Saturday, April 18, 2026
शिक्षक
नए-नए नित ग्यान सिखाने आते हमको शिक्षक।
शिक्षा का अनमोल रतन दे जाते हमको शिक्षक।
अक्षर लिखना ,शब्द बनाना और वाक्य रचवाते।
निबंध लिखना ,कविता रचना, सब हमको सिखलाते।
अक्षर-अक्षर ग्यान दे साक्षर ,बनाते हमको शिक्षक।
शिक्षा का अनमोल रतन दे जाते हमको शिक्षक।
अनुशासन की शिक्षा देते, कहते पालन करना।
गुरूजनों का आदर करना ,मानना हरदम कहना।
जीवन जीने की कला,सिखलाते हमको शिक्षक।
शिक्षा का अनमोल रतन दे जाते हमको शिक्षक।
टेढ़े-मेढ़े ,जीवन पथ पर ,चलना हमें सिखाते।
भला-बुरा का ग्यान देकर ,जीना हमें सिखाते।
अच्छे-अच्छे कर्म करना, बतलाते हमको शिक्षक।
शिक्षा का अनमोल रतन दे जाते हमको शिक्षक।
सुजाता प्रिय
Friday, April 17, 2026
धूर्त की पहचान
धूर्त की पहचान
मीठी-बोली बोलना,धूर्तों की पहचान।
मीठा-मीठा बोलकर,बात सभी ले जान।।
हर मानव से दोस्ती,करते आठो याम।
भले-मानुस बने सदा,जपे राम का नाम।।
मिल्लत की बातें बता,दिखलाते हैं प्यार।
आग पीठ पीछे लगा,लड़वाते ललकार।।
मुँह पर करते हैं सदा,प्यारी-प्यारी बात।
पीठ पीछे वही करे,जा करके आघात।।
दिल की बाते पूछते,मीठी बोली बोल।
वक्त-मिले तो आपके,राज सभी दे खोल।।
करो सभी से दोस्ती,पर रखो यह ध्यान।
जितना ही दरकार हो,उतना ही दो मान।।
देते धोखा चाल चल,सुनो खोलकर कान।
बार हैं करते पीठ पर,रहो तुम सावधान।।
Thursday, April 16, 2026
जीवन की कड़ी
S. जीवन की कड़ी
भीड़ के पीछे
चलना छोड़ो
उसके बीच में
अपना रास्ता बनाओ
लोग क्या कहेंगे,क्या सोचेंगे
इसे छोड़ अपनी राह चलते जाओ
मुश्किल से भाग मत,उससे टकरा जा
असफलता से भी मत घबरा,कोशिश कर
धैर्य रखो!क्योंकि सफ़लता समय लेती है
परीक्षा भी लेती है, कुछ सिखाती भी है
सभी को छोड़ो, स्वयं पर भरोसा रखो,
क्योंकि तुम स्वयं ही अपना मित्र हो
प्रारंभ किया है तो पूरा भी करो
पूर्णता ही जीवन की कड़ी है
सुजाता प्रिय समृद्धि
Monday, April 13, 2026
पत्थर के गुरु
पत्थर के गुरु
लेकर दृढ़ विश्वास हृदय में,पहुंँचा एकलव्य द्रोण के पास।
नतमस्तक हो बोला-गुरुवर !धनुर्विद्या की ले आया आस।।कृपया चलाना धनुष सिखा दें,मुझको आप प्रसाद स्वरूप।छोटे-छोटे कुछ नियम बता दें, मुझ छोटे -बालक अनुरूप।।
पूछा - गुरुवर ने-हे अनुगामी! तुम किस कुल के बालक हो।कौन तुम्हारे मात - पिता हैं ,बोलो- तुम किसके पालक हो।।
बोला- एकलव्य,हाथ जोड़कर,जंगल की कुटिया में रहता हूँ।
छोटे कुल का बालक हूंँ मैं, रूखी - सूखी खाकर पलता हूंँ।
बोले गुरुवर- मैं तो केवल,राजकुमारों को ही देता हूंँ शिक्षा।
छोटे कुल के बालक हो तो, मत माँगो तुम मुझसे भिक्षा।।विदीर्ण हृदय में दृढ़ संकल्प लें,चला एकलव्य अपने घर।
प्रतिमा, गुरु की एक बनाया,काट-तरास कर एक पत्थर।।
नित्य चरण-रज शीष लगता, शीश नवाकर मूर्ति के पास। स्वनिर्मित धनुष-वाण ले नित्य,दृढ़ मन से करता अभ्यास।।
एक सुबह जब कर रहा था, अभ्यास वह तीर चलाने का।
एक स्वान आ लगा भौंकने,किया प्रयास बड़ा मनाने का।।
बहुत उसे पुचकार मनाया,लेकिन बात न माना वह कुत्ता। जितना उसको शांत कराता,उतनी-ही जोर से था भूंकता।। भटक रहा था ध्यान एकलव्य का,केंद्रित न कर पाता मन।
जब धनुष पर वह बान चढ़ाता,स्वान भौंकता था उस क्षण।।
सहन न कर पाया अवरोध, तिरंदाजी के अभ्यास विरुद्ध ।कुशलता से तीर चला,कर दिया- स्वान का कंठ अवरुद्ध।।*****************************************नगर नगर- गाँव से दूर-अरण्य में,प्रातः-काल गुरुवर द्रोणाचार्य।
राजकुमारों को धनुष सीखने का,कर रहे थे पुनीत कार्य।। भांँति-भाँति के गुर्र गहराई से, वे शिष्यों को सिखा रहे थे। बारीकी से तीरंदाजी के कुछ,करतब उनको बता रहे थे।। रोमांचित हो सब सीख रहे थे,तिरंदाजी का यह रूप नया।
नई रीति को और नई नीति को, नए नियम व स्वरूप नया।।
इसी समय कहीं से भगता,उनका कुत्ता आ गया सिर टेक।सभी शिष्य और गुरु ने देखा,उसके कंठ में थे तीर अनेक।।गुरु-शिष्य सब हुए अचंभित,तीरंदाज की इस कुशलता पर।
रक्त का एक बूंद न बहा था,स्तब्ध थे उसकी सफलता पर।।
बस उसका कंठ अवरुद्ध था,ताकि वह अब भौंक नहीं पाए। अभ्यास करने वाले को आगे, वह ध्यान नहीं भटका पाए।।
चल पड़े -गुरुवर शिष्यों को ले, ढूंढने उस नव धनुर्धारी को।
जिसने उनको दिखलाया था,तीरंदाजी की कलाकारी को।। *******************************************
तन्मयता से अभ्यास वहाँ वह,कर रहा था तीर चलाने का ।
अलग-अलग,नये अंदाज में ,निशाना वह वहांँ लगाने का।।
ध्यान भंग कर गुरुवर ने पूछा,कौन तुम्हारे गुरु जी हैं तात।
कौन तुमको तीर चलाने की,यह सुविद्या देते हैं सौगात।।
कहा-एकलव्य ने-विनीत भाव से,मैंने गुरु आपको माना। प्रत्यक्ष नहीं तो,मूर्त रूप दे, प्रसाद-स्वरूप हर गुण जाना।।
वृक्ष के नीचे रखी उनकी प्रतिमा, उन्हें इशारे से दिखाया।नतमस्तक हो- प्रणाम कर, उठा चरण-रज शीश लगाया।।आपकी ही मूर्ति में शीश नवा, नित्य अभ्यास मैं करता हूंँ।
आत्मसात कर सारी विद्या को,अपना ज्ञान कोष भरता हूँ।।
बोले गुरुवर-हे शिष्य ! मूर्त रूप में, गुरु मुझको तूने माना।
गुरु मानकर मुझको अपना,मेरी हर विधा को तुमने जाना।।
मेरे स्वान का कंठ अवरुद्ध कर, हे शिष्य तूने जो दी परीक्षा।
हर अंदाज ka अवलोकन कर,आज मैंने भी की समीक्षा।।
धनुर्विद्या में सफल हुए तुम, अब गुरु दक्षिणा की बारी है। माँगता हूँ जो दान तूक्ष मैं, तेरे लिए नहीं देना वह भारी है।।
खुश होकर बोला-एकलव्य, गुरुवर य़ह अहोभाग्य हमारा है।गुरुदक्षिणा देने का अवसर आया,यह सौभाग्य हमारा है।।
मुझ निर्धन बालक से हे गुरुवर! आज आप जो भी मांगेंगे।
यदि वह मेरे पास हुआ तो,आप वह पल भर में ही पाएंगे।। बोले गुरुवर- हे वत्स ! वह चीज,अभी तुम्हारे ही पास है।
उस छोटी-सी चीज दक्षिणा में, मुझको लेने की आस है।।
अपने दाहिने हाथ का अँगूठा,आज मुझको दे दो दान में।
मैं नहीं चाहता -तेरा अँगूठा,कभी घायल हो धनुष-बाण में।।
नवा मस्तक एकलव्य गुरु-चरणों में,उसने जो प्रण ठाना था।दिया था वचन जो गुरुवर को वह,उसको आज निभाना था।।
झट खडग ले काट अंगुष्ठा वह,गुरु के चरणों में चढ़ा दिया।
एक शिष्य होने के नाते वह,निज गुरू का मान बढ़ा दिया।।
हाहाकार कर उठा तब अम्बर,चीत्कार उठी अब वसुंधरा।
अश्रु बहा निर्झर बोला-कलंकित गुरू-शिष्य की परम्परा।।
दिल भी तो पत्थर का ही होगा, पत्थर के गुरू के सीने में।।
सुजाता प्रिय समृद्धि
Friday, April 10, 2026
लेवनी (गेंदरी बनाम गद्दे)
गेंदरी बनाम गद्दे
होली-दशहरे में आई साड़ियाँ नई।
पुरानी साड़ियाँ जमा हो गयी कई।
कोई रंग उड़ी, कोई फटी-चिथड़ी।
कोई - थी मुड़ी, कोई थी सिकुड़ी।
उन्हें देखने को नहीं करता था दिल।
रखना भी है उन्हें उनको मुश्किल।
य़ह सभी अब तो बेकार की ढेर है।
इसे हटाने में करना क्यों यूं देर है।
अम्मा - चाची और बुआ को दादी।
बोली - मत करो तुम इनकी बर्बादी।
इनको मिला कर बना लेना गेंदरी।
मतलब बिछौना अथवा कहो दरी।
डर से अम्मा और चाची रही मौन।
बुआ ने पूछा - इसे बनाएगा कौन?
दादी बोलीं- तुम ननद-भौजाई मिल।
तह लगा-लगाकर उसको देना सिल।
बुआ के चेहरे पर उड़ पड़ी हवाइयाँ।
माँ और चाची लेने लगी जम्हाईयाँ।
बाहर बोला कोई माइक में हल्ले में।
आ गया आपके हर गली मुहल्ले में।
कपड़े से रूई बनाने वाली मशीन।
नरम-गरम तोसक बनबाईये हसीन।
सुन- बुआ,चाची व माँ बड़ी इतराई।
झट जा- रुई बनाने वाले को बुलाई।
सभी पुरानी साड़ियों के बन गए गद्दे।
छूटे कपडों से गेंदरी बनाने के मुद्दे।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
Tuesday, April 7, 2026
अर्जी
अर्जी. अर्जी
हे
मित्रों
मन विश्वास
सदा ही तुम रखो
आगे बढ़ना है हमको जीवन में
महकाना है अपनी इस फुलवारी को
मेहनत की सुगंध बिखरा-कर चहुँ दिशा में
रिश्तों की डोर पकड़ ,साथियों के हाथ थाम
चलते चले जाना है,कदम-से-कदम मिलाकर
यही
मेरी
मर्जी,
अर्जी
परम
पिता
परमेश्वर
से भी है
सुजाता प्रिय समृद्धि
Sunday, April 5, 2026
गाँव की नारी
गाँव की नारी
पुरुषों से कदम मिलाकर चलती,
वह गाँव नारी है।
हर पल पुरुषों का साथ निभाती,
वह गाँव की नारी है।
घर का काम निपटाकर बाहर,
पुरुषों का साथ निभाती है।
पीठ पर बच्चे को बांँध कर,
संग खेती करने जाती है।
कुदाल चलाती,खेत कोड़ती,
हल चलाकर खेत जोतती।
मेड़ बनाकर बीज बोती,
एक-एक कर पौध रोपती।
भला कैसे गुजारा होगा अब,
हाल बड़ा बदहाल है।
करे क्यूँ न मजबूरी में,
यह पापी पेट का सवाल है।
फिर भी जन हाथ उठाकर कहते
शक्तिहीना यह नारी है।
है केवल ममता की मूरत,
कोमल अबला यह बेचारी है।
सुजाता प्रिय समृद्धि
Saturday, April 4, 2026
एकता में बल
एकता में बल
एक दिन एक शिकारी आया।
जंगल में वह जाल बिछाया।
उसके ऊपर वह दाना डाला।
छिपकर बैठा बन रखवाला।
कबूतरों का झुण्ड तब आया।
दाने को देख कर ललचाया।
कबूतरों का राजा तब बोला।
व्यर्थ तुम सबका मन है डोला।
जंगल में अन्न कहाँ से आया।
अवश्य किसी का छल छाया।
पर कबूतरों ने बात न मानी ।
दाना खाया कर के मनमानी ।
जाल में जाकर फंस चुके थे।
लज्जा से उनके सिर झुके थे।
कपोतराज ने फिर मुँह खोला।
बड़े प्यार से उन सबको बोला।
एक साथ चलो उड़ चलें हम।
जाल को लेकर भाग चलें हम।
मानकर कबूतर दादा की बात।
पहुँचे वे मूषक राजा के पास ।
कपोत-राज ने कहा मूषक से।
छुड़ा दे हमको जाल कुतर के।
कुतर मूषक ने जाल को काटा।
उड़े गये कबूतर करते हुए टाटा।
Friday, April 3, 2026
संगठन में शक्ति
संगठन में शक्ति
एक किसान के थे चार बेटे ।
चारो मिलकर खूब झगड़ते ।
किसान ने उनको समझाया।
पर बेटों को समझ न आया।
किसान ने एक योजना बनाई।
उनसे आठ लड़कियाँ मंगाई।
चार को साथ रस्सी से बंधा।
चार को अलग - अलग रखा।
प्रत्येक पुत्र को पास बुलाया।
बँधी लकड़ियों को तोड़बाया।
पर लकड़ियां उनसे नहीं टूटी।
मिलकर पाई थी मजबूती।
एक - एक लकड़ी पकड़ाया।
उनको उन चारो से तुड़वाया।
टूटी वह बिना लगाए जोर।
अकेली लकड़ी थी कमजोर।
तब लड़कों को समझ आया।
सब आपस में हाथ मिलाया।
बोले अब हम सब नहीं लड़ेंगे।
हम-सब मिल- जुलकर रहेंगे।
संगठन में शक्ति बहुत है भाई।
है बँधी लकड़ियों-सी सच्चाई।
Wednesday, April 1, 2026
चोट (लघुकथा)
चोट (लघुकथा)
पत्नी की तीखी बोली से संजीव का मन बड़ा आहत था। इतनी बेरूखी से सबके सामने डांँटेगी । यह तो कभी उसने सोचा.......... ।क्या हो गया उसे ?
इतना भी नहीं सोंचा ऐसे अपमान भरे लहजे से मेरे दिल पर क्या..... ।
यदि मैं सबके सामने उसे ऐसे ही अपमानित...............?
"करते तो हो........ ! हमेशा... .....।
हर जगह.........।हर समय ,......।
बडो़ं के सामने...... ।
छोटों के............।सहेलियों .......।
पडोसियों........।परिवारों,
सहकर्मियों,नौकरों..... ।"
उसने एक बार तुमसे........ ।
अपमान से दिल लहू-लुहान हो जाता है....... ।लेकिन वह हमेशा आसुओं के घूट पीकर ........है।तो तुम क्यों विचलित.... ?"
तेरे जैसा उसका दिल..........? नहीं- नहीं! अपनी अंतरात्मा की फटकार सुन वह ............।
होंठों से बुदबुदाते हुए...
..मुझे भी. उसके सम्मान का...............।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
Subscribe to:
Comments (Atom)