Tuesday, August 20, 2024

अनपढ़ बुढ़िया कहानी

अनपढ़ बुढ़िया (कहानी)

बार-बार मोबाइल में कॉल करती और रिंग होते ही काट देती।उसे हिम्मत नहीं हो रहा था कि अनुपमा मैम से बात करे। ऑनलाइन क्लास में उनकी खनकती आवाज से ही लगता है कि वह किसी खास व्यक्तित्व की मल्लिका हैं।इस कॉलोनी में रहने आई तो उसे इस बात की खुशी हुई की उसकी मैम भी इसी कॉलोनी में रहती हैं ।कॉलेज में एडमिशन होते ही लॉकडाउन लग गया और ऑनलाइन क्लासेस स्टार्ट हो गए।उससे बड़ा मुश्किल लगता ऑनलाइन क्लास में कुछ समझ में आएगा कि नहीं ?
लेकिन नहीं क्यों ? मैं इतनी संजीदगी से क्लास लेती हैं ।बहुत ही बारीकी से हर चैप्टर को पढाती हैं।
लेकिन कुछ कैप्टरों को वह फिर से मैम से पढ़ना चाहती है।इसलिए जब मॉर्निंग वॉक पर निकली तो वापसी में ख्याल आया मैं से कॉल कर पूछ लूं, किस रोड में रहती हैं ।
वाह!मैम ने जो रोड बताया वह तो उसी रोड में चल रही है। उसने हाउस-नंबर पूछा और चल पड़ी। यह क्या यह तो वह अपने ही किराए के मकान के निकट पहुंच गई।
 मैम हाउस का कोई नाम भी है ?
 हांँ है ना , "अनमोल विला" उसने पढ़कर देखा उसे अपने आप पर बड़ी जुंझलाहट महसूस हुई। इस घर में इतने महीने से रह रही है और उसका नाम तक नहीं पढ़ सकी। 
मैम से फोन पर बात करती-करती वह घर के अंदर घुसी मैम ने कहा मैं लेफ्ट साइड के बरामदे में पिंक साड़ी पहने बैठी हूंँ। वह आगे बढ़ी । मैम यहाँ रहती है, और मैंने उन्हें कभी देखा तक नहीं ? 
वह लपकती हुई मैम के सामने पहुंच गई।
अरे ! यहांँ तो उसकी मकान मालकिन बैठी मिली ।
मुझे अनुपम मैम से मिलना है ।
हांँ हांँ मैं ही हूंँ अनुपमा ।
उसके सिर पर घड़ों पानी पड़ गया ।
जिनकी वेश-भूषा देख वह उन्हें अनपढ़ बुढ़िया कहती थी, वह उसकी तेज दरार अनुपमा मैम हैं। उसे सारी बातें याद आने लगी जब वह अनुपमा मैम को कुछ पूछे जाने पर उनसे ऐठ कर उत्तर देती थी कि आपको समझ नहीं आएगा। पढ़ाई के बारे में पूछे जाने पर वह बोलती कि हमारा ऑनलाइन क्लास होता है आप क्या जानें यह सब ।वह तो भली महिला थीं जो 
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, August 8, 2024

देश हमारा (लघुकथा)

देश हमारा (लघुकथा)

अंतरराष्ट्रीय खेल क्रिकेट मैच का अंतिम दिन था। पिछले दिन की पारी में भारत की बढ़त से भारत के नगरों-शहरों के लोग ही नहीं बल्कि छोटे- छोटे कस्बों और गांँवों के लोग भी अत्यंत उत्साहित थे।जीत की आस  प्रत्येक क्रिकेट-प्रेमी के दिल में लगाये थे।जहाँ जाओ वहाँ क्रिकेट की ही चर्चा छिड़ी होती।सभी मना रहे थे कि अपना देश 'भारत' जीत जाए।
तभी कहीं से कुछ शोर सुनाई पड़ी।उस शोर को सुन भरत उधर देखने लगा....
"जीतेगा भई जीतेगा !
देश हमारा जीतेगा !
भारत प्यारा जीतेगा !
क्रिकेट खेल का-
विश्वगुरु भारत जीतेगा !"
तरुण वर्ग के बच्चों का समुह नारे लगाते हुए वहाँ से चले जा रहे थे ।
    उन बच्चों को उत्साह उमंग और आत्मविश्वास देख मुहल्ले वासियों हृदय प्रफुल्लित हो गया।
वहाँ बैठी तरुणा चाची ने मुँह बनाते हुए कहा-"क्रिकेट खेल का उद्गम स्थल इंग्लैंड है, फिर भारत क्रिकेट खेल का गुरु कैसे बन गया ?"
जनक दादा ने कहा -"निसंदेह क्रिकेट खेल इंग्लैंड में प्रारंभ हुआ। और,यह खेल इंग्लैंड और श्रीलंका का राष्ट्रीय खेल भी है।परन्तु भारतीय खिलाड़ी अधिक कुशलतापूर्वक इस खेल को खेलते हैं। इन्हें इस खेल में जितनी महारथ प्राप्त है उतना किसी देश के खिलाड़ियों को नहीं।"
वहीं बैठे सोहन चाचा ने कहा -"सच पूछिए तो इस खेल का उद्गम स्थल भी भारत है।"
"वह कैसे?"
"भारत के पौराणिक खेलों में अत्यंत  रोमांचकारी और प्रभावी खेल गिल्ली डंडा और पिट्टो इत्यादि रहे हैं।ये खेल भी लगभग क्रिकेट जैसा ही खेला जाता है। भारतीय खिलाड़ी इन खेलों के माध्यम से उच्च कोटि के गेंदबाज व बल्लेबाज हो जाते हैं ।इसलिए भारत निरंतर क्रिकेट मैच में न केवल जीत ही हासिल करते हैं,बल्कि क्रिकेट खेल में विश्व 'चैम्पियन' भी कहलाते हैं ।"
   "जीत गया जी जीत गया!
  विश्व गुरु भारत जीत गया S S S
सामने वाले घर में टेलीविजन पर मैच देख रहे क्रिकेट खेल के दीवाने जोर से ताली बजा कर चीख पड़े और पटाखे की आवाज से पूरा देश..
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, August 6, 2024

जटाधारी शिव (विजया घनाक्षरी)

जटाधारी शिव ( विजया घनाक्षरी )

सदाशिव विश्वेश्वर, 
   महाकाल महेश्वर, 
      पशुपति पंचवक्त्र,
         जटाधारी शिव शिव ।

नील लोहित शंकर,
   विश्वपाक्ष शुभंकर,
      शिवाप्रिय गंगाधर,
         त्रिपुरारी शिव शिव।

वीरभद्र वामदेव,
   शूलपाणि महादेव,
     ललाटाक्ष महाकाल, 
        दानी भारी शिव-शिव।

गिरिधन्वा,अनीश्वर,
    गिरिप्रिय गिरीश्वर,
      जगद्गुरु कृपानीधि,
         दुःख-हारी शिव शिव। 

 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, July 26, 2024

सफलता का मंत्र

सफलता का मंत्र 

निज प्रगति मेंआप ही,होते बाधक लोग।
आलस्य इसका कारण है,कहते हैं संयोग।।

असफल होकर कोसते, व्यर्थ भाग्य को आप।
काम सदा जो टालते,रखते उर संताप।।

कभी नहीं जो मानते, गुरुजनों की बात।
पछताते जीवन भर, कुढ़ते हैं दिन रात।।

शेखी जो बघारते, मात-पिता के संग।
काहिल रहते हैं सदा,सीख न पाते ढंग।।

सक्रियता से जीवन में, करते हैं जो काम।
कर्मठता से काम कर,पाते सभी मुकाम।।

कल पर काम न टालिए, तुरंत करें सब काम।
महामंत्र है जीव की, मिलता सुख आराम।।

प्रतिस्पर्धा सबसे करें, लेकर मन में होड़।
मिले सफलता आपको , जीवन हो बेजोड़।।

          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

मुहावरा आधारित (आस्तीन का साँप )


 
 विश्वासघात

सोच समझ कर करो मित्रता,
सोच समझ कर आस करो।
आस्तीन में साँप न पालो,
सोच समझ विश्वास करो।

सामने से भोले बनते जो,
पीठ-पीछे कुछ खेल रहे।
आगे में माया खूब दिखाते,
पीछे जाकर धकेल रहे ।

सांत्वना वे बहुत हैं देते,
चौड़ी करते वे छाती हैं।
रंग बदलते गिरगिट जैसे,
जब बारी कुछ आती है।
   
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, July 25, 2024

शिव शंकर ने डमरू बजाया (गीत)

शिव-शंकर ने डमरू बजाया

शिव शंकर ने डमरू बजाया,
डम-डम,डम-डम,डम-डम-डम।
डमरू के संग ताल मिलाकर,
नाचे कहकर बम - बम - बम।
शिव शंकर.....................
डमरू की आवाज सुनी तो,
पार्वती माँ दौड़ी आईं।
डमरू के संग ताल मिलाकर,
वो भी नाचीं छम - छम - छम।
शिव शंकर.......................
डमरू की आवाज सुने तो,
गणपति बप्पा दौड़े आये।
डमरू के संग ताल मिलाकर,
वे भी नाचे धम - धम - धम।
शिव शंकर.....................
डमरू की आवाज सुने तो,
कार्तिक प्यारे दौड़े आये।
डमरू के संग ताल मिलाकर,
वे भी नाचे ढम - ढम - ढम।
शिव शंकर...................
डमरू की आवाज सुने तो,
भक्त जन सब दौड़े आये।
डमरू के संग ताल मिलाकर,
वे भी नाचे झम - झम - झम।
शिव शंकर.......................
नाच देख शिव शंकर दानी,
प्रसन्न हो मन में मुस्काते,
भक्तों के सब संकट हर लिए,
हर लिए उनके सारे ग़म।
शिव शंकर.....................
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि' 


Monday, July 22, 2024

पहला सोमवार

पहला सोमवार 

शिव के मंदिर में भक्त हजार हैं,
पहला सोमवार है जी पहला सोमवार है।
सभी मिलकर करते जयकार हैं,
पहला सोमवार है जी पहला सोमवार है।
औढरदानी शिव हैं,सभी को वर देते हैं।
भक्तों के दुखड़े,सुन हर लेते हैं।
शिवजी को भक्तों से,सुनो बड़ा प्यार है।
पहला सोमवार है जी पहला सोमवार है।
         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'