Friday, May 10, 2019

फर्ज का कर्ज (कहानी)

परमेश्वर को लगभग तीन घंटे बाद होश आई।अपनी बूढ़ी आँखों को चारो ओर घूमाते हुए अंदाज लगाया,अवश्य ही वह किसी अच्छे अस्पताल में पड़ा है। अपनी यादास्त पर जोर डाली।उसे यादआई,वह अपनी पत्नी के साथ फल बेचकर वापस घर जा रहा था,तभी किसी वाहन की चपेट में आ गया था।
उसे होश में आया देख उसकी घरवाली ने डॉक्टर को इतला किया।
डॉक्टर ने उसे आराम करने की सलाह दी।
वह चुपचाप वहीं पड़ा रहा । लेकिन ,उसकी आँखों में कुछ प्रश्नचिह्न उभर रहे थे जिसे  पढ़ते हुए उसकी घरवाली ने बताया_ जब तुम घायलावस्था में सड़क पर पड़े थे तो तुम्हें देखने के लिए वहाँ खाशी भीड़ इकट्ठी हो गई थी।उस भीड़ में शामिल एक महान महिला ने मुझ बेसहारा को सहारा दिया।उसने तुम्हें अपनी कार से यहाँ लाकर  इलाज किया ।वह इसी अस्पताल में डॉक्टर है।
बहुत महान महिला है वह ।वरना आजकल उपकार करने वाले लोग कहाँ मिलते हैं।हम गरीबों के लिए तो मशीहा बनकर ही आई।नहीं तो हमारी औकात कहाँ थी,इतने बड़े अस्पताल में.........
पत्नी की बात अधूरी ही रह गई।एक महिला ने वार्ड में प्रवेश किया और सीधी उसी की ओर बढ़ने लगी। उसकी घरवाली ने धीरे- से कहा_ यही है वह महान महिला।शायद तुम्हें होश में आया जानकर ही आ रही है।
कैसी है अब तुम्हारी तबियत बाबा ? उसने परमेश्वर के पास आकर हौले से पूछा।
म- म- मैं तो ठीक हूँ बेटी।लेकिन तुम्हें मेरे लिए कितना कष्ट उठाना पड़ा ?
कष्ट कैसी बाबा।आप बूढ़े होकर मेरे काम कर सकते हैं,तो क्या आपकी सेवा करना मेरा फर्ज नहीं ?
परमेश्वर को उसकी आवाज कुछ जानी- पहचानी सी लगी ।उसने नजरें घुमाकर उसे देखा। उसके मानस पटल पर एक वर्ष पूर्व की कुछ मीठी यादें चलचित्र की भाँति  आने लगी_ _ _ _ _ _ _ _ _ _  वह आम बेच रहा है।एक महिला ने आम के दाम पूछा और पाँच किलो आम तौलबाया।
  ले लो मालकिन इसे भी।परमेश्वर ने अपने थोड़े- से बचे आमों की ओर इशारा करते हुए कहा।
कितने होंगे ये ?
यही कोई तीन ,चार किलो होगें। अब धूप में बैठने का मन नहीं कर रहा।
महिला ने दया भाव से उसे देखा और कहा_
लेकिन मैं इतना वजन उठाकर चल नहीं पाऊँगी।वैसे ही गाड़ी खराब है और रिक्शा नहीं मिला तो पैदल जा रही हूँ ।
कहाँ पर है आपका घर ?
यहाँ से सीधे जाकर जहाँ बाईं ओर सड़क मुड़ती है न वहीं पर।
तो आप ले लिजिए ।इसे मैं आपके घर पहुँचा दूँगा।
यह तो बहुत अच्छी बात है ।
चलिए मैं आपको चाय पिलाऊँगी।
चाय पिलाएँगी आप मुझे ? तब तो मैं नहीं पहुँचाता आपके आम।परमेश्वर ने बच्चों की तरह ठुनकते हुए कहा।
क़्यों महिला ने हैरानी से पूछा ।
कयोंकि यह लालच हो जाएगी।
इसमें लालच की क्या बात है बाबा।आप बूढ़े होकर मेरी मदद कर सकते हैं , तो क्या मैं बेटी बनकर आप की  सेवा नहीं कर सकती ।
महिला के भावनात्मक स्वर सुन आस- पास के लोग उसे प्रसंशात्मक दृष्टि से देखने लगे।
लेकिन परमेश्वर ने कहा- नहीं बेटी तब यह सेवा न होकर सौदा हो जाएगा।फिर परमेश्वर ने बाकी  बचे आमों को बिना तौले ही महिला के थैले में रख दिए।
महिला ने अंदाज लगाया बचे आम भी पाँच किलो से कम नहीं थे।पर जब उसने पैसे दिए तो परमेश्वर ने नौ किलो आम के ही दाम काटे।फिर महिला के साथ आम पहुँचाने उसके घर चल दिया।
घर पहुँचकर महिला ने फिर एक बार उससे चाय पीने के लिए आग्रह किया।किन्तु परमेश्वर उपकार को ब्यापार में नहीं बदलना चाहता था। उसने चाय पीने से सख्त मना कर दिया।
लेकिन उसे उस दिन क्या पता था_ उपकार करना यदि वह अपना फर्ज समझता था तो उस महिला ने भी उसके उस फर्ज को वर्ष भर अपने पास कर्ज के रूप में रखकर डॉक्टर के रूप में उसकी सेवा कर अपना कर्ज उतार देगी।
बाबा अब आप आराम करें।उसे विचारोतल्लिन देख फिर महिला ने उसे टोका।
परमेश्वर ने एक बार फिर उस महान महिला डॉक्टर के चेहरे पर एक मीठी- सी निगाह डाली और धीरे-से अपनी पलकें मूंद ली।
             सुजाता प्रिय

2 comments:

  1. उव्वाहहहह..
    बेहतरीन कहानी..
    अनुकरणीय...
    सादर..

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    1. जी भाई साहब नमस्कार ।बहुत बहुत धन्यबाद कहानी को बारिकी से बढ़ने एवं भावों के समझने के लिए ।साभर।

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