Friday, October 7, 2022

मैं तुम्हारी राज हूँ

मैं तुम्हारी राज हूँ

तुम मेरे सरताज हो और, मैं तुम्हारी राज हूँ।
तुम ही मेरे हमसफर हो, मैं तेरी हमराज हूँ।

तुम बसे मन में मेरे,कैसे यह बतलाऊँ मैं,
तुम दिल की धड़कनें,जिसकी मैं आवाज हूँ।

मन है करता तेरे संग,आसमां में उड़ चलूँ,
तुम जहां तक पर फैलाओ, मैं वहीं अंदाज हूँ।

तुम अगर हो साथ तो,डर नहीं मुझको कोई,
तुम मेरे रखवाले हो और,मैं तुम्हारी लाज हूँ।

सज रही महफ़िल यहांँ,गायकी के वास्ते,
तुम मेरी संगीत बन जा, मैं तुम्हारी साज हूँ।

हो रहा है गान अब, हम भी मिलकर गाएँंगे,
आ तू मेरी गीत बन जा, मैं तेरी आवाज़ हूंँ।

देखो अब सारे जहां में, प्यार का सम्राज्य है,
तुम यहांँ सम्राट बन जा, मैं तुम्हारी ताज हूंँ।

खुशनुमा लगता जहां है,जब तुम्हारा साथ हो,

एक -दूजे के लिए हम, ज़हान से टकरायेंगे,
तुम पे है अभिमान मुझको, मैं तुम्हारी नाज हूँ।

हम नहीं बिछड़े कभी,मन में ऐसी कामना,
संग मेरे हर कल रहोगे,संग तुम्हारे आज हूँ।

              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                 रांची, झारखण्ड

Thursday, October 6, 2022

जय माँ सिद्धिदात्री

जय मां सिद्धिदात्री

जय माता सिद्धिदात्री,आई  तेरे द्वार।
उड़हुल फूलों की बना,लाई हूँं मैं हार।।

मुझको माँ वरदायिनी,दे दो अपना प्यार।
बच्चों को तो चाहिए,माँ का प्यार- दुलार।।

मुझको माता अम्बिके,सिद्धि कर दे प्रदान।
दुष्ट ना आए पास माँ, दो निर्भय का दान।।

शुद्ध रहे अंतःकरण,सुंदर रहे विचार।
मन से हर दुर्भावना ,हर लो सभी विकार।।

हाथ जोड़ हे भगवती,करती हूँ प्रणाम।
पूर्ण कर मनोकामना,पूर्ण करो सब काम।

सब लोग का पाप हरो,कर दे माँ उपकार।
हम भलाई करें सदा,सुखी रहे संसार।

पापी दुराचारी के,हर लो सारे पाप।
सुख और समृद्धि रहे,आये ना संताप।।

      सुजाता प्रिय समृद्धि

Wednesday, October 5, 2022

निर्बल का बल


अत्याचार का अंत

दशहरे का समय था।श्रद्धालु गन माता की पूजा-पाठ में व्यस्त थे। दुर्गा मंडप में दुर्गा पाठ हो रहा था। फल-फूल ,माला तथा धूप- दीप से माता रानी का दिव्य मंडप आच्छादित था।कोई भी मनुष्य अनायास कलश तक जा कर पूजा-पाठ में बिघ्न ना डाले, इसके लिए मांँ की प्रतिमा के आगे बाँस का घेरा बना दिया गया था। फिर भी कुछ प्राणी ऐसे थे जिन्हें किसी प्रकार से रोका नहीं जा सकता था ।जैसे -चूहे,चीटियाँ आदि।वे जब चाहे पूजन सामग्री को गिरा देते, तोड़ देते,खा लेते तथा उठाकर ले जाते। प्रसाद चढ़ा नहीं कि चींटियों के दल ने हमलावरों की तरह आ घेरा। चूहों को फल उठाकर भागने की हड़बड़ी रहती। बताशे-मिश्री चींटियों को ज्यादा पसंद आती।कलश पर डाले गये अक्षत पर तो अपना एकाधिकार समझतीं। एक दिन की बात है चींटियों ने जब भर पेट भोजन कर लिया तो सोचा क्यों ना कुछ भोजन अपने घर भी ले जाऊंँ। लेकिन माता की पीढ़ी इतनी ऊँची थी कि चींटियों के लिए मुँह में वजन लेकर उतरना और अपने बिल तक ले जाना कठिन काम लग रहा था।अंतत: सभी चीटियों ने मिलकर विचार किया-क्यों ना हम चावल,मिश्री तथा बतासे के टुकड़ों को पहले पीढ़ी पर से नीचे गिरा दें फिर नीचे से उन्हें उठाकर बिल तक ले जाया जाएँ।यह सोंच चींटियों ने चावल को मुँह में पकड़कर नीचे गिराना शुरू किया। उनकी इस प्रक्रिया को एक चूहा बड़ी दिलचस्पी से देख रहा था।उसके मन में शरारत सुझी।उसने झट से चींटियों द्वारा गिराए गए चावल को उठाकर खा लिया। चूहे की इस हरकत से चीटियों को बहुत दुःख हुआ। लेकिन करे तो क्या ?बेचारी इस आस में चावल नीचे गिराती कि शायद चूहा चावल नहीं खाए।लेकिन चूहे को तो बहुत मजा आ रहा था ।आए दिन चूहा चीटियों को इसी प्रकार तंग करने लगा। बिचारी चींटियांँ भी कब तक सहन करतीं ? उसके अत्याचारों से परेशान होकर सभी चींटियों ने ले यह निर्णय लिया कि उस चूहे को सबक सिखाया जाए ।लेकिन अपनी तुलना उस भारी-भरकम शरीर वाले चूहे से कर घबरा उठीं। फिर भी अपनी रक्षा और न्याय लिए उन्हें कुछ तो करना ही ‌था।एक दिन कुछ विचार कर उन्होंने मंडप के नीचे चावल नहीं गिराया ।बस प्रसाद में चढ़ने बतासे और मिश्रियाँ खाती रहीं। चूहे ने जब देखा कि मंडप के नीचे चावल नहीं गिरा हुआ है तो उसके मन में जिज्ञासा जागी कि क्या चींटियांँ किसी दूसरे रास्ते से अपना भोजन ले जा रही हैं ? यह सोच वह मंडप पर चढ़ आया। उसने देखा कि माता की प्रतिमा के सामने चढ़ाये गये प्रसाद को चीटियाँं आराम से खा रही हैं। उसके मन में शरारत नाच उठा। उसने सोचा मैं इतना बड़ा हूंँ। आखिर ये छोटी चीटियांँ मेरा क्या बिगाड़ सकतीं हैं ? यह सोच उसने झट चींटियों द्वारा खाये जा रहे बतासों को उठा लिया।फिर क्या था। चींटियांँ तो इसी ताक में थीं ही।उन्होंने एक साथ चूहे पर हमला कर दिया।उसके भारी-भरकम शरीर पर चढ़कर उसे काटना शुरू किया।चूहा दर्द से छटपटाने लगा । गुस्से में चींटियों ने उसे इतना काटा कि उसके प्राण पखेरू उड़ गये। पूजा कर रहे पुरोहित जी  ने चूहे द्वारा चींटियों को परेशान करने और चींटियों द्वारा अपने अधिकारों और न्याय के लिए लड़ते देख माता के भक्तों से कहा जो कोई भी दुष्ट प्राणी माता के सामने उसके प्यारे जीवों को कष्ट देता है तो माता रानी अपने भक्तों को अत्याचारियों से लड़ने के लिए इसी प्रकार शक्ति प्रदान करती हैं।
माता रानी की जय🙏🙏🙏🙏🙏

दशहरा (मनहरण घनाक्षरी )



दशहरा (मनहरण घनाक्षरी )

बुरा पर अच्छाई की।
     झूठ पर सच्चाई की।
          हार पर विजय की।
                जीत है दशहरा।

दुर्गुण पर गुण की।
      अधर्म पर धर्म की।
         अज्ञान पर ज्ञान की।
                जीत है दशहरा।

घृणा पर सप्रेम की।
      विषम पर सम की।
        दुख पर समृद्धि की।
                जीत है दशहरा।

पापियों पर पुण्य की।
      छलावे पर क्षमा की।
        क्रोधियों पर शांति की।
                   जीत है दशहरा।

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, October 3, 2022

महागौरी (मगही भाषा)



महागौरी (मगही भाषा)

महागौरी अइली अँगना वर देबे।
वर देबे मैया वर देबे।
महागौरी अइली......

चरण पकड़ियो तोहर मैया सबके आस पुरैहा।
भूल-चूक हमनी के मैया मन से तू बिसरैहा।
सबके दुखबा अइली मैया हर लेबे।
महागौरी अइली अँगना......

शुभ-सौभाग तू दिहा मैया धरती के जन -जन के।
सुख-संपत्ति दिहा मैया आस पुरैहा मन के।
हमनी के अचरबा में आशीष मैया भर देबे।
महागौरी अइली अँगना...........

निरमल मन से मांगियो मैया,तोहरा से सुबुद्धि।
तनी ने मन में आबे दिहा, दुर्गुण औ दुरबुद्धि।
दुरभावना नै मनमा में हमर घर लेबे।
गौरी मैया अइली.............
     सुजाता प्रिय समृद्धि

Sunday, October 2, 2022

सप्तम माँ कालरात्रि



जय मां कालरात्रि

सप्तम रूप शोभिता,शुभ भाव धारिणी।
जयंती जयप्रदा तथा मां कालरूपिनी।।

कालिके,काली कालरात्रि,काल कपालिनी ।
कालिका कपालिके रकतपुष्प मालिनी।।

दुष्ट दलनकारिनी सदा ही सिंहवाहिनी।
भयं रूप भयंकरी भूतादि भयहारिणी।।

महा स्वरुप महाप्रदा गृहे-गृहे निवासिनी।
ददाति दानरूपिनी दारिद्र- दुखहारिनी।।

तंत्र-मंत्र से समस्त प्राणियों को तारिनी।
महारुपेण महाज्वला नमामि विंध्यवासिनी।।

आद्याशक्ति महाशक्ति मूलप्रकृति विश्वजननी।
त्रिगुणात्मिका ब्रह्मस्वरूप नित्य सनातिनी।।

सर्वस्वरूपा,सर्वेश्वरी,सत्य परमतेजस्वरूपिनी।
सर्वपूज्या सर्वमंगलकारी सर्वमंगल दायिनी ।।

विनय विवेक ले सदा हो कपालधारिनी।
भूत-प्रेत मिले कभी लगे उसे डरावनी।।

सर्वाबाधा विनाशिनी सर्वा,सर्वास्त्रधारिनी।
सर्वतेजोमयी माते समस्त कार्य कारिनी।।

खड़ाखड़ाती खड्ग ले खड़ी खप्पर धारिनी।
तंत्र- मंत्र धारिनी, सर्वत्र सिद्धि कारिणी।।



              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, October 1, 2022

षष्ठम देवी कात्यायनी

कात्यायनी माता(-सायली छंद)

       भक्तों 
     जनों की 
जयकार गूंँज रही 
  कात्यायनी माँ
        आईं ।

       माता 
     के मंदिर 
में देखो  कितनी 
    है खुशियांँ 
        छाईं ।

     जग 
  में विचरण 
करती हैं माता 
  होकर सिंह 
     सवार।

   चंद्रहास 
  धारण कर 
आईं हैं देखो
  हाथ लेकर 
    तलवार।

    अपने 
  सेवक को 
देती हैं माता
  बल-बुद्धि 
     ज्ञान।

    अपने 
भक्तजनों को 
माता सदा ही 
   करती  हैं 
    कल्याण।

      जो 
  जन निर्बल 
निर्धन हैं उन्हें 
  बनाती हैं 
   धनवान।

      करती
     हैं अभय 
हम सबको देकर 
    दीर्घायु का
      वरदान।

     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'