Sunday, June 12, 2022

बाल श्रमिक (सायली छंद )



                 अभी
                तो तुम
            छोटे बच्चे हो
              काम नहीं
                करना।

                  बड़े
              होकर तुम
           अपने जीवन के
               अंधेरे को
                 हरना।

                 पढ़ने
              लिखने की
            है उम्र तुम्हारी
               तुम बहुत
                 पढ़ना।

                 शिक्षा 
              पाकर तुम
            भी अच्छी राहें 
               जीवन की
                  गढ़ना।

                  मासूम
                बचपन की
               जिद के आगे
                मजदूरी मत
                 अपनाओ।

                    बेवस
                 मजबूर और
              असहाय नहीं तुम
                   खुद को
                     पाओ।

                      अभी 
                   सशक्त और
                 परिपक्व बहुत है
                   आगे तुमको
                       होना।

                        प्यारे
                   लेकिन आज
                  तुम्हारे हाथों में
                  चाहिए पुस्तक,
                      खिलौना।

                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, June 7, 2022

पंगत व्यवस्था या वफे सिस्टम


 
पंगत व्यवस्था या वफे सिस्टम

आधुनिकता की होड़ ने हमारी पौराणिक परम्पराओं को ध्वस्त कर दिया है।हम सभी अपनी प्राचीन रीति रिवाजों को त्यागकर पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति को अपनाते जा रहें हैं और उसी दुष्परंपराओं को अपनाने में गर्व महसूस करते हैं।
  हमारी प्राचीन सभ्यता सदा वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित था जो सदैव लाभकारी व्यवस्था था।पंगत में भोजन करने की व्यवस्था सर्वप्रथम आपसी भाईचारे एवं सहयोग को बढ़ावा देता था।घर में या भोज-स्थल में धरती पर ही सुंदर और साफ सुथरे आसन पर हमें आदर पूर्वक आगवानी कर बैठाया जाता था और पवित्र धातुओं के वर्तनों में प्रेम और श्रद्धा के साथ पूछ-पूछकर खिलाया जाता था। पवित्रता के ख्याल से ही फिर पत्रपात्र यानी पत्तल व्यवस्था था। भोजन परिवेशन से पूर्व जल दिया जाता था । जिससे लोग अपने हाथों को पवित्र करने के साथ-साथ वर्तनों को भी पवित्र  कर लें।
भोजन के प्रकारों को भी पहले बताकर और पूछ-पूछकर परोसा जाता था। भोजन के मध्य में भी पूछा जाता था और अंत में दही-मिष्ठान देकर भोजन समापन किया जाता था।भोजन के उपरांत भी लोग पंक्ति में बैठे लोगों के खाने का इंतजार करते थे और सभी के खाने के पश्चात एक साथ उठते थे।इस प्रकार सभी जनों में आपसी प्रेम-संभाव बना रहता था। पंगत व्यवस्था में भोजन करने से पाचन क्रिया सरल होती थी।
     लेकिन आजकल का फैशनेबल लंबे सिस्टम नें उन सभी मर्यादाओं को रौंदकर रख दिया है। भोजन के समय कोई किसी की परवाह नहीं करते।ना ही कोई किसी को भोजन ग्रहण करने का आग्रह करते हैं ना ही कोई किसी को बोलता पूछता है।सभी लोग खाने-पीने का सामान देख स्वयं ही भोजन करने टूट पड़ते हैं। ना ही बोलने की आवश्यकता ना ही पवित्रता का ध्यान किसी को रहता है। कितने लोग तो जूठे हाथों से ही भोजन सामग्री उठा लेते हैं। इस तरह से बहुत से कारणों से लंबे सिस्टम में  भोजन कराया जाना सही नहीं है।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, June 6, 2022

सूर्य (हाइकु )



सूर्य निकला 
प्रकाशित हो गया
जगत सारा।

देख दिशाएं
धरती अम्बर का
है उजियारा।

प्रेम करता
यह जग वालों से
साथ निभाता।

भेद ना करे
किसी भी प्राणियों से
प्रेम सिखाता।

किरणें फैली
चहुं दिशा में देखो
तम है हारा।

आसमान का
रंग निखरा देखो
सूर्य लाली से।

सूर्य-किरण
छनकर है आता
वृक्ष डाली से।

अग्नि के जैसा
सूरज है तपता
लू उगलता।

जल की बुंदे
सबके वदन से
यूं निकलता।

 सुजाता प्रिय समृद्धि

Sunday, June 5, 2022

आधुनिकता की होड़ में पर्यावरण की सुरक्षा कैसे करें

आधुनिकता की होड़ में पर्यावरण की सुरक्षा कैसे करें


यह सच है कि आज हमारा समाज आधुनिकता के दौर से गुजर रहा है।हम गाँव की अपेक्षा शहरों मे रहना अधिक पसंंद करते हैं।छोटे घरों की अपेक्षा आलिशानों में रहने में गर्व महसूस करते हैं।निकट स्थानों में भी वाहनों द्वारा ही जाना चाहते हैं।सच पूछें तोआधुनिकता के इस होड़ में हम प्रकृति का दोहन करने लगते हैं जिससे हमारा पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है ।
अब हमें सचेत होना होगा।पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए।हम आधुनिक बनकर भी पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं।
हमारी पहली कोशिश होनी चाहिए की भवन-निर्माण के समय अकारण पेड़ -पौधे को नष्ट न करें।अपने घरो में पेड़-पौधों के लिए भी थोड़ा स्थान रखें।गमलों में भी छोटे-छोटे पेड़-पौधे एवं फूल लगाकर हरियाली बढ़ायें।
  नदी तालाबों ,जलाशयों जंगल मैदानों का अतिक्रमण कर गृह निर्माण न करें।वल्कि उनकी साफ-सफाई तथा रख-रखाव की जिम्मेदारी व्यक्तिगत या सामुहिक रूप से लें।
निकट के हाट- बाजार,मंदिर,विद्यालय आदि स्थानों पर वाहन से न जाकर पैदल जाने की आदत डालें ।इस प्रकार हम स्वस्थ्य भी रहेंगे औरवाहनों से निकलने वाले धूएँ से हमारा वायु भी प्रदूषित होने से बचेगा।
हम अपने घरों को तो साफ-सुथरा   रख लेते हैं लेकिन घर के कूड़े-कचरे सड़कों तथा नदी-तालाबों में फैला देते हैं।इन आदतों में सुधार लाना होगा।
यूं कहें जल,जंगल और जमीन की सुरक्षा कर ही हम पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं।सच्चे अर्थों में पर्यावरण की सुरक्षा और संतुलन ही हमारी सच्ची आधुनिकता होगी।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Saturday, June 4, 2022

गज़ल


मुश्किल हुआ अब तो दिल का लगाना।
उनको न आता क्योंकि प्यार निभाना।

जब दिल में आता यादों का मौसम,
दिल की तड़प बन जाता है बहाना।

शुरू में  मैं उनकी दीवानी नहीं थी,
मगर वे थे मेरे दिलोजां से दिवाना।

अब तो तड़प कर जीना हुआ मुश्किल,
न चाहूँ अब दिल का यह हाल बताना।

करूँ क्या शिकायत जमाने से जाकर,
नहीं चाहती हूँ मैं जिसको बताना।

हमारी ये मुहब्बत नुमाइश नहीं है,
नहीं है जरुरी किसी को दिखाना।

लगता है के हमारी मुहब्बत यही है,
यही है हमारी मुहब्बत का ठिकाना।

             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, June 3, 2022

नशा करना अभी छोड़ो (मुक्तक )



नशे की लत नहीं अच्छी नशा करना अभी छोड़ो।
दिख जाए जो मयखाना,तो मुख उससे सभी मोड़ो।
कभी भूले से रुख अपना,नहीं करना उधर कोई-
अगर खाए थे भूले से तो तुम अपनी कसम तोड़ो।

मय के प्याले से अपना घट जीवन का ना फोड़ों।
नशे में चूर होकर तुम नहीं जीवन का संग छोड़ो।
नशे में मत मिटाओ तुम कभी अनमोल जीवन को-
नशे को छोड़ जीवन से नाता तुम अभी जोड़ों।
                 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, June 1, 2022

न नशा करो ,ना करने दो



न नशा करो,ना करने दो।
न बेमौत मरो,ना मरने दो।

नशा है ,नाश का घर,
रुलाती है जीवन भर।
सभी को कंगाल कर,
लेती धन-प्राण को हर।
धन-प्राण ना अब हरने दो।
न बेमौत मरो, ना मरने दो।

सदा यह रोग लाती,
दुःख देकर सताती।
जलाकर देह छाती,
जीवन भर है रुलाती।
अब जुल्म इसे ,ना करने दो।
न बेमौत मरो ,ना मरने दो।

मय से तू दूर रहकर,
थोड़ा मजबूर रहकर।
दिल की बेचैनी सहकर,
अलविदा इसकोक कहकर।
मन को आह,थोड़ी भरने दो।
न नशा करो ,ना करने दो।
            सुजाता प्रिय :समृद्धि'