Saturday, March 21, 2020

चहुँ ओर मिलावट दिखती है

हम जन मानस के जीवन में,
चहु अोर मिलावट दिखती है।
वसन-वस्तुओं, रिस्ते-नातो में,
घनघोर मिलावट दिखती है।

मिलना- मिलाना है बात भली।
है मेल-जोल की सौगात भली।
मेल-जोल मिलाप रखने में भी,
अब घोर मिलावट दिखती है।

घी-तेल में मिलावट है शानी।
दूध-छाँछ में है मिलता पानी।
क्या कहूँ अब तो पानी में भी,
पुरजोर मिलावट दिखती है।

मिलावट आटे,चावल,दालों में।
और नमक मिर्च मसालों में।
अब सारे खाद्य सामानों में।
बेजोड़ मिलावट दिखती है ।

सब्जियाँ को हरे रंग से रंगते।
फलों में पानी-शर्बत भरते।
दवा-दारु और दुकानों में,
बलजोर मिलावट दिखती है।

राजनीति की बात भी क्या।
है सत्ता की विसात भी क्या।
दलबदलुओं की दूसरे दल से,
गठजोड़ मिलावट दिखती है।

मिलावट का यह दौर चला।
इस पर करते क्यों गौर भला।
यहाँ रक्षक और रक्षापालों में।
रण छोड़ मिलावट दिखती है।
                 सुजाता प्रिय

Friday, March 20, 2020

विश्व गौरैया दिवस पर चिंतन विशेष

कहाँ गई तुम ओ गौरैया

एक जमाना बीता जब
मेरे कमरे के रोशनदान पर,
खर-पतवार के तिनके
दवा चोंच में लाती थी तू गौरैया।
एक-दूजे में उलझा-उलझाकर
थोड़ा उसमें फँसा-फँसाकर,
घोंसला अपना बनाती थी तू गौरैया।
रह-रहकर तुम्हारे नव-जनमें बच्चे,
मधुर कलरव जिसमें करते थे।
मेरे हृदय में मधुरस घोल
नव जीवन वे भरते थे।
चीं-चीं की कोमल संगीत,
सुनाई पड़ता था कानों में।
मन के तार झंकृत हो उठते थे,
उनके मधुर-मीठे गानों में।
उनके कोमल,लाल चोंच में,
तुम दानों के कण भरती थी।
निज शिशुओं की भूख मिटाकर,
अंतर की पीड़ा हरती थी।
चलचित्र-सा देखा करती थी,
पुलकित मन से मैं वह दृश्य।
माता की ममता की महिमा,
कैसी सुंदर उपहार सदृश्य।
आज न दिखती हो तुम गौरैया,
न श्रवण ही होता तुम सबका गाना।
रोशनदान घोंसले बिन सूना है ,
कौन छेड़ेगा वह प्रेम-तराना।
हाय कहाँ तू गई गौरैया,
बना बसेरा आसमान में।
नीले-नभ की सीमा पाने,
या पर फैलाने नील -वितान में।
                    सुजाता प्रिय

Friday, March 13, 2020

दिलवर

नजरें बिछाए बैठ़ी हूँ तेरा दीदार चाहिए।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए।

दिल में तुम्हारे प्यार का दरिया है बह रहा।
दिलब के दिल में डूबना दस्तूर है यहाँ।
दिलवर तू खेवनहार हो पतवार चाहिए।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए ।

मेरे दिल के दायरे में दिलवर तुम्हीं रहो।
दखल हो किसी और का ये बात ना कहो।
दुआ हो जिसके लब पे वो दिलदार चाहिए ।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए।

दिलवर हमारे दरमियाँ दीवार ना रहे ।
दस्तक पे दिल का बंद दरवार ना रहे।
दिल की दरख्त पर बस दुलार चाहिए।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए।

दिलवर कभी भी दिल को दुत्कारना नहीं।
दिल में कभी भी लाना तू दुर्भावना नहीं।
दिल को दुरुस्त रखने की दरकार चाहिए ।
दिलवर तुम्हारे दिल में मुझे प्यार चाहिए।
                            सुजाता प्रिय
   

Monday, March 9, 2020

आज सखी खेलें होली

चलो आज सखी खोलें होली ,मिलजुलकर।
मिलजुलकर आज खेलें होली, मिलजुलकर।

           प्रेम-भाव के जामा पहने,
   .      सद्भावों के पहनकर गहने,
  प्रीत की पहन चुनर-चोली, मिलजुलकर ।
मिलजुलकर आज खेलें होली, मिलजुलकर।

        प्यार के रंग से भर पिचकारी।
          सराबोर करें दुनियाँ सारी।
  एकरूपता की बनाएँ टोली,मिलजुलकर।
मिलजुलकर आज खेलें होली, मिलजुलकर।

           सुविचारों के गुलाल लगायें।
          सद्व्यवहारों की सुगंध फैलाएँ।
    बोलेंं मीठी - मधुर बोली ,मिलजुलकर।
मिलजुलकर आज खेलें होली, मिलजुलकर।

           प्रीत से बनाएँ जग रंगीला।
           छटा सुनहरी नीला-पीला।
   खुशियों से भर लें झोली, मिलजुलकर।
मिलजुलकर आज खेलें होली, मिलजुलकर।
                   सुजाता प्रिय

होलिका की गोदी में

जगह-जगह अंबार है ,लगा हुआ इंधन का।
सभी जगह तैयारी है,होलिका के दहन का।

साँझ होते ही बुराई की प्रतीक होलिका जलेगी।
वर्ष भर की विषमताएँ , जलकर आज टलेगी।

साथ मिलकर सभी ,जाते हैं होलिका जलाने।
बुराई पर अच्छाई का, विजय- गीत को गाने।

लेकिन कोई जला न पाता,निज मन के विकारों को।
नहीं कोई भी त्याग है पाता , अपने बुरे विचारों को।

सच्ची होलिका तभी जलेगी,जब सारे भेद जला दो।
समस्त दुर्व्यवहारों को,होलिका की,गोदी में बैठा दो।

भरम मिटा दो भेद-भाव का,प्रेम सदा लहरा लो।
अन्याय-दूष्टटता-कटुता को ,मन से दूर भगा लो।

द्वंद्व दूर कर मन में बंधुत्व के पाठों को दुहरा लो।
मानव हो तो मानवता के,झंडे को तुम फहरा लो।
                                           सुजाता प्रिय

Sunday, March 8, 2020

उठो नारियों भारत की

आजादी की ओर बढो़ तुम,
उठो नारियों भारत की।
सामाजिक बंधन तोड़ बढ़ो तुम
उठो नारियों भारत की ।

रावण हर न तुम्हें ले जाये।
राम अग्नि में नहीं जलाये।
चीर-हरण न करे दुःशासन।
पत्थर तुमको करे न गौतम।
बलात् अंधी मत बन गंधारी-सी,
उठो नारियों भारत की।

दुर्गा बन मार गिरा असुरों को।
अनुसुया बन पालने झुला देवों को।
सावित्री बन सौभाग्य वापस ले यम से।
लक्ष्मी बन मार भगा अँग्रेजों को।
हैवानों से लो डटकर टक्कर,
उठो नारियों भारत की।
             सुजाता प्रिय

Saturday, March 7, 2020

अभिसार के पल

मुझे याद है,
वह सुनहरी शाम।
गुनगुना रहे थे तुम,
लेकर मेरा नाम।

वह रूपहली
वाटिका के मेड़ पर।
खड़े थे तुम
वसंत-मालती के
वेल पकड़।

ओट ले,
पेड़ों की
झुरमुट्टों की।
दबे पाँव मैं
तुम तक थी पहुँची।

जाने किन
स्वप्नों में थे तुम लीन।
शायद थी मैं
तेरे अहसासों में विलीन।

चुपचाप खड़ी रही
मैं तेरे पीछे।
मौन खड़े रहे
तुम भी अखियाँ मींचे।

रोकना मुश्किल था
मिलन का वह
उतावलापन।
भावों के भँवर में
गोते लगाता
वह बेकरार मन।

कितने प्यारे थे
वे अभिसार के पल।
दिल तेरा बेचैन
और
मन मेरा विकल।

साक्षी है,
वह थका- मांदा,
अलसाया सूरज।
मेरे विकल मन में,
तेरे भींचे नयन में ।
वसी थी किसकी सूरत।
              सुजाता प्रिय