Sunday, October 4, 2026

प्रदर्शन

     प्रदर्शन                                                  20/04/2001

एक बार एक महात्मा जी को एक अमीर व्यक्ति ने अपने घर आमंत्रित किया।नियत समय पर वे पधारे।
सेठ जी ने उन्हें गद्देदार सोफे पर बैठाया।
महात्मा जी अस्वस्थ। कास रोग से पीड़ित ।बार-बार खाश रहे थे।खासी से परेशान उन्होंने पानी की मांग की।
लेकिन सिर्फ पानी देना सेठ जी की अमीरी का अपमान था।उन्होने अपने नौकर को बुलाकर धीमें  स्वर में  कुछ आदेश दिया।
        महात्मा जी खासते रहे।
थोडी देर बाद नौकर एक चाँदी के ट्रे में बहुत सुंदर चाँदी के गिलास में बहुत सुंदर रंग का खुशबूदार शर्बत लेकर आया और महात्माजी की ओर बढाया। 
खासी से महात्माजी का कंठ सुख रहा था।उन्होने जल्दी से शर्बत का गिलास उठाया और  दो घूंट पीकर गिलास वापस ट्रे में रख दिया।
उनका यह नकारात्मक ढंग देख सेठ जी तिलमिला उठे।गुस्से में  भरकर उन्होंने कहा- महात्मन! आपने यह शर्बत क्यों छोड दिया ? यह बहुत ही महंगे स्क्वाइस से बनाया गया है।
महात्मा जी ने बड़े ही शांत और सरल शब्दों में कहा-बेशक आपने मुझे महंगे पात्र में महंगे शर्बत पेश किया।लेकिन मेरे लिए इसका कोई मोल नहीं। 
सेठ जी ने आश्चर्य मिश्रित रोष में प्रश्न किया-क्यों, आखिर क्यों महात्मन ? मैने तो आपके आदर ...
महात्मा जी उनकी बात  बीच में  ही काटते हुए बड़े ही संयत स्वर में कहा-आप देख रहे हैं, मैं कास रोग से पीड़ित हूँ। इसलिए यह शर्बत कितना भी मूल्यवान क्यों न हो,मेरे लिए कितना हानिकारक है।
इस वक्त मुझे सादे पानी की आवश्यकता थी।न कि इस महंगे शर्बत की।सेठ जी को अपनी भूल के एहसास हुआ। सचमुच धन के घने कोहरे में मदान्थ हो किसी के कष्टों और आवश्यकताओं की ओर ध्यान देना ही..............
उन्होंने महात्मा जी से अपनी इस भूल के लिए हाथ जोडकर क्षमा माँगी। 
             सुजाता प्रिय 'समृद्घि'

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