Sunday, February 6, 2022

रूप बदलते चंदा मामा

रूप बदलते चन्दा मामा

             आंगन में 
        एक खाट पड़ी थी।
उसके ऊपर इक टाट पड़ी थी।
               रात को 
      उसपर मैं सो रही थी।
मीठे -स्वप्नों में मैं खो रही थी।
            चंदामामा 
      आये हैं आंगन मेरे।
मेरी ओर अपना मुखड़ा फेरे।
            कर रहे 
    हैं हंस वे मुझसे बातें।
शिकायत मेरी क्यों ना आते।
          उसी समय
       टूट गई मेरी नींद।
सुस्वप्न टूट जाने की मानिंद।
             ढूंढ़ी चंदा
        को मैंआंखें खोल।
इत-उत हथेलियों से  टटोल।
             अनायास
        ऊपर उठीं निगाहें।
रुक गई  मेरी टटोलती बाहें।
           आसमां में 
        तारे विचर रहे थे।
चम-चम करते निखर रहे थे।
             चंदामामा 
         भी थे उनके साथ
   हंस-हंस उनसे कर रहे बात।
               खेल रहे
       थे लुक छिप खेल।
इक- दूजे से वेे रखकर मेल।
             चंदामामा
        का देख आकार।
मेरे  मन में यह उठा विचार।
          कहां छुपाये
        हैं वे आधा अंग। 
किसी के प्रहार से हुए हैं भंग।
             एक रात 
      देखी मैं हंसियाकार।
   एक रात दिखते थे जैसे तार।
               एक रात 
       रूप था गोल-मटोल।
आज मैं इनकी खोलूंगी पोल।
               मां  से 
       पूछा मैंने  इसका राज।
 चंदामामा आधा क्यों है आज।
              मां बोली
       चंदा बड़ा है नटखट।
रूप बदलता रहता है झटपट।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
          स्वरचित, मौलिक

Saturday, February 5, 2022

सरस्वती वंदना ( मगही भाषा )



सरस्वती वंदना ( मगही भाषा )

वीणा बाजे रे, सरस्वती माय के द्वार में।
मनमा नाचे रे, उ वीणा के झंकार में।

रोज मैया के ध्यान लगैबै,
चरनियां में सिर नवा के।
मैया हमरा देथिन आशीष
दुनु हथबा उठा के।
हमर आस पुरैहा मैया,
विद्या-बुद्धि वरदान दे।
जीवनमा संवरे रे, मैया के दुलार में।
वीणा बाजे ये,................

सरस्वती मैया,होवा सहैया,
हमरा तूं वरदान दा।
हम मुरख-अज्ञानी मैया,
हमरा सच्चा ज्ञान दा।
विद्या दायिनी मैया मोरी,
इहे हमर अरमान है।
झूम-झूमके नाचूँ रे, मैया तोहर प्यार में
वीणा बाजे रे,.....................
            सुजाता प्रिय समृद्धि

Thursday, February 3, 2022

छोटे बच्चों की छोटी सरस्वती मां



 छोटे भक्तों की छोटी सरस्वती मां

रविवार की छुट्टी चंदा देने में ही गुजर गया। दसवीं बार चंदा देकर लान में बैठी और उनके द्वारा चंदा के ज्यादा पैसे देने का आग्रह, मनुहार, दबाव सभी बातें याद कर झल्ला रही थी कि फिर किसी ने होले-होले गेट बजाएं ।मैंने नजरें उठाकर गेट की ओर देखा, कोई नजर नहीं आया ।मैं अपने मन का वहम समझकर नजरें नीची कर ली। फिर वह गेट बजने के ठक ठक ठक  इस बार मैं उधर देखी तो बहुत ही मधुर आवाज में किसी बच्चे ने पुकारा आंती ! मैं सोची शायद बगल का बच्चा होगा। बोली अंदर आओ ।तुरंत गेट खोल कर पांच से सात साल के छः -सात अनजाने बच्चे अंदर प्रविष्ट हो गए ।
मैंने आश्चर्य से पूछा क्या बात है ? उन्होंने विनम्र स्वर में कहा चंदा दीजिए अंती।
मैंने उनसे पूछा -कहां का चंदा? एक बच्चे ने तुतलाते हुए कहा- छिछु-छंगम का। मैंने पूछा यह शिशु संगम कहां है ?
यह पलाथा फिल्द में है।
 मैंने कहा -तो तुम लोग को चंदा मांगने क्यों भेजा गया ?
भेदा नहीं गया। हम लोग अपने आए हैं ।
वहां पूजा कौन करेगा ?
हम लोग कलेंगे। 
तुम लोग इतने छोटे-छोटे बच्चे हो और पूजा करोगे।
 इतने छोटे होकर हम पलाई कलते हैं, तो छलछती मां की पूदा नहीं करेंगे ?
मैं सोची शायद उन लोग घर में पूजा कर रहे हैं ,या किसी समूह में शामिल होंगे । इसलिए चंदा देने के लिए उठी ।क्योंकि मेरा मानना है कि यदि हम चंदा नहीं देंगे तो इतने भव्य श्रृंगार -सज्जा के साथ कोई एक व्यक्ति पूजा कैसे करेगा आखिर पूजा में घूमने का आनंद और मां सरस्वती  के दर्शन और प्रसाद ग्रहण करने हम भी तो जाते हैं ।इसलिए यथासंभव चंदा देकर सहायता तो हमें भी करना चाहिए ।
मैं जानती थी कि कितना भी चंदा दो उसमें वृद्धि के लिए वे जरूर कहेंगे ।इसलिए दस दस के कुछ नोट और एक के कुछ सिक्के हाथ में लिए उनके पास आए और ₹11 बढ़ाती बोली लो चंदा।
इतना थे क्या होगा आंटी ?एक ने मुस्कुराते हुए कहा 
क्यों नहीं होगा तुम छोटे हो ।
नहीं आंटी और दीजिए दूसरे ने कहा।
 कितना दूं  ?दस रुपए और दे दूं ?
 नहीं कुछ औल।
 कितना 10 और ?
नहीं उसने ठुनकते हुए कहा ।
मैंने हंसते हुए उन नन्हे- मुन्ने शिशुओं को निहार रही थी ।
उनमें से एक ने कहा -आंती मैं इंछाफ की बात कहता हूं ।हम छभी के हाथों में आप ग्यारह-ग्यारह रुपए दे दीजिए ।
उनकी तोतली इंसाफ से मुझे बहुत हंसी आई और मैंने सब को ग्यारह-ग्यारह रुपए पकड़ा दी ।
वे खुशी-खुशी चले गए 
मूर्ति विसर्जन के दिन हाथ में कैमरा लेकर मैं गेट पर खड़ी होकर सरस्वती माता की मूर्तियों का विसर्जन हेतु ले जाते देख रही थी ।क्योंकि सारी मूर्तियां मेरे घर के सामने से ही गुजरती थी अचानक शिशुओं के दल ने आकर कहा आंती! प्रसाद ले लीजिए। मैंने हाथ बढ़ाकर प्रसाद ले लिया ।चंद दाने इलायचीदाने में जो श्रद्धा उमड़ी वह लड्डू -बूंदी वाले प्रसाद में भी नहीं ।तभी उनमें से एक ने कहा देखिए आंती हमारी सरस्वती मां।
 मैंने देखा एक ठेले पर मात्र 2 फुट की सुंदर -सलोनी सरस्वती मां हाथों में छोटी वीणा लिए होठों पर स्निग्ध मुस्कान लिए मुस्कुरा रही हैं ।मैं अवाक देखती रह गई। उनमें से एक ने कहा देखिए आंटी आपने कहा हम छोटे-छोटे बच्चे पूदाा  कैछे करेंगे ?लेकिन किए ना। मुझे याद आया मैं कैमरा लेकर आई थी मैं झट छोटी सरस्वती मां के साथ छोटे शिशु के फोटो खींचे और पूछा -कहां मूर्ति विसर्जन करोगे ?
उन्होंने कहा दैम में ।
तुम लोग डैम जाओगे ?मैं घबरा उठी 
हूं छोटा वाला डैम में।
फिर भी तुम लोग ग् ग्? मैं हकलाती हुई बोली तो ठेला चालक ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा नहीं मैं विसर्जन करूंगा। इन्हें पानी के पास नहीं जाने दूंगा। दूसरे साल वे चंदा मांगने आए तो अपना परिचय दिया जिनका आपने फोटो खींचा था ।वह बच्चे  प्रत्येक साल बड़े होते गए लेकिन चंदा मांगने के समय उनका परिचय वही था शिशु -संगम जिनका आपने फोटो खींचा था। और मैं दस साल बाद भी उन बढ़ते बच्चों की बड़ी होती सरस्वती प्रतिमा को देख खूब हंसती हूं।
 सुजाता प्रिय समृद्धि

Wednesday, February 2, 2022

बारात वसंत की



बारात वसंत की

मौसम की पालकी पर सज-सँवरकर ।
आया है वसंत देखो जी दुल्हा बनकर। 

नव पल्लवों ने हैं वंदनवार सजाए।
मंजरियों ने हैं स्वागत द्वार सजाए।

कोयल गा रही  देखो स्वागत गान।
भौंरों ने भी छेड़े हैं मीठे प्यारे तान।

पंखुड़ियों  की प्यारी घुंघट डाल।
फूलों ने देखो  पहनाये जयमाल।

पलास सिर पर तिलक लगाकर।
नव -कोंपलों से लाया परछकर ।

बेला -गुलाब जूही चंपा-चमेली ।
आगे बढ़कर कर रही  ठिठोली।

चिड़ियाँ चहकी कलियाँ महकी।
चली हवा कुछ बहकी - बहकी।

पत्ते बजा रहे हैं झूमकर ताली।
थिरक-थिरक कर डाली-डाली ।

जन- जन का अब मन है हर्षित।
सरस-सलिल जीवन है पुलकित।

           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             स्वरचित, मौलिक

Saturday, January 29, 2022

देश एक परिवार (लघुकथा )



देश एक परिवार ( लघुकथा )

गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर झंडा फहराये जाने के पश्चात सभी ने साथ-मिलकर राष्ट्र गान गाये। तदोपरांत मुख्य अतिथि एवं प्रधानाचार्य महोदय के औपचारिक भाषण के बाद विद्यार्थियों द्वारा रंग मंचीय कार्यक्रमों द्वारा देशभक्ति गीतों पर अद्भुत नृत्यों की प्रस्तुति ने दर्शकों के मन मोह लिये।अगला कार्यक्रम लघु नाटिका के मंचन हेतु नन्हें विद्यार्थियों के छोटे-से दल ने मंच पर पधार कर दर्शकों का अभिवादन किया। सभी के परिधान अलग-अलग थे। उनके परिधान भारत के विभिन्न प्रांतों की वेश-भूषा को प्रदर्शित कर रही थी। बंगाली पंजाबी, काश्मीरी, राजस्थानी......... ।उन नन्हें कलाकारों ने अपने विशाल देश भारत के नक्शे का रूप लेकर खड़े हो गए। उनमें से मद्रासी परिधान पहने बालक ने अपनी तुतली बोली में बोलना प्रारंभ किया। भालत हमाला देछ है।हम यहां लहते हैं।इछलिए यह हमाला घल है। जिछ पलकाल हमाले घल में ढेल छाले कमले होते हैं,उछी पलकाल हमारे देछ में ढेल छाले लाज्य है।जिछ तलह हम अपने घलों के कमले के नाम बैठक, रछोई, छयनकछ,अछनान- घर इत्यादि लखते हैं, उछी पलकाल हमाले पलांतों के भी नाम-बिहाल,बंदाल,धालखंद,लाजअछथान,केलल इत्यादि लखे गये हैं।हम छब अलग-अलग कमलों यानि पलांतों में लहने वाले एक ही  देछ के वाछी यानि एक ही परिवार के लोग हैं। हमाला अलग-अलग पलिधान हमाली पहचान है।हम अलग छलील एक जान हैं। भालत हम छब का देछ है यानि हम छभी भालत के बाछी, एक पलिवाल हैं।हम छभी भालत माता की छंतान हैं। हम छभी भाई-भाई हैं। इछलिए छब मिलकर बोलिए-भालत माता की दय।दय हिंद,दय भालत।
मंचासीन पदाधिकारियों सहित सभी उपस्थित सदस्यों के मुंह से निकला -जय हिन्द,जय भारत। सम्पूर्ण वातावरण तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि' 
            स्वरचित, मौलिक

Friday, January 28, 2022

जीना इसी का नाम है



जीना इसी का नाम है

जीओ और जीने दो,
सबको खाने-पीने दो,
मिलना ही तो काम है।
जीना इसी का नाम है।

किसी को न सताओ,
सबका साथ निभाओ,
सबका सुबह-शाम है।
जीना इसी का नाम है।

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, January 27, 2022

भारत की वीरांगनाएं (कहानी )





इतिहास की कक्षा प्रारंभ होने वाली है। छात्र-छात्राओं में नव-उमंग की लहरें हिलोरें ले रही है।आज शिक्षिका पूर्णिमा वर्मा कल का बचा हुआ अध्याय पूर्ण करने वाली हैं।भारत के वीर सपूतों की जीवनियां और उनके विषय में कुछ विशेष जानकारियां उन्होंने इतने रोचक तरीके से समझाया कि इतिहास विषय को बेकार और फालतू समझने वाले भी सुन- समझकर आत्मसात कर रहे थे। आज शेष अध्याय को सुनने की ललक सबके हृदय में थी।कक्षा में शिक्षिका के आगमन पर सभी विद्यार्थी शांत-चित से बैठ गये।शिक्षिका ने भी बड़े उत्साह से भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के वीरों के बलिदानों और क्रांतिकारियों के कारनामों की समस्त घटनाओं को बारी-बारी से बताना प्रारंभ किया।सभी विद्यार्थी मजे लेकर सुन रहे थे और विभूति के मन में एक अजीब सी उथल-पुथल चल रही थी। उसके मन के ये भाव शिक्षिका महोदया से छिपी नहीं रह सकी। उन्होंने उसे टोकते हुए कहा क्या बात है विभूति तुम्हें इन वीरों के बारे में पढ़कर अच्छा नहीं लग रहा ? तुम खोई-खोई सी क्यों हो ?
उसने कहा-बहुत अच्छा लग रहा महोदया ! किन्तु मेरे मन में कुछ अलग प्रश्न उठ रहे।
हां हां बताओ! कौन से प्रश्न उठ रहे कुछ बोलोगी तभी उसकी उत्तर पाओगी।
मैं सोच रही हूं अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लड़ाई में इतने वीर और क्रांतिकारी पुरुषों ने अपने योगदान दिये,तो भारतीय महिलाओं की कोई भूमिका नहीं रही।
उसके इस अप्रत्याशित प्रश्न पर उसके सहपाठियों समेत स्वयं शिक्षिका भी स्तब्ध रह गईं।
फिर उन्होंने संयत स्वर में कहा-बहुत ही सुंदर और सार्थक प्रश्न उठे हैं तुम्हारे मन में विभूति! महिलाओं का योगदान हर क्षेत्र में रहा है और रहेगा।जितने भी वीरों ने अपनी जान गंवाई, उनमें सभी स्त्रियों का तो योगदान था ।यदि वे अपने ललनाओं को अपने जिगर के टुकड़ों को स्वतन्त्रता की उस आंधी में नहीं झोंकती, उन्हें लड़ने के लिए प्रेरित नहीं करतीं तो वे कभी अंग्रेजो की बर्बरता के आगे टिक नहीं पाते। बहनें अपने भाइयों के कलाइयों पर राखी बांधकर और नवविवाहिताएं पति के मस्तक पर विजय तिलक लगाकर युद्ध-भूमि भेज रही थीं। यह महिलाओं की भूमिका नहीं थी।कई जगह महिलाओं ने स्वयं भी अंग्रेजों से डटकर टक्कर लिया। 
महारानी लक्ष्मीबाई को तो सभी जानते हैं कि उन्होंने किस वीरता के साथ अंग्रेजों से टक्कर लेकर उन्हें धूल चटा दिया और बहादुरी से लड़ती हुई वीरगति को प्राप्त हुईं।
क्या एकमात्र वीरांगना लक्ष्मीबाई ही थी?
नहीं-नहीं अनगिनत थीं।
तो उनके बारे में हमें क्यों पढ़ने को नहीं मिलता ? उनकी वीरता के बारे में कोई अध्याय क्यों नहीं बना। क्यों उनके लिए इतिहास में पन्ने नहीं दिखते ? क्यों उनकी वीरता के बारे में हमें कुछ नहीं पढ़ातीं ? उसके इन प्रश्नों को सुन शिक्षिका हतप्रभ रह गयीं।और बहुत ही संयत और विनम्रता पूर्वक बोली -तुम्हारा यह प्रश्न जायज है विभूति ! मैं एक अलग और विशेष अध्याय तुम्हें अपनी तरफ से लिखकर पढ़ाऊंगी। जिसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत की वीरांगनाओं के बारे में लिखा रहेगा कि किस प्रकार उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाकर ना केवल देश को स्वतंत्र ही कराया। बल्कि देश को एक सुदृढ़ और सुसंस्कृत भी बनाया। तुम्हारी तरह मेरे मन में भी यह जिज्ञासा उठी थी और मैंने भारत की स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाओं की वीरता और बलिदान की गाथाओं को इतिहास के मुख्य अध्यायों से ढूंढ कर एकत्र करती गयी।अब मैं तुम्हें उनकी कुर्बानियों को बारी-बारी से तुम्हें बताती हूं -

अवंतिका वाई लोधी १८५७ की क्रांति की प्रथम शहीद वीरांगना थी। अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते २० मार्च १८५८ को वीरगति को प्राप्त हुईं।
दूसरी वीरांगना मराठा शासित झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई के बारे में हम सभी जानते हैं।मात्र तेईस वर्ष की उम्र में अंग्रेजों से जम कर टक्कर ली और अंग्रेजी सरकार को रौंदते-कुचलते हुए १८ जून १८५८ को वीरगति को प्राप्त हुईं।
झलकारी बाई रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना दुर्गा दल की सेनापति थी। वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल होने के कारण शत्रुदल को गुमराह कर उसे करारा हार दिलाने में इन्होंने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंतिम समय में भी लक्ष्मीबाई के वेश में अंग्रेजी सेना से लड़ती रही और लक्ष्मी बाई को किले से भाग निकलने का अवसर प्रदान किया। लक्ष्मी बाई के एक विश्वासघाती सैनिक के कारण वीरगति पाईं।
लक्ष्मी बाई की भतीजी और बेलूर की जमींदार नारायण राव की बेटी अस्त्र शस्त्र संचालन और घुड़सवारी में काफी दक्ष थीं। इन्होंने भी अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए।
बेगम हजरत महल असीम शौर्य एवं साहस के साथ अंग्रेजों से युद्ध की।
उदा देवी एक उच्च कोटि की निशानेबाज थी। उन्होंने पेड़ पर चढ़ कर अंग्रेजी सेना पर धड़ाधड़ गोलियां दाग दी। अंग्रेजो नें पेड़ को काट डाला तब उन्हें पता चला कि उन पर हमला करने वाला कोई पुरुष नहीं बल्कि नारी है।वह पासी समुदाय से थीं उनकी मूर्ति आज भी लखनऊ के सिकंदर बाग में स्थित है।
रानी गाइडिन्ल्यु ने नागालैंड में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में नेतृत्व किया।
इसके अतिरिक्त रानी तपस्विनी चौहान रानी ,नाना साहेब पेशवा की पुत्री मैना,मु्न्दरा ,काना, रानी हिण्डोरिया, रानी तेजवाई , रानी चेनम्मा, नर्तकी अज़ीज़ वेगम,कस्तूरबा गांधी,विजय लक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली, सरोजिनी नायडू, सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन, कमला नेहरू,मैडम भीखाजी कामा, सुचेता कृपलानी आदि बहुत सारी वीरांगनाओं की भी भारत को स्वतंत्र कराने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। जिनके बारे मैं अगली कक्षाओं में विस्तार से बताऊंगी।अभी कक्षा का समय समाप्त हो गया है। जय हिन्द,जय भारत।
जय भारत की वीरांगनाएं।
विभूति ने खुशी से जयघोष किया तो छात्राओं सहित सभी छात्रों ने भी आवाज बुलंद किया।
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'