Monday, July 18, 2022

शिव (दोहा)

जय माँ शारदे
शिव ( दोहा )
शिव देवों के देव हैं, चरणों में प्रणाम।
हर-हर,शिव-शिव बोल तू,जपते जाओ नाम।।

सबका ये संकट हरे,सब के पालनहार।
जग वालों पर हैं सदा, करते वे उपकार।।

मस्तक पर चंद्रमा,जटा गंग की धार।
बाघम्बर ओढ़े,वंदन,गले सर्प की हार।।

एक हाथ त्रिशूल है, कमण्डल दूजे हाथ।
नत्मस्तक होकर सदा, भक्त झुकाते माथ।।

मंदिर में विराजते, पार्वती के संग।
सारा जग घूमते,चढ़ बसहा के अंग।।

खाते हैं भांग चबा, लगाते हैं विभूत।
कार्तिक और गणपति, दोनों इनके पूत।।

पहला सोमवार (भोजपुरी भाषा)

पहला सोमवार बा (भोजपुरी भाषा)

सावन के बहार बा,पहला सोमवार बा,
भोला बाबा के धेयान लगाबा,सबके बेड़ा पार बा।

गंगाजल भोला पर चढ़ावा,हर-हर,बम-बम बोल के।२
चंदन  घीस-घीस लगावा,जी भर मननमा खोल के।
बाबा ही आधार बा,हमरा के आसार बा,
भोला बाबा के धेयान लगाबा,सबके बेड़ा पार बा।

आँक-धथुरा फूल चढाबा,और चढ़ाबा बेलपत्तर।
भांग पतैया पीस चढ़ाबा,और चढ़ाबा तू इत्तर।
नैया मझधार बा,बाबा खेवन हार बा,
भोला बाबा के धेयान लगाबा,सबके बेड़ा पार बा।

धूप-दीप नैवेद्य चढ़ाबा,जराबा,घी के बाती जी।
भजन आरती सब मिली गाबा,जागा सारी राती जी।
बाबा के दरबार बा,गूंजत जय जय कार बा।
भोला बाबा के धेयान लगाबा,सबके बेड़ा बा।

भोला बाबा औघड़दानी,सब जन के वर देबेे ला।
बाबा उनकर आस पुरैहें,जे इनखा के सेबे ला।
महिमा अपार बा,जानत संसार बा,
बोला बाबा धेयान लगाबा सबके बेड़ा पार बा।
           सुजाता प्रिय समृद्धि

Saturday, July 16, 2022

सावन ( सायली छंद )



सावन 
है आया
नभ में देखो
है बादल
छाया।

टपक
टपक कर
बरसता है पानी
सबका मन
हरसाया।

वन 
उपवन में
झूमते हैं पादप
हरियाली है
छायी।

बयार
चले अब
ठंडी -ठंडी यह
सबको है
भायी।

नयी
उमंग है
नयी तरंग है
सबके जीवन
में।

नव
उल्लास है
नव परिहास है
सबके मन
में।

भरे
हुये हैं
कूप ताल तलैया
नदिया और
पोखर।

तैर
रहे हैं
अब सारे जलचर
बहुत खुश
होकर।

सुजाता प्रिय समृद्धि

Friday, July 15, 2022

आ गेलै सावन ( मगही गीत )




आ गेलै सावन हे सखिया

देखा आ गेलै सावन हे सखिया।
इस महीना है पावन हे सखिया।

जल्दी से केसिया चोटी बना ला।
मथबा में सेनुर-टिकुली लगा ला।
करूँ मेंहदी लगावन हे सखिया।
देखा आ गेलै सावन, हे सखिया।

अब खेतबा में भर गेलै पानी हे।
 केयरिया  के रंग होलै धानी हे।
क्या धान रोपावन हे सखिया।
देखा आ गेलै सावन हे सखिया।

सब मिलके बगिया में जैबै से सखी।
संग मिलके गीतिया गइवै हे सखी।
करूं झूला झूलावन हे सखिया।
देखा आ गेलै सावन हे सखिया।
         सुजाता प्रिय'समृद्धि'
               स्वरचित

Thursday, July 14, 2022

मेला (सायली छंद )



सायली छंद

           मेला

शहर 
के बाहर 
कितना बढ़िया देखो 
लगा है 
मेला।

मेले 
के पास 
भांति -भांति का 
लगा  है 
ठेला।

उन 
ठेले में 
चाट-पकौड़े गुपचुप 
लगे हुए 
हैं।

रंगीन 
आइस्क्रीम औ 
शरबत से ठेले 
सजे हुए 
हैं।

मेला 
हम जाएंगे 
खूब मिठाई खाएंगे 
संगी-साथी 
संग।

खूब 
घूमेंगे-फिरेंगे 
मौज-मस्ती करेंगे 
और मचाएंगे 
हुड़दंग।

हम 
तरह-तरह 
के झूले में 
साथ-साथ 
झूलेंगे।

और 
पेंग बढ़ाकर
 साथ-साथ हम, 
आसमान को 
छुएंगे।

सीटी 
और बाजे 
भी हम लाएंगे 
सब मिलकर 
बजाएंगे।

मेले 
घूमने की 
खुशियांँ में हम 
प्यारा गीत 
गाएँगे।
           सुजाता प्रिय समृद्धि

अमानत (लघुकथा)मगही भाषा



अमानत (लघुकथा)
(मगही भाषा)

सहोदरी चाची आउर दिनेसर चच्चा पाँच महीना पर घूर के गाँव अइलथिन।बथान के खूंट्टा देखके उनकर मनमा बड़ी दुखी हो गेलै। गैया बछड़ा बिनु सब सुन लग रहलै। लेकिन मन में धिरीज धर के सोचलथिन ऐसने आफते आ गेलै तो कि करतिए हल।दूर शहर में बेटा के एक्सिडेंट के समाचार सुनके गाय-गोरू के होस करने रहलै ।सब छोड़ छाड़ के चल गेलिऐ।इस सब सोचते घरबा घुसे लगलथिन तो रधबा के मैया पर नजरिया पड़लै।देहिया में आग लग गेलै।दिनेसर चच्चा से भुनभुना के कहलथिन वसुदेबा के चिट्ठी पहुंचलै हल कि रधबा के मैया बाबु हमर सभे गैया बछड़बा के हथिया के अपन गोशलबा में बांध लेलकै।रुक तनी खा-पीके असथीर होबे दे तब तोर झखुरबा खीच खींच के मार हिऔ।आफत पड़ला पर थोड़ा दिन घर छोड़े के मतलब इ थोड़े होब हकै कि सब कुछ कोय लूट लेय।चीज वस्तु के तो घर में रखके ताला मार देलिऐ।बाकी जीब-जानवर बंद थोड़े कैल जा हकै। बोलते बोलते हाथ मुंह धोके जैसे ओसरा पर ऐलथिन रधबा के मैया भर कटोरा दही अउर थरिया में आठ-दस गो रोटी लेके ऐलै अउर चौकिया पर रख के उनका गोड़ लगे लगलै।कहल जा हकै कि भुक्खल आदमी के गोस्सा भोजन देखें शांत हो जा हकै।से सहोदरी चाची अउर दिनेसर चच्चा के हालत भी ओइसने हो गेलै।झट से दूधा नहैइहा,पूता फरिहा के आशीर्वाद देके चौकिया पर भोजन जिमे बैठ गेलथिन।तब वे रधबा माथबा पर मटुकी लेके अउर ओकर बाबु हथबा में थैला लेके अएलथिन।इस कि है रे रमेशर?दिनेश्वर चच्चा अचरज से पुछलथिन।इस तोहफे अमानत है चच्चा।तोहर गैया के दूध-दही अउर गैइठा बेचके जे पैसा होलै आउर थोड़े घी होलै।अर्से तोर गोशलबा में तोहर अमानत गैया बछड़बा के बांध देबै।सहोदरी चाची मथबा झुका के पछताय लगलथिन।इस हमर गाय-गोरू के समहार के रखलकै अउर हमें..........दिनेशर चच्चा कहलथिन घीया कहे ले देलहीं रे।बाल बुतरुअन खैते हल अउर पैसों तो भी तोरे होतै।तोहनी के मेहनत के कमाई हमें काहे लेबै।इस तोर अमानत हकौ।तू समय अमानत के सम्हार के रखलहीं इहे बहुत हकै।
        सुजाता प्रिय समृद्धि

Wednesday, July 13, 2022

गुरु को नमन



जब ज्ञान गुरु ने दिया हमको,
हम आज कहाते ज्ञानी हैं।
गुरु ज्ञान के आशीर्वचनों से,
हम बने स्वाभिमानी हैं।

बिन गुरु ज्ञान न पाते हम।
मूर्ख सदा ही रह जाते हम।
गुरु ज्ञान की राह दिखाई हमें,
फिर बोलो क्या हैरानी है।

हम मूरख और अज्ञानी थे।
अज्ञानतावश अभिमानी थे।
गुरु ज्ञान-नदी में डुबा हमको,
नहलाये वे ब्रह्म ज्ञानी हैं।

गुरु सच्ची राह दिखाते हैं ।
अज्ञानता को दूर भगाते हैं।
गुरु सच्चे साधक हैं जग में,
और अमृत उनकी वाणी है।

सिखाते हमको सदाचार गुरु।
किये हम पर यह उपकार गुरु।
है शीश झुकाके नमन उनको,
गुरु ज्ञान के बड़े ही दानी हैं।

सुजाता प्रिय समृद्धि