Friday, September 24, 2021

दादी मां की शिक्षा

दादी मां ने हमें सिखाया, प्यार सभी से करना।
मिल-जुलकर सभी से रहना,आपस में न लड़ना।

नये-नये पकवान बनाकर दादी हमें खिलाती।
दूध,छाछ अमझोरा,सत्तु, लस्सी हमें पिलाती।
कहती कोल्ड्रिंक्स न पीना घड़े का पानी पीना।
मिल-जुल-कर ...............
दादी मां अपने विस्तार पर, साथ हमें सुलाती।
दादा जी संग घूमने जाती, साथ हमें ले जाती।
ट्रैफिक का नियम बताती,कहती बायें चलना।
मिल-जुलकर ............
दादी मां हमको रोज सुनाती, प्यार भरी कहानी।
फिर अंत में शिक्षा दे कहती,करना ना मनमानी।
सदा बड़ों का कहना मानो, खूब पढ़ाई करना।
मिल-जुलकर .............
मां-पिताजी के गुस्से से, दादी मां है हमें बचाती।
फिर प्यार से गोद बिठाकर,हमको है समझाती।
अच्छे बच्चे ज़िद न करते, शैतानी न तुम करना।
मिल-जुलकर .................
                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, September 23, 2021

सरस्वती वंदना

मां शारदे ! मां शारदे!
अज्ञानता से उबार दे।
मां शारदे................
तेरे शरण में हम हैं आयें,
लेकर बहुत विश्वास मां।
तेरे चरण में सिर नवायें,
रखकर हृदय में आस मां।
मेरी मूढ़ता को दूर कर दे,
मन-ज्ञान को तू निखार दे।
मां शारदे!...................
दिल में विराजे तू सदा,
 मन में बसा तेरा रूप है।
हर भाव में,हर बात में,
हर वाणी तेरा स्वरूप है।
मन-वचन को स्वच्छ रखूं,
सुंदर सदा तू विचार दे।
मां शारदे!...................
तेरे धवल वसन-स्वरूप-सा,
अंत:करण मेरा रहे।
हर जीव के खातिर हृदय में,
इंसाफ का डेरा रहे।
हर पुण्य कर्मों को करें हम,
तुम इसे विस्तार दे।
मां शारदे!....................
स्वरचित, मौलिक
सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Wednesday, September 22, 2021

मुफ्त में सब्जी



मुफ्त में सब्जी

पत्नी बोली सुनो पिया जी!तुमको अकल नहीं है।
मोल-भाव कर सब्जी लेने का,कोई नकल नहीं है।
बिक्रेता जितना दाम बताता है,उतने में तू लेते हो।
अपनी कमाई का मोटा हिस्सा बेकार गवां देते हो।
बड़े ही तुम हो सीधे- सादे ,और बड़े हो तुम भोले।
दो रुपए तुम दाम घटाओ,जितना भी विक्रेता बोले।
चले पिया जी सब्जी लाने, पाकर पत्नी से शिक्षा।
प्रिया ने जितना पाठ पढ़ाया था,देने उसकी परीक्षा।
पत्नी जी की पसन्द की, वे सभी सब्जियां लाने।
हर सब्जी के दामों में,वे लगे दो-दो रुपए घटवाने।
एक बूढ़ी सब्जी वाली, जो दिखती चेहरे की भोली।
मुट्ठी भर धनिया-पत्ती का वह, दाम दो रुपए बोली।
पति महोदय हंसकर बोले,मुफ्त में दो धनिया पत्ती।
बूढ़ी सब्जी वाली के चेहरे पर,साफ दिखी आपत्ति।
अपनी आंख नचाकर पूछी,क्या तेरे मुंह हैं चिकने?
सब्जियां दान करने ना रखी, रखी हूं यहां मैं बिकने।
पति महोदय हंसकर बोले, क्यों गुस्सा करती माई।
दो रुपए दाम घटाने को,प्यारी पत्नी है मुझे सिखाई।
दो रुपए की धनिया पत्ती का, दाम बता क्या होगा?
दो रुपए कम करने पर, यह मुफ्त में ही तो होगा।
सब्जी वाली हंस कर बोली- सुन मेरा बेटा ! भोला।
उस दिन तुम आकर,यहां पर मुफ्त में भरना झोला।
जिस दिन सब्जी बेचने बैठेगी,यहां तुम्हारी घरवाली।
सब्जियों से भरकर ले जाना, घर अपना झोला खाली।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, September 19, 2021

मुहब्बत की बरसात हो (ग़ज़ल)

जिंदगी में मुहब्बत की बरसात हो।
मुहब्बत ही हमारा बस सौगात हो।

मुहब्बत का बादल , छाये गगन में,
गरज के साथ मुहब्बत का प्रपात हो।

मुहब्बत की धरा पर,गिरे बूंद बनकर,
दिन में शुरू हो गिरना तो फिर रात हो।

मुहब्बत के जल से , भरे ताल पोखर,
झर-झर झरनों से यूं झंझावात हो।

मुहब्बत की नदी में,बहे धार बनकर,
दूर -सुदूर तक यही जलजात हो।

मुहब्बत की धारा,बहे अब निरंतर,
समंदर से उसकी ,तब मुलाकात हो।

समंदर से मुहब्बत उड़े भाप बनकर,
मेघों का रूप ले , फिर बरसात हो।
      सुजाता प्रिय'समृद्धि'

Saturday, September 18, 2021

मासूम सवाल

मासूम सवाल

अम्मा चंदा क्या होता?अम्मा सूरज क्या होता?
अम्मा नदिया क्या होती?अम्मा पर्वत क्या होता?

अम्मा दीदी क्या होती?अम्मा भैया क्या होता?
अम्मा अम्मा क्या होती,अम्मा बाबा क्या होता?

नन्ही-सी बिटिया का प्यारा मासूम सवाल।
क्या कहूं कितना मेरे मन को कर गयी निहाल।
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

मां का रूप

मां का रूप

मां का है रूप अनूप,जाने रंक धनी और भूप।
मां सुखदाता का रूप जाने........
मां महागौरी,मां महाकाली,मां ही ज्योतावाली।
मां ही शारदा,मां ही लक्ष्मी,बल-बुद्धि देने वाली।
मां अद्भुत-अपूर्व अनूप जाने........
मां बच्चे को जन्म है देती,पालन पोषण करती।
दूध पिलाकर भूख मिटाती,सारे दुखड़े हरती।
मां समस्त सिद्धि-स्वरूप जाने.................
मां की महिमा बड़ी निराली, जिसका कोई छोर नहीं।
मां की ममता लूट सके जो,ऐसा डाकू चोर नहीं।
बदल सके ना मां का रूप जाने......
मां सुख करनी, संकट हरनी,मां ही सुख की छाया।
मां ममता की सुंदर मूरत,जिसमें है बसती माया।
मां सुबह की कोमल धूप,जाने........
मां गर्मी में शीतल छाया,जाड़े में है अंगीठी।
वर्षा में छतरी बन जाती,जिसकी छाया मीठी।
मां हर ऋतु के अनुरूप जाने.......
मां ठंडा जल भी हमें पिलाती, लगता अमृत जैसा।
शर्बत-छाछ जो घोल पिलाती, कहीं न मिलता वैसा।
मां मीठे जल का कूप, जाने .......
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, September 15, 2021

मामी जी का 'और बताओ' (हास्य-व्यंग्य)



कालेज से आते प्यास से व्याकुल,पहुंची मामी पास।
बोली- मामीजी ! पानी दीजिए,लगी है जोर से प्यास।

मामी ने पूछा और बताओ,अब क्या है हाल तुम्हारा?
सब ठीक-ठाक कहकर उनसे पानी मांगी मैं दोबारा।

उठते मामी पूछी- और बताओ,मां-पिताजी हैं कैसे ?
तिलमिला कर मैं बोली-सब ठीक ही हैं पहले जैसे।

मामी ने पूछा-और बताओ,पढ़ाई कैसी चल रही है?
मैंने कहा- खूब अच्छे से, धीरे- धीरे निकल रही है।

मामी कदम बढ़ाते पूछा-और बताओ,दीदी कहां है?
मैं बोली-कहीं मुम्बई के आगे, मेरे जीजाजी जहां हैं।

मामी बोली-और बताओ,बहन को नहीं तुम मानती।
और बताओ,बहन कहां रहती है इतना नहीं जानती।

फिर वह पूछी कि और बताओ,भाई क्या कर रहा है?
मैंने कहा-ग्रेजुएशन कर,नौकरी का फार्म भर रहा है।

मामी पूछी और बताओ,फार्म भरता या पढ़ता भी है?
और बताओ,भावी जीवन की राह कोई गढ़ता भी है?

और बताओ,तुम अपने दादा और दादी का समाचार।
बोली मैं दादाजी तो ठीक हैं,पर दादी है थोड़ी लाचार।

पुनः मामी ने पूछा-और बताओ,पास-पड़ोस का हाल।
मामी की तकिया कलाम प्रश्नों से हुआ हाल मेरा बेहाल।

मैं बोली कि सब सानंद है,अब मैं तो घर को चलती हूं।
मामी ने कहा-और बताओ,रुक जाओ पकौड़े तलती हूं।

मैं बोली-बस मांगी थी पानी,नहीं पकौड़े की मुझको चाह।
मामी ने कहा-और बताओ,बिना खाए-पीए पकड़ ली राह।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'