Tuesday, February 11, 2020

होली तब और अब

हमारा देश भारत 'त्योहारों का देश' के नाम से विश्व विख्यात है ।आदिकाल से ही यहाँ अनेकानेक त्योहार मनाए जाते हैं।यहाँ मनाये जाने वाले हर त्योहार का उद्वेश्य समाज के हर वर्ग के लोगों में आपसी भाईचारा, प्रेम ,एकता एवं सद्भावना को बढ़ावा देना है ।उन त्योहारों में से दूसरा सर्वप्रमुख त्योहार है 'होली'। जिसे हम हिन्दु संस्कृति के अनुसार वर्ष के प्रथम दिवस के रूप में मनातेे हैं ।
बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में-
यह पर्व बुराईयाँ नष्ट कर अच्छाईयों का समावेश करता है ।यह पर्व हमें यह संदेश देती है कि बुराई पर अच्छाई की विजय अवश्य होती है।होलिका दहन से संबंधित एक अत्यंत पौरानिक कथा प्रचलित है।असुर राजा हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानते थे,किन्तु उनका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। हिरण्यकश्यप ने पुत्र प्रहलाद को भगवान की भक्ति से विमुख करने की बहुत कोशिश की।जब वह नहीं माना तो वह अपनी बहन होलिका जिसे यह वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में प्रवेश करने पर भी नहीं जल पाएगी।हिरण्यकश्यप ने होलिका की गोद में बैठाकर प्रहलाद को चिता में जला देना चाहा किन्तु बालक की रक्षा स्वयं भगवान ने की और होलिका जलकर राख हो गई।इस प्रकार बुराई के ऊपर अच्छाई और विश्वास की विजय हुई ।तब से हमारे यहाँ होलिका जलाने की प्रथा चल पड़ी।
सभी की खुशहाली की कामना-
पहले गाँव अथवा मुहल्ले में बहुत ही निष्ठापूर्वक एवं विश्वास के साथ सभी लोग मिलकर धूम-धाम से फाल्गुन मास की पूर्णिमा अर्थात् होली के एक दिन पूर्व होलिका दहन की तैयारी करते थे।टोले मुहल्ले के बच्चे घर-घर घूमकर होलिका दहन के लिए यह कामना करते हुए इंधन माँगते थे कि आपके दरवाजे सोने के हों । अर्थात् आपके घर में सुख समृद्धि का वास हो  और आपके घर परिवार के दुख-दारिद्र का नाश हो इसलिए आप हमें होलिका दहन के लिए इंधन दें।इस तरह से लोग बहुत सारे इंधन इकट्ठा कर भगवान की महिमा का गुणगान करने वाले गीत - भजन गाते,ढोल - बाजे बजाते हुए होलिका दहन करने जाते थे।वहाँ पंडितों द्वारा विधिवत मंत्रोचारण के साथ होलिका दहन होता था सभी लोग एकजुट होकर संकल्प करते कि अपने मन से  बुराई का त्याग एवं अच्छाई को ग्रहन करूँगाऔर अच्छे कर्मों तथा विचारों का पालन करूँगा।प्रसाद के रूप में चने और गेहूँ की हरी बालियाँ लौंग -इलायची तथा नीम की पत्तियों को उस अग्नि में पकाकर खाया जाता था।जिसका वैज्ञानिक महत्व था।पूरा टोले महल्ले के लोग नीम की पत्तियों को पकाते थे तो उसकी महक वायु मण्डल में फैलकर चैत मास में उत्पन्न होने वाले विषाणु को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करते थे। इस प्रकार मौसम के बदलाव से होनेवाली रोगों से बचने का उपाय भी हो जाता था और लोग  स्वस्थय के प्रति सचेत भी हो जाते थे।
लेकिन अब होलिका दहन मात्र औपचारिकता  अथवा मन बहलाव के लिए किया जाता है।अबके बच्चे घर-घर जाकर इंधन माँगने के बजाए किसी की झाड़ियाँ , लकड़ियाँ आदी बिना मांगे पूछे उठा ले जाते हैं। कहीं-कहीं तो यह भी सुनने को मिलता है कि मुहल्ले के उद्दण्ड लड़के ने किसी की कुर्सी ,चारपाई, फाटकों तथा काम में आनेवाली जरूरी वस्तुओं को भी अग्नि के हवाले कर दिया। उनके इस तरह के कुकृत्तय का दुष्प्रभाव समाज की भावी पीढ़ियों पर भी पड़ता है । इस प्रकार से हम बुराई के दहन के बदले बुराई को ग्रहण कर लेते हैं।लड़कों के माता-पिता तथा अभिभावकों को उनके मन से इन दुर्व्यवहारों को दूर करने के लिए प्रेरित करना होगा।
एकरूपता एवं सामंजस्य सीने का प्रयास-
यद्यपि यह त्योहार रंगों के त्योहार के रूप में जाना जाता है।फिर इस त्योहार का हमारी संस्कृति में एक अलग पहचान और महत्व है।रंग लगाने की प्रथा भी एक महान उद्वेश्य से ही प्रचलित हुई।कहते है भगवान श्रीकृष्ण जब बाल रूप में थे तब उनके हृदय में अपने साँवले स्वरूप से  खीज और अपनी प्रिय सखी राधा के श्वेत वर्ण से बड़ी ईर्ष्या  उत्पन्न हो गई ।उनहोंने माता यशोदा से कोई सरल सा उपाय पूछा कि- किस प्रकार मैं प्यारी राधा को अपने रंग में रंग लूँ ? माता यशोदा ने मजाक में कह दिया - जा तू राधा को अपने शरीर जैसा रंग लगा दे ।माता की आज्ञा पालन करते हुए श्रीकृष्ण ने राधा को अपने जैसा रंग लगा दिया।तब से आपसी प्रेम और सद्भावना के प्रतीक के रूप में  इस विशेष दिवस को रंग लगाने की प्रथा प्रचलन में आ गई।रंग में विभिन्न प्रकार के रंगों के रंग एवं गुलाल प्रयुक्त करने का उद्वेश्य लोगों में  एकरूपता एवं समरसता लाना ही है।मानव को हर रंगों में रंग जाने अर्थात् हर परिस्थितियों को हँसते-हँसते स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना है।
भारत की पौरानिक संस्कृति के परिचायक -
यह त्योहार भारतीय संस्कृति के परिचायक के रूप में भारत देश के सम्पूर्ण हिस्से में मनाया जाता है।इस दिन सभी लोग अपने गिले-शिकवे,वैर-भाव,मनमुटाव-नाराजगी,कपट-कटुताओं को भूलकर तथा उसे दूर करने के उद्वेश्य से मित्रों एवं परिजनों के घर जाकर उनके गले मिलते हैं और मन से उनको दूर कर आपसी भाईचारा,प्यार तथा मेल- मिलाप बढ़ाते हैं।आज के दिन लोग सामाजिक भेद-भाव को निराकरण कर परस्पर प्रेम भाव संभाव स्थापित करते हैं।यह पर्व होलिका दहन के दूसरे दिन अर्थात् चैत्र मास के कृष्ण प्रतिपदा यानी साल के प्रथम दिवस को मनाया जाता है।इसी दिन से हमारा नववर्ष प्रारम्भ होता है।
आज के आधुनिक युग में त्योहारों का महत्व घटता जा रहा है।अब अधिकांश जगहों में खाना पूर्ति के लिए लोग पर्व मनातेे हैं।पहले मिट्टी से भी होली खोलने की प्रथा थी।अपनी धरती की सोंधी मिट्टी का तिलक लगाने में लोग गर्व अनुभव करते थे।बच्चों के लिए इस दिन का विशेष महत्व था त्योहारों में छुट्टियाँ होती थी।बाजार से तरह -तरह की पिचकारियाँ और गुब्बारे लाकर अपने मित्रों के साथ होली खोलने का आनंद उठाते थे।एक दूसरे के घर जाकर पकवान और मिठाईयाँ खाते थे।आजकल लोग बाजार से बनी मिठाईयाँ और फलों से ही काम चलाते हैं।किसी के घर जाने की अपेक्षा अपने ही घर में टी०वी० पर कार्यक्रम देखने में मशगूल रहते हैं।लोग आकर घर न गंदी कर दें। रंग अबीर न लगा दें इसलिए दरवाजे बंद ही रखते हैं।अगर कोई परिवार रिस्तेदार आ भी गया तो उसका स्वागत रूखे ढंग से ही करते हैं।
अब निजि कंपनियों ने नौकरी करने वाले लोगों अवकाश नहीं मिलता । नौकरी पेशा लोग परिवार से दूर रहते हैं और वे परिवार के पास जा नहीं पाते ।एकाकीपन के कारण से भी लोग त्योहारों के प्रति उदासिन हो गये हैं।
पहले लोग प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते थे।
जैसे पीले रंग के लिए हल्दी,पलास के फूलों को निचोड़कर लाल रंग ,चुकंदर को पीसकर गुलाबी रंग तथा सेम तथा पालक की पत्तियों को पीसकर हरा रंग बनाते थे जो किसी भी हाल में नुकसानदेह नहीं होता था।अबीर भी असली तथा सुगंधित होता था। परंतु आज की भाग - दौड़ वाली व्यस्ततम जीवन शैली ने बाजार से नकली रंग- अबीर लेने पर लोगों को मजबूर कर दिया है । रंग में मिले हानिकारक रासायनिक तत्व त्वचा को प्रभावित करता है।वैसे भी लोगों को रंग लगाने का सही तरीका नहीं पता होता है।त्वचा पर जोर से रंग गुलाल रगड़ते हुए लगाते है जिससे त्वचा या तो छिल जाती है या फिर जलन उत्पन्न करती है।इसलिए रंग-गुलाल लगाते समय भी मन में परस्पर कोमल भाव रखना चाहिए।लगाने वाले भी सावधानी पूर्वक लगाएँ और लगाने वाले भी बिना खुशी-खुशी  शांतिपूर्वक लगवा लें।वर्ष भर में एक ही दिन तो इतना सुंदर और सुनहरा अवसर प्राप्त होता है।जब हम दोस्तों रिस्तेदारों के समीप होते हैं।
           सुजाता प्रिय

2 comments:

  1. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में शुक्रवार 14 फरवरी 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. मेरी रचना को पाँच लिकों के आनंद पर साझा करने के लिए सादर धन्यबाद एवं हार्दिक आभार।

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