से।
जिन्होंने अपना सिर...............
सीने पर गोली खायी थी और अपमान के घूँट पीये।
बाँध कफ़न भीड़ गये थे उनसे, कहते हुए हम बहुत जिये।
अपनी ज़िद पर अड़े हुए,पार गये लकीरों से।
जिन्होंने अपना सिर ................
कितने बंकर उड़ा दिये थे,कितनी सेना मारी थी।
मत पूछो इनके आगे दुश्मन की सेना भारी थी।
कितने चौकी ध्वस्त किये थे,पूछो
किन तदवीरों से।
जिन्होंने अपना सिर...............
चढ़ गये फाँसी हँसते-हँसते, तनिक नहीं वे घबराये।
भारत माँ की रक्षा की कसम नहीं टूटने पाये।
इसलिए हंँसकर प्राण गंवाई थी,पूछो इन प्राचीरों से।
जिन्होंने अपना सिर..............
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, July 24, 2022

आजाद देश में जन्म लिया है

आजाद देश में जनम लिया हैं

आजाद देश में जनम लिया है,इसका है गुमान हमें।
आजाद देश के वासी हैं हम,इसका स्वाभिमान हमें।

अपनी इस आजादी को हम, कभी नहीं मिटने देंगे।
भारत की इस थाती को हम,
कभी नहीं लुटने देंगे।
अमिट धरोहर है अपना यह इसपर है अभिमान हमें।
आजाद देश के वासी हैं हम.......
हमारी पावन धरती पर अब कोई आँख उठाएगा।
चूर करेंगे स्वप्न उसके हम, हाथ मलकर रह जाएगा।
मक्कारी और गद्दारी की हो गयी अब पहचान हमें।
आजाद देश के वासी हैं हम........
मन में इच्छा यही हमारी देश रहे आजाद मेरा।
धन-जन और संसाधन से देश रहे आवाद मेरा।
दुनिया इसका अनुसरण करती,इसका है अभिमान हमें।
आजाद देश के वासी हैं हम........
पहन सदा ही शान करे यह गंगा-यमुना की माला।
ऊँचा सीना सदा ही रखे, हिमालय पर्वतमाला।
जिसके कारण है मिलता, सदा जग में पहचान हमें।
आजाद देश के वासी हैं हम........
                 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, July 21, 2022

मेघा (जलहरण घनाक्षरी)



मेघा ( जलहरण घनाक्षरी )

देखो बादल आया है,
आसमान में छाया है।
सबका जी हर्षाया है,
गरज-गरज कर।

सावन की बहार है,
बादलों के पार है।
पड़ रही फुहार है,
झमक -झमक कर।

बरस रहा जोर से,
देखो तो चारों ओर से।
छाकर घनघोर से,
टपक-टपक कर।

मेघा जब भी आती है।
सभी जनों को भाती है।
नयी उमंग लाती है।
हरस-हरस कर।

सुजाता प्रिय समृद्धि

Wednesday, July 20, 2022

उतावलापन (लघुकथा)

उतावलापन (लघुकथा)

सावन आने के पहले से ही महेशजी और उनकी पत्नी चित्रा अत्यंत उत्साहित थे। प्रत्येक वर्ष सावन महीने में वे दोनों कांवर लेकर पैदल जल चढ़ाने बैजनाथ धाम अवश्य जाते थे। इस बार भी जाना है । दोनों ने तैयारी शुरू कर दी। दोनों ने गेरूए रंग के नये कपड़े,कांवर इत्यादि खरीदे। बच्चों के लिए घर में छोड़ने हेतु जरूरी सामान खरीदे कर रख दिया। देखभाल के लिए दादा-दादी हैं ही।निश्चित तिथि को रात्रि के रेल- गाड़ी से सुल्तानगंज के लिए चल दिए। गाड़ी सुबह सही समय पर पहुंची।वे काफी खुश थे कि सुबह में ही जल लेकर चल देंगे। लेकिन जब गंगा किनारे नहाने पहुंचे।बैग में देखा तो उसमें उनके कपड़ों की जगह बेटे -बेटियों के कपड़े रखे थे। चित्रा ने बैग को अच्छी तरह से देखा तो सारा माजरा समझ में आ गया। उन्होंने नये बैग में नये कपड़े रखे थे। लेकिन महेश जी उतावलेपन में पुराने बैग जिसमें चित्रा बच्चों के नये और अच्छे कपड़े रखी थी, उसे उठा लिया लाने के लिए। चित्रा भी इतनी उतावली थी कि यह ध्यान नहीं दे पायी कि उन्होंने पुराना बैग उठा रखा है।
अब स्नान से पूर्व दोनों मिलकर फिर से कपड़े तथा यात्रा में प्रयुक्त होने वाले जरूरी सामानों को खरीदारी की।फिर स्नानादि कर जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए चल पड़े।
उतावलेपन के कारण सारे सामान दोबारा खरीदने का मलाल मन में अलग से रहा, साथ में पूरी यात्रा वे बारी-बारी से बच्चों के कपड़े से भरे बैग को भी ढोते रहे।
         सुजाता प्रिय समृद्धि

Tuesday, July 19, 2022

दहलीज (लघुकथा)



दहलीज (लघुकथा)

सास के उलाहने -तानों, ननदों के दुर्व्यवहारों, देवर की अकड़ और शराबी पति की बदसलूकियों से परेशान शोभा ने फैसला लिया  कि आज वह यह घर छोड़ देगी।जिस घर में मान-सम्मान नहीं, प्यार-मुहब्बत नहीं,उस घर में रहने से क्या फायदा।उसने अपना पर्स उठाया और सोचा दो घंटे में मायके पहुंच मांँ को इनका रवैया बताऊंगी। फिर जो होना होगा सो होगा। फिर इस घर में वापस नहीं आना।पति और ससुर जी आफिस,देवर ननद सभी कालेज।सासु माँ की खर्राटे की गूंज सुनते ही वह बाहर के कमरे में आ गयी।अभी सुनहरा मौका है जाने का। जैसे ही कमरे की दहलीज लाँंघी उसे माँ जी द्वारा दिलवाया गया वह वचन याद पड़ गया , जब पहली बार इस घर में प्रवेश करते हुए इस दहलीज के अंदर कदम रखी थी। बोलो बहू ! "घर के इस दहलीज से कभी वापस नहीं जाऊँगी।"उसने सोचा,ना जाने कैसे -कैसे वचन दिलवाये जाते शादी के वक्त।उन वचनों का क्या ? जो वर-कन्या को बोलने कहा जाता है बोल देते हैं।
"बहू जरा पानी पिलाना " सासु माँ की आवाज आयी। पानी दे ना दे उन्हें?वह असमंजस की स्थिति में खड़ी हो गयी। तभी शादी के समय अपनी माँ द्वारा माँ जी को बोली गयी यह बात उसे याद आयी-"आज से मेरी शोभा आपके घर की शोभा है।अब आप ही इसकी माँ हैं।" उसने सोचा मैंने भी तो अपनी माँ से कम सम्मान उन्हें नहीं दिया।बहू !माँ जी ने फिर पुकारा।दिल ने कहा माँ जी को पानी दो।अगले ही पल वह मन में दृढ़ निश्चय कर बुदबुदा उठी।हाँ मैं इस दहलीज को छोड़कर नहीं जाऊँगी।सभी मुझे परेशान करते हैं तो करें। मैं उनके व्यवहारों की अनदेखी करूँगी या फिर उन्हें अपने अनुकूल ढाल लूंगी।इस दृढ़ वचन का संकल्प ले वह दहलीज के अंदर जाकर माँ जी को पानी देने लगी।
             सुजाता प्रिय समृद्धि