Sunday, May 31, 2026

गोदना (बाल नाटिका )

गोदना (बाल नाटीका )

स्वतंत्रता सेनानियों का काफिला अंग्रेजों के खिलाफ नारा लगाते हुए। 
"भारत माता की जय" 
"अंग्रेजों भारत छोड़ो"
एक बूढ़ी माता आती दिखाई पडती है।उन्हें देख कर स्वतंत्रा सेनानी -
पाव लागून् बूढ़ी माई !
बूढ़ी माई-जुग जुग 

मुक्तक

जब देखती तो साफ दिखती हैं।
मुस्कुराती - बेबाक  दिखती  हैं।
आप आई नहीं  महफिल में पर-
हर  तस्वीर  में आप दिखती  हैं। 
🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽
💐💐💐💐💐💐💐💐
        सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Monday, May 25, 2026

अपमान (रोला छंद )

अपमान (रोला छंद)

मत कर तू अपमान,किसी का सुन ले भाई।
कर सबका सम्मान, इसी  में   है  चतुराई।।

जिनका हो अपमान, सदा मन उनका रोता।
दिल ही नहीं दिमाग, सदा है आहत होता।।

अपमान जहाँ हो जाय,दुःख है आता मन पर।
उनके दिल की हाय,अहो लगती जीवन भर।।

हरदम रखना ध्यान, न अपमान किसी का हो।
न सम्मान  का दान, कभी  भी फीका हो।।

थोड़ा  कर  लो  मान, मन प्रफुल्लित होगा।
तेरा भी तो आज , चित  प्रसन्नचित्त  होगा।

जो करता है मान, वही  होता  है  राजा।
वही  सभा  में  बैठ, बनता है महाराजा।।

मन्थन कर लो मीत,कहाँ मन आहत होता।
फिर उसका मन जीत,हिया मर्माहत होता।

हरदम रखो ध्यान, कभी यहाँ  दिल न  टूटे।
इतना भी लो जान,किसी का हक ना लूटे।

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, May 24, 2026

विश्वासघात

विश्वासघात 

सुंदरवन में जामुन पेड़ पर,रहता था एक बंदर। 
उसके नीचे एक नदी थी,जिसमें रहता एक मगर।
दोनों गहरे मित्र थे,घुल-मिल बातें करते थे।
दोनों  मिलकर जामुन खाते,नदी का पानी पीते थे।
एक दिन बहला बंदर को,मगर ने पीठ पर बैठाया।
कहा मगरनी ने आज, तुमको दावत पर है बुलाया।
पहुँचे जब वे बीच नदी में,मगर ने बंदर को यू बताया।
मैं तो दोस्ती का वास्ता दे,छल से तुम्हें यहाँ  ले आया।
कोई दावत नहीं है घर में,नहीं मगरनी ने तुम्हें बुलाया।
तेरा कलेजा मीठा होगा,तुमने जामुन बहुत है खाया।
इसीलिए तुम्हें मारकर मैं, कलेजा तेरा खाऊन्गा।
बहुत दिनों की हसरत मैन,मन की आज पुराऊन्गा।।
कहा मगर से झट बंदर ने,काबू रखकर भय पर।
मैने अपना कलेजा सूखने,दिया पेड़ के ऊपर। 
जल्दी से मूझको वापस,पेड़ तक तू पहुँचा दे।
उठा पेड़ से कलेजा अपना,झट मैं तुम्हें थमा दूँ 
पुनः पेड़ तक उसको लाया,मगर ने 9बात में आकर।
पेड़ देख झट से चढ बैठा,बंदर ने छलांग लगाकर। ।
ऊँची डाल पर चढ़कर बोला,सुन ओ कपटी मित्र। 
कलेजा पेड़ पर सुख सकता है,यह बात नहीं है विचित्र। 
जो जन अपने मित्र से,विश्वासघात कrte है l
कोई उनका मित्र न होता,सभी दूर रहते हैं

Saturday, May 23, 2026

गाँधी जी के तीन बंदर

गाँधी जी के तीन बंदर 

गाँधीजी  के  तीन  बंदरों ने,
तीन  बातें  हैं  हमें  सिखाई। 

बुरा किसी  का कभी न देखो,
बुरा किसी का कभी न सीखो,
बुराई पर मत तुम नजरें फेंको, 
आँखे ढककर है हमें  सिखाई ।

बुरी बात तुम कभी न  सुनना।
बुरा किसी को कभी न कहना।
बुराई को अपने चित्त न धरना।
कान ढक - कर हमको बताई। 

जब  बोलने को मुख खोलो।
अपने शब्दों को पहले तोलो।
बुरी बात तुम कभी न बोलो।
मुँह ढक - कर  है हमें बताई। 
        सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Friday, May 22, 2026

स्वागत गान (वार्षिकोत्सव)

स्वागत गान

झारखंड की पावन धरती पर आपका स्वागत वंदन।
वार्षिकोत्सव में जो लोग पधारे,उन सबका अभिनंदन है।।

वीर भूमि यह बिरसा की है,इस पर है अभिमान हमें। 
वीर पुत्र के रूप मिला है,कलियुग का भगवान हमें। 
सिद्धू-कान्हू का पुन्य भूमि यह,इसका माटी चंदन है।
वार्षिकोत्सव में जो लोग.........

युग-युग से होता आया है,साहित्य का सम्मान यहाँ। 
बच्चा-बच्चा भी करता है,कलम वीरों का गुणगान यहाँ। 
हर कवयित्री यहाँ की सीता जैसी,हर कवि रघुनन्दन है।
वार्षिकोत्सव में..............

अहोभाग्य हमारा है जो,आप यहाँ पर आये हैं। 
स्वयं रचकर प्यारी मनमोहक,कविताओं को लाये हैं। 
छंद बद्ध कविताएँ लिखना,यहाँ न कोई बंधन है।
वार्षिकोत्सव में................

धन्य हुई यह धरा हमारी,कलाकारों के आने से।
दिशा- दिशा अब गूँज रही है,कविताओं के गाने से।
कवि- मणियो से समृद्घ भारत,रत्न-जड़ित यहाँ कुन्दन है।
वार्षिकोत्सव..............
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

समझदारी

समझदारी

एक टोपी वाला टोपी लेकर। 
बेचता टोपियाँ घूम घूम कर। 
हरी लाल और पीली टोपी।
काली सफेद औ नीली टोपी।
एक दिन वह जब थक गया।
पेड के नीचे जाकर सो गया।
उस पेड़ के ऊपर डाली पर। 
बैठे हुए थे बहुत सारे बंदर।
टोपी वाले को टोपी पहने देख।
पहन ली बंदरों ने भी एक-एक।
टोपीवाला जागा तो टोपी वाली।
टोकरी बिलकुल थी खाली।
उसने जब नजर उठाई ऊपर।
टोपियाँ पहन बैठे थे बंदर।
माँगी टोपियाँ बहुत मगर।
एक न वापस की बंदर। 
तब बुद्धि से उसने काम लिया।
सिर की टोपी खोल फेक दिया।
टोपी वाले को ऐसा करते देख। 
बंदरों ने भी खोल टोपी दी फेंक। 
टोपी वाला तब खुश होकर।
चल पड़ा सभी टोपियाँ लेकर।
समझदारी से जो करते काम। 
मुश्किलें उनकी होती आसान। 
      सुजाता प्रिय समृद्घि

Thursday, May 21, 2026

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी

मीठे-मीठे गीत सुनाती, 
           नन्हीं चिडिया जब घर आती।
सुबह-सबेरे रोज आकार, 
                  मेरी मुनिया को बहलाती।
आती जब वह फुदक-फुदक,
                 मुनिया ताली खूब बजाती। 
जब  भी वह रोने लगती तब,
               गाना गाकर चुप कर जाती। 
नन्ही,प्यारी चोंच खोलकर, 
                   छोटे दाने को चुग जाती।
जब मुन्ने का मन भर जाता,
                 उड़ जाती है पंख फैलाती।
सोती सूरज के सोने पर, 
                पर उससे पहले जग जाती।
स्नेह-प्यार से चीं-चीं गाकर,
                 हर प्राणि को रोज जगाती।

                          सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

तमन्ना ( विधाता छंद)

तमन्ना

तमन्ना है यही मेरी, कि तुम अब पास आ जाओ।
बड़ी तड़पा रहे मुझको,अभी मत और तड़पाओ।।

मुझे जो  छोड़कर भागे, बताया भी नहीं मुझको।
तुझे भी रास कब आया,जताया तो नहीं मुझको।।

जिगर   बेचैन   है  मेरा, परेशानी   तुझे    घेरी।
अगर  मुझको  न तड़पाते, सुधी लेते  जरा मेरी।।

अभी इतनी गुजारिश है,चले आओ निकट मेरे।
तमन्ना आज  पूरी  हो, मिटे  संताप  सब  तेरे।।
             सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Sunday, May 17, 2026

संस्कार (लघुकथा)

जय माँ शारदे 🙏🙏 

संस्कार (लघुकथा)

"मन बहुत घबराता है सिम्मी की......!"
 "काहे खातिर.........?"
 "तुम तो कुछ समझती ही नहीं। देखो हमारी बेटियांँ जवान हो गई। आजकल के छोरों के रंग-ढंग तो देख ही रही हो । छोकरियों को देखते ही किस कदर.........।अब इन्हें बाहर जाने से....."
    "उनकी नादानियों की सजा हम अपनी बेटियों को क्यों.........."
    "अरे ! हम उन मनचलों को रोक नहीं सकते । पर,अपनी बेटियों को तो घर में सुरक्षित.........।"
       "हांँ-हांँ बेटियाँ ही ना बलि का बकरा हो सकती.......।बेटों को तो छुट्टा साढ़.........."
 "ओह! हम यह नहीं कहते कि बेटों को.....।पर बिटिया को समझाकर घर में...........।"
 "हमें बिटिया को समझा कर घर में नहीं.........,बेटों को समझाकर बाहर भेजना है कि लड़कियों के साथ किसी भी तरह की.............. पाप है। जैसे तुम्हारी मांँ-बहन की आबरू है ।वैसे ही पराई लड़कियों और........।अपनी मांँ- बहन की तरह अन्य लड़कियों की सुरक्षा भी तुम्हारी........।तब देखना हमारी बिटिया भी सुरक्षित और बेटे भी व्यवहारिक और समझदार..........।"

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
कोयल का गली पन्खोन् बाली।
मधुवन की कोयल मतवाली।
कंहुकुहू करती डाली-बा,ई
फुदक-फौट कर 

मैं

मैं                   मैं 
                  स्त्री हूँ 
             तो क्या हुआ 
        मेरा कोई वजूद नहीं 
    मेरे मन में कोई इच्छा नहीं 
  चुप रहती हूँ ! पर गूंगी  नहीं हूँ 
    यह तो मेरा  एक तरीका है 
      माहौल शान्त रखने का 
       नहीं चाहती हूँ विषाद 
        इसीलिए उदासी पर 
    परदा डाल मुस्करा देती हूँ 
दिल के अन्दर कितनी भावनाएँ 
 हिलोरे लेती हैं तूफ़ान की तरह 
   पर उसे बेरहमी से दवाकर
        शान्त कराती देती हूँ
  
         सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Saturday, May 16, 2026

कैसे बीज हैं पेड उगात े?

कैसे बीज हैं पेड उगाते

सहज कौतुहल उठा था मन में। नन्हें बीज मिट्टी के कण में। 
कैसे विस्तृत पेड उगाते।कैसे प्यारे फूल खिलाते।
कैसे मीठे फल उपजाते।सबको हैं वे भाते लुभाते।
एक बीज लेकर हाथ मे।छोटी खुरपी भी थी साथ में। 
खुरच-खुरच धरती का दामन।कर डाला बीज को अर्पण।
दो-चार अन्जलि पानी डाल। चल पड़ी मैन खुरपी संहाल।
रोज उठाकर देख करती।कई दिनों का लेखा करती।
एक-दो तीन गीन -गीन।ऐसे बीत गये कितने दिन। 
बीज न उगला कोई पेड। सोची इसको देखून छेड़।
तुरन्त दौड़कर खुरपी लाई।धरती का दामन खुजलाई।
वहाँ, जहाँ बोई थी बीज। खोज रही थी पेड-सी चीज। 
बीज मिल गया थोड़ी देर में। छुपा हुआ मिट्टी के ढेर में। 
नहीं अब वह छोटा था।पहले से ज्यादा मोटा था।
हाँ  एक बात  थी अलग।पड़ उसपर नजर सहज।
उस बीज के एक ओर। निकली थी मानो कोई  डोर। 
ठीक उजले धागे-सी।पीछे या उसके आगे थी।
मैंने सोचा ये क्या हुआ। मतलब कितना नया हुआ। 
दौड़ पड़ी मैन् मान के पास।सत्य जानने की ले आस। 
मा मिल गई जल्दी खैर, पूछा क्या ये हैं बीज के पैर।।
हाथ पैर  हैं या हैं  पूँछ। या फिर दूसरा और है कुछ। ।
मान थी कामों  मेन व्यस्त। सूर्य हुआ जाता था अस्त।।
खीझकर बोली ओ लंगूर।इसका नाम है अंकुर। 
बढ़कर फेंकती पत्तियाँ  दो।उससे निकलती टहनियां दो।
फिर  पत्तों से हैं  भर जाते।और फूलों से हो तर जाते।
और फलों से हैं लद जाते।जो सबको हैं लुभाते।
ऐसे बीज हैं पेड उगाते।ऐसे ही हैं फल-फूल उपजाते।
                                  सुजाता प्रिय 'समृद्घि'




Tuesday, May 12, 2026

हिन्सक पर विश्वास नहीं

एक बार जंगल की राह में,एक बाघ था बंद पिंजरे में। 
राहगीरों को रोककर कहता,खोल दो कोई पिंजरा मेरा।।
बहुत दिनों से हूँ मैं  भूखा,बिन खाये ही मर जाऊँगा।
एक पंडित जी को आई दया,बोले तेरा भरोसा क्या ?
पिंजरे से बाहर आओगे,झट मारकर मुझको खाओगे।
कहा बाघ विश्वास करो, बेकार तुम मुझसे मत डरो।
नहीं खाऊन्गा तुझको मार,मानूँगा मैन् तेरा उपकार। 
तुम मरते को अगर बचाओगे,पुण्य बहुत तुम  पाओगे।
पंडित जी तब करके विश्वास, पहुँच गए पिंजरे के पास। 
खोले पिंजरा हाथ बढ़ाकर,निकला बाघ पिंजरे से बाहर। 
कहा अब तुम्हें मैं खाऊन्गा,अपनी भूख मिटाऊन्गा।
खतरे में उनकी पड़ गई जान,क्यों लिया कहना मान?
नजर घुमाई तब ईधर-उधर,दिखा उनको एक गीदड।
पंडित जी ने पास बुलाया,सारी बातों को समझाया।
बोला गीदड विश्वास न होता,पिंजरे में बाघ है होता।
शैतान बाघ ताव मे आकर, दिखया पिंजरे मे घुसकर। 
कहा गीदड तब पंडित जी से,अब पिंजरा बंद होगा कैसे।
पंडित जी ने पिजरा लगाया,गीदड को विश्वास दिलाया।
कहा गीदड मुझे था विश्वास, पिंजरे में भी होता बाघ। 
जैसे आपको धोखा देकर,निकला यह पिंजरे से बाहर। ।
वैसे ही इसको भी बहलाया,वापस पिंजरे में पहुँचाया।
विश्वास नहीं  हिन्सक पशुओं पर, कब खाएगा धोखा देकर। 



Monday, May 11, 2026

आम

आम बड़ा है मीठा,आम बड़ा है ताजा।
राष्ट्रीय फल है यह ,सभी फलों का राजा।।

टिकोले भी हम खाते,चटनी भी बनाते।
अमावट अचार गुड़म्मा,आमाबट बनाते।।

अमझोरा पीकर हम सब,हैं गर्मी भगाते।
पकाकर  हम लगाते, हम लू को भगाते।।

पकने के बाद हम चूस-चूसकर हैं खाते। 
शर्बत ,आइसक्रीम व फ्रूटी भी हम बनाते।।

मालदा,बीजू,बम्बईया,लंगड़ा, व दशहरी।
गुलाबखश,सिन्दूरी पैबन्दी,और तोतापरी।

आओ सखियाँ आओ,मिलजुल कर खाओ।
कैसा लगा आम तुझे? जरा खाकर बताओ।

                   सुजाता प्रिय 'समृद्धि'



Sunday, May 10, 2026

पिपासा (लघुकथा)

पिपासा

ईर्ष्या और तृष्णा दो बहनें थी।दोनों बहनों को किसी की अच्छाई-बड़ाई सहन नहीं होता था।किसी की प्रगति देख  वे जल-भुन जातीं। हाँ दोनों के जलने- भूनने में थोड़ा अन्तर था।जहां ईर्ष्या किसी की प्रसंशा सुन जल-भूनकर खाक हो जाती, किसी की बुराई करती, किसी के बुरा होने की कामना करती,उनका अपमान करती,वहीं तृष्णा किसी की प्रसंशा सुन प्रसंशा-पिपासित हो जाती। उसे इस बात की चिन्ता हो जाती कि उसकी प्रसन्शा क्यो हो रही है।वह उसके कारकों की तह तक पहुँचने की जी तोड़ कोशिश करती, उसके हर क्रिया-कलापों का बारीकी से अध्ययन करती और कारण जानने के बाद उसे आत्मसात करने अथबा स्वयं को उस विधा मे निपुण करने में लग जाती। इस प्रकार उन सभी की अच्छाइयों को ग्रहण कर वह स्वयं प्रसंशा प्राप्त कर लेती।इस प्रकार सफलता व सम्मान प्राप्ति के सभी मार्ग प्रशस्त करती हुई अपनी मंजिल तक पहुँच कर अपना जीवन सार्थक कर ली।
                                        सुजाता प्रिय  'समृद्धि'

सैनिक

Saturday, May 9, 2026

तेरी नजर ने मुझको चाहा

जय माँ शारदे 🙏🏽🙏🏽
गजल

तेरी नजर ने मुझको चाहा,
   इसे मुहब्बत का नाम  दे दो।
      मेरी नजर ने  तुम्हीं को देखा,
          सभी को  ऐसा पैगाम दे दो।

खड़ी मै  पथ पर तुम्हें निहारूं।
    मन- ही -मन में तुम्हें पुकारू।
       कभी मिले हम नदी किनारे,
          बस एक ऐसी तू शाम दे दो।

बसी हृदय में तुम्हारी सूरत।
   नहीं किसी की मुझे जरूरत।
        मेरे  हृदय  में सदा विराजो,
           हृदय में अपना ही नाम दे दो।

नहीं घड़ी भर है चैन मुझको।
    अगर न देखे ये नैन तुझको।
      जरा न होना नजर से ओझल,
          मुझे दरस तुम तमाम  दे दो।

तुम्हें जो लगता कि मैं हूँ पागल।
    किया है मुझको तुम्हीं ने घायल। 
        मन को कुछ  तो सुकूं मिलेगा,
          मुझे यह तू छोटा इनाम दे दो।

तू अपने मन में  जरा टटोलो।
    हृदय का अपना तू राज खोलो।
       फिजा में महकती है मेरी खुशबू ,
            सुरा का  ऐसा तू जाम  दे  दो।

  
हैं जहाँ में तेरे जो लोग प्यारे,
    सभी  ही   न्यारे  रहें  हमारे।
         मुझे तो आशीष उन्हीं से लेना,
               सभी  को  मेरा प्रणाम दे दो।

                        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, May 7, 2026

नव किसलय से भरा धरातल

नव किसलय से भरा धरातल 

नयन उठाकर देख धरा पर,
नव किसलय से भरा धरातल।
नन्हें-नन्हें पत्तों से ढककर,
लगता कितना हरा धरातल।

धरा-गर्भ में फूटे नवांकुर,
कोमल रेशमी डोर लिए।
सूरज की किरणें फैली हैं,
आसमान में भोर लिए ।

हर्षित होकर आज वसुंधरा,
पहनी चुनरी धानी है।
किसलय का श्रृंगार रचा है,
दुनियाँ की पटरानी है।

मन के सब संताप मिटे हैं।
पल कितना सुखदायी है।
खुशियों से विभोर होकर,
मंद-मंद मुस्कायी है।

अब धरती की तपन मिटी है,
पुलकित होकर ली अँगड़ाई।
हरियाली है चहुँ दिशा में,
हरीतिमा है मन  में छाई।
     सुजाता प्रिय समृद्घि

Wednesday, May 6, 2026

काश मैने कह दिया होता

काश मैंने कह दिया होता

सामने कुर्सी पर दो महिलाएंँ साथ-साथ बैठी थीं। रमेश बाबू दोनों को बारी-बारी से देख रहे थे। दोनों में कितना अंतर है । एक सुंदर, शांत, समझदार, सहनशील,शालीन, मृदुभाषी ।ना कोई नाज नखरे ना कोई शान- घमंड ।दूसरी दिखने में साधारण अशांत,उदंड,बाचाल,नासमझ, नखरेबाज और घमंडी। पहली महिला उसके दोस्त की पत्नी और दूसरी उनकी स्वयं की पत्नी। वे यादों के भंँवर में गोते लगाने लगे। जब उनकी नौकरी लगी थी, पहली महिला के परिजन उनके घर उनसे विवाह का प्रस्ताव लेकर आए थे। उनके घर वालों को लड़की तो भाई लेकिन दान-दहेज ? ना -ना -ना !हम कोई फ़क़ीर घर में बेटे की शादी नहीं करेंगे ।इतने कम में हम क्यों बेटे का विवाह करें ?कोई मेरा बेटा भागा तो नहीं जा रहा ।साइत अच्छा कहें या किस्मत खराब। अगले महीने ही दूसरा परिवार आया और मुँह- मांगी दहेज देने को तैयार हो गया। अब ढेर किस बात की ? सभी ने तुरंत हामी भर् दी।खुशखबरी रमेश बाबू के कानों तक भी पहुंची। संयोग से वे दोनों लड़कियों को जानते थे ।दोनों उनके ही कॉलेज में पढ़ती थी दोनों ही अपने-अपने गुण-दोषों के कारण चर्चित थीं। वे दोनों की तुलना करने लगे ।जमीन- आसमान का अंतर । पहली दुःख-पीड़ा में भी मुस्कुराने वाली। दूसरी घमंड से बरसने-गरजने वाली ।जी में आया -अपने परिवार को कह दें कम दहेज भी लाती है तो पहली लड़की से ही हमारा विवाह करें ।लेकिन कहे तो कैसे ? कहीं इसका कुछ दूसरा अर्थ ना निकल जाए कि साथ में पढ़ती थी .................... फिर  पैसे कम देंगे तो शादी का सारा खर्च कैसे चलेगा ? लोग सरस्वती और शक्ति से ज्यादा महत्व तो लक्ष्मी को ही देते हैं । सो रमेश बाबू के साथ भी ऐसा ही हुआ। आखिर वे उन धनाढ्य की बेटी के साथ बंध गए ।कुछ ही दिनों में पता चला पहली लड़की की शादी दहेज कम देने के कारण प्राइवेट में काम करने वाला रमेश बाबू के मित्र अजीत से हो गई।
आज उनकी शादी के 25वीं वर्षगांठ है ।मोहल्ले में रहने के कारण अजीत और उसकी पत्नी  भावना भी निमंत्रण पर पधारे। उनकी पत्नी रजनी भावन को जानती थी । इसलिए दोनों साथ -साथ बैठकर बातें करने लगीं। रमेश जी भावना को देख सोच रहे थे । काश मैंने कह दिया होता ,उस दिन अपने परिवार से कि मुझे भावना ही पसंद है ।लोग बातें बनाते, पैसे कम मिलते,लेकिन जीवन तो सुखमय होता। भावना मुहल्ले की सबसे अच्छी और समझदार बहू कहलाती है।और रजनी उफ़ sssss मेरे साथ -साथ मेरे घर वालों और बच्चों के नाक में भी.......................
              सुजाता प्रिय समृद्धि

Tuesday, May 5, 2026

भला कैसे

भला कैसे
बनते हो सभी के लिए,
                        सदा तुम फरिश्ता।
पर क्या जोड़ा है कभी,
                        स्वयं से भी रिस्ता।
  अनगिनत लोगों से है,
                      तुम्हें जान-पहचान।
स्वयं को पहचानने में क्या 
                       कभी लगाए ध्यान। 
   अनेकों से होती है तुम्हारी,
                     बात और मुलाकात। 
   स्वयं से मिलते हो,और 
                    करते हो कभी बात ?
    किसी के चेहरे से पढ़ लेते
                       उसकी अन्तर्व्यथा।
    पर क्या समझ पाते हो कभी
                   अन्तर्मन की अवस्था।
   बताओ तो कोई कि जिसे-
                        नहीं है आत्मज्ञान। 
     तो भला दूसरे को कैसे वह ,
                       सकता है पहचान? 

            सुजाता प्रिय 'समृद्घि'