Tuesday, September 29, 2026

पितरों का आशीष

पितरों का आशीष (मनहरण घनाक्षरी )

पितृपक्ष चल रहा,
    दिन-दिन टल रहा,
       समय निकल रहा, 
          तर्पण तो कीजिए।

कीजिए आप तर्पण,
    पितरों को दे अर्पण,
       फल-फूल समर्पण,
           प्रसन्न हो कीजिए।

तृप्त होते पितृलोक,
   मिटाते हैं रोग-शोक,
      बढ़ा जीवन आलोक,
          श्रद्धा भाव दीजिए।

होकर अति प्रसन्न,
    पितर मन-ही-मन,
        देते अन्न-धन-जन,
          आशीष तो लीजिए।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, September 15, 2026

कर्म हमारे भाग्य बदलते

कर्म किए जा लगन लगाकर, करके तू  ये आस।
कर्म  हमारे  भाग्य  बदलते, मन में रख  विश्वास।

कर्म  हमारा  सच्चा साथी, हर  पल चलता  संग।
मेहनत से जो काम करें हम, लाता एक दिन रंग।
कर्म के पथ पर बढ़ते जाओ,मत कर मन उदास।
कर्म  हमारे भाग्य  बदलते, मन  में  रख विश्वास।

कर्म करो तो इक दिन तुझे, मिलेगा इसका फल।
कर्म  करने  वाले का होता, जीवन सरल-सफल।
सफलता तेरे पग चूमेगी, भर जीवन में  उल्लास।
कर्म  हमारे  भाग्य बदलते,  मन में  रख विश्वास।

कर्म को अपने बुरा न करना,कर्म ही जीवन-सार।
जीवन जीने का, मर्म यही है, करो कर्म से  प्यार।
कर्म  हमारा जीवन धन है, कर्म  के हम  हैं  दास।
कर्म  हमारे भाग्य  बदलते,  मन  में  रख विश्वास।
                
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, September 14, 2026

कर्म हमारे भाग्य बदलते

कर्म किए जा लगन लगाकर, करके तू  ये आस।
कर्म  हमारे  भाग्य  बदलते, मन में रख  विश्वास।

कर्म  हमारा  सच्चा साथी, हर  पल चलता  संग।
मेहनत से जो काम करें हम, लाता एक दिन रंग।
कर्म के पथ पर बढ़ते जाओ,मत कर मन उदास।
कर्म  हमारे भाग्य  बदलते, मन  में  रख विश्वास।

कर्म करो तो इक दिन तुझे, मिलेगा इसका फल।
कर्म  करने  वाले का होता, जीवन सरल-सफल।
सफलता तेरे पग चूमेगी, भर जीवन में  उल्लास।
कर्म  हमारे  भाग्य बदलते,  मन में  रख विश्वास।

कर्म को अपने बुरा न करना,कर्म ही जीवन-सार।
जीवन जीने का, मर्म यही है, करो कर्म से  प्यार।
कर्म  हमारा जीवन धन है, कर्म  के हम  हैं  दास।
कर्म  हमारे भाग्य  बदलते,  मन  में  रख विश्वास।
                
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

मैं

मैं                   मैं 
                  स्त्री हूँ ।
            तो क्या हुआ ?
       मेरा कोई वजूद नहीं ?
   मेरे मन में कोई इच्छा नहीं ?
  चुप रहती हूँ ! पर गूंगी नहीं हूँ।
    यह तो मेरा  एक तरीका है, 
      माहौल शान्त रखने का।
        नहीं चाहती हूँ विवाद, 
        इसीलिए उदासी पर 
    परदा डाल मुस्करा देती हूँ।
दिल के अन्दर कितनी भावनाएँ 
 हिलोरे लेती हैं तूफ़ान की तरह, 
   पर उसे बेरहमी से दवाकर
        शान्त कराती देती हूँ।
  
         सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

Saturday, September 12, 2026

भलाई का पैग़ाम

पैगाम 

प्रशंसा करने से किसी की,
            रहते हो पीछे क्यो भला।
निन्दा सभी की कर तू अपना,
               दिल भी लेते हो जला।
गंभीरता से आत्म चिन्तन,  
             कर कभी तुम  देख लो।
द्वेष का पर्दा हटाकर
             नजरे हृदय में फेंक लो।
बुराई करने से किसी का,
               मन भी हो जाता बुरा।
परमात्मा का अंश हैं सब,
             मत किसी को तुम दुरा।
जो सुपथ से डगमगाये,
                हाथ उसका थाम लो।
रास्ता सच का दिखा दो,
                भलाई का पैगाम दो।
भटके जनों को राह देना,
                            का नाम है।
अज्ञानियों को ज्ञान देना,
                 ज्ञानियों का काम है।
अज्ञान का पर्दा हटकर,
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

सुन

मन साफ नहीन

मन साफ नहीं,तन साफ नहीं।
जब कोई नही तो आप नही।

पटक-पटक कर कपड़े धोए,
गंध-मैल हटाए दूर। 
जो अपने मनमा को धोते,
हो जाते बेकसूर। 

रगड़-रगड़ कर घर को धोया,
कूङा-कचरा साफ किया।
मन-मंदिर को साफ करन में,
कोई झटपट नहीं रहा।

घास-फूस को काट-छांट कर,
आँगन की तूने की सफाई।
पर मनुवा को साफ करन में,
तूने क्यों इतनी देर लगाई।

लिप-पोतकर ऊंची कोठी पर,
सुन्दर रंग  से किया रंगाई। 
वैसे मन को सुन्दर रंग देने में,
बोलो क्यो कर किये ढिलाई। 

काले तन को साफ करन को,
हल्दी-अबटन बहुत लगाये।
पर मनमा को साफ करन में,
कोई झटपट नहीं  दिखाये।


सुजाता प्रिय समृद्धि