आँखों-ही-आँखों में
सुशांत का मन बड़ा अशांत था।आखिर कौन सा ऐसा अपराध .......? जो सुनीता मैम ने इतनी जोर से........
वह तो कोई भी काम उनसे पूछे बिना............।
उन्होंने जिन सामानों को लाने कहा वह तो लाकर...........!
उन्हें लाने में मेरी जेब भी खाली..... ।
उपर से सबके सामने........।
अपमान का घुट पीकर कॉलेज के आयोजित कार्यक्रम में शामिल.........।लेकिन सुनीता मैडम से नजरें चुराता.........।
कार्यक्रम की समाप्ति होते ही आयोजक छात्रों ने खर्च के पैसे का हिसाब और बचे हुए पैसे उन्हें देने लगे ।
वह सोचने लगा-मैं दूँ भी तो क्या ?
मेरे तो जेब के पैसे भी......
कोई बात नहीं मैं मैम को न हिसाब दूंगा न ही यह बताऊँगा कि ...........
सुशां s s त.....! अचानक मैम ने पीछे से पुकारा ।
"लो य़ह तुम्हारे रुपये !" उसके पीछे पलटते ही मैम ने रुपये बढ़ाते हुए कहा-
"यह कौन - से रुपये मै s s म ?" उसकी आवाज में हकलाहट ......
"तूने सारे सामन ..........।" "मैंने पैसे भी......!"
"इसकी कोई जरूरत नहीं .........."
"क्यों नहीं ?" मैम ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ......
वह नजरें उठाकर मैडम की ओर......।
उनके नजरों में वात्सल्य, प्रेम और ममत्व की लहरें हिलोरे ....।
सारे गिले-शिकवे भूल वह हौले से मुस्कुरा दिया......
मैम का मन भी.....
सुजाता प्रिय "समृद्धि"
भावपूर्ण कहानी. शुभकामनायें
ReplyDeleteसादर आभार भाई
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