5, कब तक
(वर्ण-पिरामिड)
मैं
जब
राहों में
चलती हूँ।
मन-ही-मन
सोचा करती हूँ।
कब तक मुझको
इन दुर्गम राहों में
चलते चले जाना होगा?
और कब - तलक मुझको
इनकी असीमित दूरियों को
अपने कदमों से नापना होगा?
कब तलक मुझको इसके सभी
घुमावदार मोड़ों में मुड़ - मुड़कर
दिशा बदल कर, दाएं और बाएँ चल
कंक्रीटों से भरे उबड़ - खाबड़,टेढ़े - मेढ़े
पथ के ठोकरों को सह करके चलना होगा।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
No comments:
Post a Comment