Monday, September 19, 2022

पितरों का आशीष

पितरों का आशीष (मनहरण घनाक्षरी )

पितृपक्ष चल रहा,
    दिन-दिन टल रहा,
       समय निकल रहा, 
          तर्पण तो कीजिए।

कीजिए आप तर्पण,
    पितरों को दे अर्पण,
       फल-फूल समर्पण,
           प्रसन्न हो कीजिए।

तृप्त हो पितृलोक,
    मिटाते हैं रोग-शोक,
       बढ़ा जीवन आलोक,
           श्रद्धा भाव दीजिए।

होकर अति प्रसन्न,
    पितर मन-ही-मन,
        देते अन्न-धन-जन,
          आशीष तो लीजिए।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, September 18, 2022

हिन्दी कविता (सायली छंद )

हिन्दी कविता ( सायली छंद )

     हिन्दी              हिन्दी
की कविताएंँ       कविता में 
बहुत सरल है    मधूरता का है 
समझना भी       अद्भुत रस
   आसान              शृंगार 

     सरल              ‌     इसी 
    रूप   के             कारण से
कारण ही इसको   कविता प्रेमी हैं 
   मिलता है           करते इससे 
    सम्मान ।              प्यार।

        हर                 हिन्दी
   कविता के          की कविता
अलग-अलग हैं   सम्पूर्ण जगत में 
    सदा होते         रखती अपनी
       रूप।                 शान।

        छंदों                हिन्दी 
     में चौपाई          की कविता 
दोहे-सोरठा-रोला  साहित्य क्षेत्र में 
    इसके रूप           रखती है 
       अनूप।             पहचान।

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, September 16, 2022

पाती ढाई आखर की

पाती ढाई आखर की

ढाई आखर की पाती लिखकर,
            भेजूँ तुझको ओ हरजाई।
लिख निर्मोही कब आओगे,
           समझ न पाते प्रीत पराई।

इस ढाई आखर में छिपे हैं,
          जाने कितने कोमल भाव।
तेरे मन में मोल न इसका,
          भूल गए तुम खाकर ताव।
व्याकुल मन ये तड़प रहा है,      
              डस रही है यह तन्हाई।
लिख निर्मोही कब आओगे,
           समझ न पाते प्रीत पराई।

बहुत पढ़ें तुम पोथी-पुस्तक,
              पढ़ें ना ढाई आखर को।
गागर का तुम मोल न जाने,
                 ढूंढ रहे हो सागर को।
निज विरह में तड़पाते हो,
          तूने यह कैसी प्रीत लगाई।
लिख निर्मोही कब आओगे,
           समझ न पाते प्रीत पराई।

ढाई आखर में समाया,
           प्रेम,प्रीत और प्यार सुनो।
ढाई आखर में समाया,
             जीवों का व्यवहार सुनो।
देख हुआ व्याकुल मन मेरा,
     चंचल चितवन ने ली अंगड़ाई।
लिख निर्मोही कब आओगे,
           समझ न पाते प्रीत पराई।

          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आशा का दीप जलाए रखना

आशा का दीप जलाए रखना

मन में विश्वास जगाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।

माना तुझे असफलता मिली है।
जो तुम चाहे वो गुल ना खिली है।
मन का प्रसून खिलाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।

विफलता भी तो होती वरदान है।
सफलता की राह करती प्रदान है।
मन के कोने को सजाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।

आशा  जीवन का एक अंग है।
जीवन भर आशा चलती संग है।
हृदय में यह बात बसाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।

अंत समय तक आस न खोना।
शायद लिखा हो सफल होना।
अंत तक आस लगाए रखना।
आशा का दीप जलाए रखना।
             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Thursday, September 15, 2022

शिव दोहे



शिव ( दोहे )

शिव देवों के देव हैं, चरणों में प्रणाम।
हर-हर,शिव-शिव बोल ततू,जपते जाओ नाम।।

सबका ये संकट हरे,सब के पालनहार।
जग वालों पर हैं सदा, करते वे उपकार।।

मस्तक पर है चंद्रमा,जटा गंग की धार।
बाघम्बर ओढ़े वदन,गले सर्प की हार।।

एक हाथ त्रिशूल है, कमण्डल दूजे हाथ।
नत्मस्तक होकर सदा, भक्त झुकाते माथ।।

मंदिरों में विराजते, गौरी मांँ के संग।
सारा जग हैं घूमते,चढ़ बसहा के अंग।।

खाते सदा भांग चबा, लगाते हैं विभूत।
कार्तिक और गणपति हैं, दोनों इनके पूत।।

नंदी जिनके साथ हैं, भक्ति भाव के रूप।
मिले न ऐसा भक्त कभी,अनुपम रूप -अनूप।

शिव के कर में शोभता,सोने का त्रिशूल।
शिव शंकर संहारक हैं,यह मानव की भूल।

आपकी ज्योति पुंज से,जगमग है संसार।
ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं, महिमा  अपरम्पार।

इनके चरणों में सभी,सदा नवाओ माथ।
रहते अपने भक्त के,हर पल शंकर साथ।।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, September 14, 2022

हिन्दी (कृपाण घनाक्षरी)

हिन्दी (कृपाण घनाक्षरी )

हिन्दी हमारी शान है।
देश की पहचान है।
इसी से अभिमान है।
इसे मान बढ़ाइए।

हम हिन्दी में बोलते।
बोली में मिश्री घोलते।
हर भाषा से तोलते।
हिन्दी को अपनाइए।

सभी जनों को भाती है।
समझ जल्दी आती है।
नयी उमंग लाती है।
इसे मन बसाइए।

सब भाषा में प्यारी है।
लगती कैसी न्यारी है।
जैसे फूलों की क्यारी है।
बात तो मान जाइए।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, September 9, 2022

गुरु (दोहे)

गुरुजी देते हैं हमें, विद्या- बुद्धि व ज्ञान।
उनसे से हम  सीखते,साहित्य,व-विज्ञान।।

लक्ष्य-प्राप्ति के लिए, बतलाते हैं राह।
बिना गुरु के जीवन में, मिलता है ना थाह।।

अनगढ़ माटी शिष्य हैं, गुरु होते कुम्हार।
गढ़ते रख कर चाक पर,देत सुगढ़ आकार।।

पाते गुरु से ज्ञान हैं,मन में उच्च विचार।
गुरु ज्ञान के सागर हैं, करें ज्ञान विस्तार।।

गुरु अपने आदर्श से,देते सबको ज्ञान।
गुरु के गुणों को अपना,बनते लोग महान।।

शिक्षा की प्रसाद को पा,बन जाते गुणवान।
शिक्षक के गुण को अपना,बनते गुण की खान।।

गुरु ज्ञान की ज्योत जला, देते हमको ज्ञान।
प्रकाश देना ज्ञान का, शिक्षक की पहचान।।

चरण कमल में सिर नवा, गुरु को करें प्रणाम।
प्रथम देव गुरु आप हैं,मुख में जपते नाम।।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'