Friday, September 4, 2020

शिक्षक की परिभाषा

                                    शिक्षक
                               ऐसे शिल्पकार
                         जो मंदिर उठाते ज्ञान के।
    शिक्षक   ऐसे   काष्ठकार जो , द्वार  बनाते   ज्ञान  के।    शिक्षक   ऐसे   मूर्तिकार जो,  मूरत बनाते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   बुनकर हैं जो, वस्त्र  बनाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   स्वर्णकार जो, गहने  गढ़ते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   माली हैं जो , फूल खिलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   पंडित हैं जो , पूजन करते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   त्रृषि-मुनि हैं जो, दीक्षा देते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   दीपक हैं जो,ज्योत जलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   मार्गदर्शक जो,राह दिखाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   अनुगामी जो,लक्ष्य दिलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   रक्षक हैं जो,रक्षक हैं बनते  ज्ञान  के।
                          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
                  समस्त शिक्षकों को सादर समर्पित

Thursday, September 3, 2020

आत्महत्या सुलझन नहीं उलझन।


आज कल आत्महत्या का प्रचलन बढ़ता जा रही है आए दिन समाचार पत्रों में आत्महत्या की खबरे छपी दिखती है।साथ ने यह भी लिखा रहता है कि मानसिक तनाव , जिम्मेदारियों के बोझ अथवा आर्थिक तंगी से घबरा कर आत्महत्या कर ली। विद्यार्थी गण असफलता के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। स्त्रियाँ कलह और मानसिक अवसादों का शिकार हो आत्महत्या कर रही हैं।लेकिन क्या कभी किसी ने यह सोंचा कि आत्महत्या कर लेने से उनकी यह समस्या सुलझ जाएगी ? नहीं न।
किसी भी परिस्थिति में की गई आत्महत्या सुलझन नहीं हो सकती ,वल्कि यह हर बातों में उलझन ही उत्पन्न करती है।जिस समस्या का समाधान या निदान व्यक्ति जीते जी नहीं कर सकता, उसे मरने के पश्चात कैसे कर सकता है।मरकर तो कितनी ही अनसुलझी गुत्थियों को उलझाकर और अपने आप में समेटकर ही चले जाते हैं।स्वयं भी किव्दंतियों एवं बदनामियों के शिकार होते हैं , और दोस्त- साथियों  और परिजनोंं को भी उलझन में डाल देते हैं।स्वयं अवसाद एवं मानसिक तनाव से निजात पा लेते हैं किंतु दूसरों को उलझाकर चले जाते हैं।
जिंदा रहकर सारे रहस्यों का पर्दाफास किया जा सकता है, मन की सारी उलझनों को सुलझाया जा सकता है न कि आत्महत्या कर सारी रहस्यों को दफन कर।
इस प्रकार आत्महत्या सिर्फ और सिर्फ उलझन है सुलझन नहीं।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

तर्पण का महत्व ( लघु कथा )

सोनू आज बहुत उदास है।दादाजी और दादी माँ गाँव चले गए हैं।अब तक दादा-दादी के साथ घूमने- फिरने , पढ़ने-लिखने, नित नई एवं प्रेरक कहानियाँ एवं भजन - गीत इत्यादि सुनने में उसे जो मजा आता था।वह उनके जाने के बाद कहाँ ।उसने दादाजी को रूकने के लिए बहुत मनाया ।पर वे बोले- दो दिन बाद पितृपक्ष प्रारम्भ होने वाला है।वे गाँव जाकर पितरों को तर्पण करना चाहते हैं।
सोनु ने पूछा -"यह तर्पण क्या होता है और क्यों किया जाता है?"
दादाजी ने समझाते हुए कहा-"इन दिनों हम अपने पूर्वजों के नाम जल, फूल , प्रसाद इत्यादि अर्पित कर उन्हें याद कर प्रणाम करते हैं।"
"क्या आपको अपने पूर्वजों के नाम याद है?" सोनु ने पूछा।
      "हाँ मुझे अपने दादा-परदादा के अलावा इक्किस पुस्त तक अपने पूर्वजों के नाम याद हैं।"
सोनु ने पूछा- "आप उनके नाम कैसे जनते हैं और कैसे याद रखते हैं।उतने नामों को याद रखना तो बड़ा ही कठिन कार्य है।"
"मुझे उनके नाम मेरे पिताजी ने बताया था।मैं अपनी डायरी में उनके नाम लिखा हूँ।"

"नाम याद रखना कोई कठिन कार्य नहीं। इतिहास में तो जाने कितने लोगों के  वंशजों के नाम याद रखना पड़ता है।"दादाजी ने सरलता से उत्तर दिया।

सोनु ने कहा-"आप  यहीं रहकर अपने पूर्वजों का तर्पण करें।"
        "नहीं हम अपने पैतृक घर जाकर  समस्त परिवार के साथ मिलकर ही यह पुण्य कार्य संपन्न करते हैं। इस तरह गोत्र-परिवार से हमारी भेंट भी हो जाती है।कुछ दिन उनके साथ भी रहना अच्छा लगता है।जब हम नौकरी करते थे तब भी गाँव जाकर ही यह कार्य करते थे।"
       "पितरों को तर्पण करने से क्या लाभ है?"  सोनु ने उत्सुकता बस पूछा।
"तुम मुझे चाय ,पानी ,नाश्ता लाकर क्यों देते हो ?" उसकी बातों के उत्तर में दादाजी ने एक प्रश्न कर दिया।
    "क्योंकि आप खुश होकर वाह-वाह बोलते हैं।"
"ठीक उसी प्रकार हमारे पूर्वज तर्पण करने से प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद देते है।यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है।हम अपने पूर्वजों एवं बड़ों को जैसा आदर सम्मान करते हैं ,हमारी अगली पीढ़ी के मन में भी हमारे प्रति वैसे ही भाव उत्पन्न होते हैं।"
    "इसलिए हमें पितरों को तर्पण - नमन अवश्य करने चाहिए।उन्होंने हमें इस जगत में उत्पन्न कर पाला-पोसा और लायक बनाया।इसलिए वे हमारे देवता है।"
सोनु तथा उसके माँ-पिताजी का मन इन बातों को सुनकर बहुत खुश हुआ।उन्होंने दुर्गा पूजा के अवसर पर गाँव आने का वादा किया ताकि परिवार के सभी लोगों से उनकी भेंट-मुलाकात हो सके।

             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
       स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, September 2, 2020

नारी के हैं रूप अनेक

मत कहो कि है अबला नारी।
सदा- ही रही है सबला नारी।।

पाई है  वह  बस, दो- ही हाथ।
कितने कामों को करती साथ।।

सबके लिए है भोजन पकाती।
दूर तालाब से  है पानी  लाती।।

नौ महीने तक पेट में रखकर।
बच्चे जन्म देती दुःख सहकर।।

एक बच्चा को पीठ पर बाँध ।
और दूजे को कराती है स्नान।।

समय पर है विद्यालय पहुँचाती।
और घर आने पर स्वयं पढ़ाती।।

घर के सारे बर्तन- कपड़े धोती।
तड़के जगती है व देर से सोती।।

सिलाई- बुनाई और करे कढ़ाई।
कूड़े- कचरे की  भी करे सफाई।।

कुदाल  चला वह खेती करती।
पाल - पोष सबका दुख हरती।।

बीमारों की  देखभाल करती।
बड़े-बूढों की सेवा भी करती।।

बाजार का काम भी है  करती।
कभी नहीं मुख से उफ कहती।।

पैसे कमाने भी बाहर है जाती।
डाक-दफ्तर को भी निपटाती।।

जलावन की लकड़ियाँ बिनती।
किन-किन कामों की है गिनती।।

दुर्गा काली की लेकर अवतार।
देश-रक्षा करती उठा हथियार।।

महामाया-मोहा-नारायणी नारी।
शक्तिशालिनी- कात्यायनी नारी।।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, August 31, 2020

चौपाई

हर-हर-हर भोले त्रिपुरारी।
सब संकट तुम हरो हमारी।

दया करो तुम हे  नागेश्वर।
हे शिव-शंकर, हे परमेश्वर।

आयी  जग में विपदा भारी।
त्रस्त है जिससे दुनिया सारी।

पीकर तूने विष का प्याला।
सारे जग का बने रखवाला।

आज नाथ तू हमें बचा लो।
सारे कष्ट को  दूर भगा दो।

क्षमा करो अपराध हमारा।
भूल-चूक जो भी हो सारा।

    सुजाता प्रिय'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, August 28, 2020

अपराध बोध ( संस्मरण )

बात उस समय की है- जब मैं पहली कक्षा में पढ़ती थी।दादाजी अपना कलमदान खोलकर कोई जरूरी कागजात ढूंढ रहे थे। उत्सुकताबस मैं उनके कलमदान से निकलने वाली प्रत्येक वस्तुओं के नाम एवं इस्तेमाल पूछती और दादाजी बताते जाते ।लेकिन कुछ देर बाद दादाजी मेरे प्रश्नों से ऊबने लगे।क्योंकि उन्हें वह कागजात मिल नहीं रहा था। कलमदान से निकालकर बीस पैसा मुझे थमाते हुए बोले जा दुकान से कुछ खरीदकर खा लो।मैं खुश होकर सामने वाली दुकान गई । दुकानदार ने पूछा क्या चाहिए? पर मेरे लिए यह निर्णय कर पाना कठिन था कि क्या लूँ।
मैं दुकान में रखी सामग्रियों को देखने लगी।अचानक मेरी नजर ढेले वाले गुड़ पर पड़ी।मैं झट उधर इशारा कर दी।दुकानदार ने मेरे हाथ से पैसे ली और दोनों हाथों में एक-एक ढेला गुड़ थमा दी।
घर आकर मैं एक ढेला-गुड़ अपनी बहन को दी और स्वयं गुड़ खाने लगी। उसी समय बगल की एक बुआ की नजर हम पर पड़ी और वह मेरी माँ को पुकारती हुई बोली-ये दोनों गुड़ खा रही हैं।
माँ ने कमरे से निकल कर गुस्से से कहा -अभी पीटती हूँ। मैं सोची माँ से बिना पूछे दुकान चली गई इसलिए माँ मुझे पीटेगी।डर से मैं भागती हुई पिताजी के पास पहुँची ।पिताजी बगीचे की सफाई करबा रहे थे। बगीचा मेरे घर से थोड़ी दूर पर था।पिताजी ने कई बार मुझे घर जाने के लिए कहा,पर मैं नहीं गई।तब उन्होंने मुझे अपने पास बैठा लिया।शाम ढल गई ।पिताजी ने कहा क्यों इतनी देर रही ।स्वेटर भी नहीं पहनी।कितनी ठंढ है।उन्होंने अपने सिर पर पहनी मंकी- कैप को मुझे पहना दिया जिससे मेरा पूरा सिर और गर्दन ढक गया।फिर अपना मोटा तौलिया ओढ़ाकर घर ले चले।रास्ते में जितने लोग मुझे देखते पुचकारकर पूछते क्या री बंदरिया? एक चाचा जी ने तो पिता जी से पूछ लिया -इस बंदरिया को कहाँ से पकड़ लाये ।पिताजी मुस्कुरा कर रह जाते और मैं अपना नया नाम सुनकर खुशी से इतराती हुई घर पहुँच गई।माँ को देख अपराधबोध से मेरी नजरें झुक गई।
पिताजी ने माँ से पूछा- इसे मारा था क्या ?यह इतनी देर मेरे पास क्यों रही?
माँ ने कहा -मारी तो नहीं, मारने जा रही थी।
पिताजी ने पूछा-क्यूँ?
माँ बोली- माधुरी बोली कि यह गुड़ लेकर खा रही है। मुझे लगा गणेश-चतुर्थी के लिए गुड़-तिल मंगाई उसे जूठा कर दी ।परन्तु पूजा घर के पास आई तो देखी पूजा घर का दरवाजा बंद है। उसकी सिटकनी इससे खुल ही नहीं सकती।लेकिन तब-तक यह भाग चुकी थी। बाबूजी ने बताया -मैने इसे पैसे दिए थे उसी से गुड़ खरीदकर खा रही होगी।
अब सारी बातें मेरी समझ में आ गईं कि ना  माँ बिना पूछे दुकान जाने के लिए नाराज थी, ना गु़ड़ खाने के लिए और ना ही बाहर जाने के लिए।बस मेरे मन में ही एक अपराध बोध का भय था।आसमान में चाँद लाल आभा के -साथ निकल आया था माँ ने चाँद देखकर गणेश-भगवान का पूजन किया।और प्रसाद बाँटा। मैं खुश होकर खाई और मन में संकल्प की कि माँ से बिना पूछे कुछ भी नहीं करूँगी।यदि मैं माँ से पूछ कर दुकान जाती तो इतनी बातें ही नहीं बढ़ती।
        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
       स्वरचित एवं सच्ची घटना

Thursday, August 27, 2020

उन्मुक्त भाव

उन्मुक्त धरा के सहवासी हों,
                         मन में भाव जगाइए।
हम सब मिलकर इस धरती को,
                          सुंदर सहज बनाइए।
हम सब मिलकर............

हम उन्मुक्त तभी रहेंगे,
                जब भाव हमारे हों उन्मुक्त।
सभी जनों का क्लेश हरें हम,
                   भेद-भाव से होकर मुक्त।
वैर-द्वेष और कलुष रहित हो,
                         ऐसा महल सजाइए।
हम सब मिलकर.......

कभी किसी को दुःख ना दें,
                 किसी का ना अपमान करें।
उन्मुक्त भाव से सब प्राणि का,
                   सदा ही हम सम्मान करें।
प्रेम,दया सब वासी में हो,
                           ऐसा नगर बसाइए।
हम सब मिलकर...........

निर्भय हो हर बाला घूमें,
                     हर बालक निष्पापी हो।
ममता की मूरत हर नारी हो,
                     हर नर अब प्रतापी हो।
प्रेम परस्पर सब लोगों में हो ,
                           ऐसी रीत चलाइए।
हम सब मिलकर...........

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित