Monday, January 25, 2021

बिटिया का संदेश



बैठी थी इक ठांव मैं अपने,
                       बिखरे पन्ने लेकर जीवन के।
लाख कोशिश कर भी मैं, 
                   सुलझा न पाई उलझन मन की।
जीवन पथ की बाधाओं को, 
                         कविताओं में बांध रही थी।
हकीकत में जो सध न पाया, 
                         कहानियों में साध रही थी।
असफलताओं से टूटे मन को,
                       निराशाओं से हताश मन को।
सांत्वना दें रही थी अपने, 
                        मुरझाए हुए  निराश मन को।
वहीं पर छोटी बिटिया मेरी, 
                         खिलौने लेकर खेल रही थी।
क्यारी में खिले गुलाब पर, 
                        नजरें अपनी वह फेर रही थी।
लक्ष्य बनायी फूल तोड़ना,
                       वह हाथ बढ़ाती वह बारम्बार।
पकड़ी उसने फूल की डाली,
                          मुंह से निकल पड़ी चित्कार।
कोमल कर में चुभ गये कांटे,
                        नयनों में उसके भर गये पानी।
होंठ फुलाकर बिलख उठी वह,
                            लेकिन उसने हार न मानी।
हाथ बढ़ाई पुनः एक बार वह,
                                आये कुछ पत्ते हाथ में।
सफलता की किरण मिलीउसे, 
                                कुछ आशा के साथ में।
एक बार फिर बढ़ चली, 
                       पुनःउठकर वह फूलों की ओर।
अपने नन्हे कदम बढ़ाकर, 
                          हाथ से  डाली पकड़ मरोड़।
बढ़ा दूसरा हाथ झट अपने, 
                             फूल को उसने तोड़ लिया।
असफलताओं को मार तमाचे,
                              जवाब उसे मुंहतोड़ दिया ‌।
इस तरह मुक भाषा में उसने, 
                             यह संदेशा हमको दे डाला।
बाधाओं से हरदम लड़ना, 
                                 पड़े क्यों ना विष-प्याला।
असफलता अगर मिले कभी तो,
                                   मन को न निराश करो।
सफलता संमुख होगी मेहनत से,
                                  मन में यह विश्वास धरो।
                        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                          स्वरचित, मौलिक

Saturday, January 23, 2021

भाग ले कोरोना



लॉक डाउन लगा हुआ है,
               हम बंद पड़े हैं घर में।
बोर हो रहे कमरे के अंदर,
                पड़े - पड़े बिस्तर में।
इस  रोग  की यही दवा है , 
                दूर  रहें  हम जन से।
मिलना-जुलना कुछ दिन छोड़ें, 
               मित्रों औ परिजन से।
जनता कर्फ्यु लगा था उस दिन,
                ऐसे ही उकताए थे ।
कैरम - लूडो खेल घर में,
          दिनभर समय बिताए थे।
शाम के पाँच बजते ही हम, 
                  खूब बजाए ताली।
दीदी- मुन्ना दोनों मिलकर , 
       .          बजा रहे थे थाली।
सब लोगों के हाथ में टुन-टुन , 
                  बज रही थी घंटी।
शंख नाद कर उठे जोर से, 
              छत पर अंकल-अंटी।
दादाजी ने बालकनी में, 
                 ढोलक खूब बजाई।
एकता का संदेश सभी ने, 
                     एकजूट हो गाई।
सभी घरों से ऐसी-ही ,
               झंकार सुनाई दी थी।
भाग-भाग तू ऐ कोरोना! 
              दुत्कार सुनाई दी थी।
संगठन में शक्ति बहुत है , 
           हमसब संगठित होकर।
सारे नियमों का पालन कर, 
            लड़ें आपदा से डटकर।
एक मत हो सारे मानव,
            कोरोना का नाश करेंगे।
इसे हराकर फिर से हमसब,
                  सुख से बास करेंगे।
कोरोना से युद्ध हमारा,
                तब-तक रहेगा जारी।
जब-तक इसके प्रकोप से ना,
                मुक्त हो दुनियाँ सारी।
कोरोना को दूर भगाने को,
                    सब हो जा तैयार।
सब हो जा तैयार साथियों!
                    सब हो जा तैयार।
                                सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Friday, January 22, 2021

जीओ भारत के वैज्ञानिक



जीओ देश के वैज्ञानिक ,
         भारत मां के सुपुत्र महान।
सबके संकट हरण किए तुम,
      बनकर कलियुग के हनुमान।

वन - पर्वत से खोज-ढूंढकर,
     आखिर संजीवनी ले ही आए।
ग्यारह महीने जांच-परखकर,
         कैविड 19 वैक्सीन बनाये।
कोरोना से रक्षा करने के लिए
           किया तूने पहला निर्माण।
जीओ देश के वैज्ञानिक,
          भारत मां के सुपुत्र महान।

फिर से नया इतिहास रचे तुम,
      समृद्ध भारत का मान बढ़ाये।
मेरा भारत अग्रणी सदा से,
         दुनिया को यह बात बताए।
आखिर वाजी तुमने ही मारी,
         तुमपर है हमको अभिमान।
जीओ देश के वैज्ञानिक,
          भारत मां के सुपुत्र महान।

कोरोना पर विजय पताका,
             तुमने ही पहले लहराये।
भारत मां के मानचित्र पर,
               बड़ी नाज से फहराये।
उपकार मानकर सारी दुनिया,
                 गाएगी तेरा गुणगान।
जीओ देश के वैज्ञानिक,
          भारत मां के सुपुत्र महान।  

         सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
           स्वरचित, मौलिक

Tuesday, January 19, 2021

बगल वाली सुंदरी


सुनो सुहानी, एक पुरानी, सुना रही हूं घटना।
मैं अपने दीदी जीजा संग , जा रही थी पटना।

जनरल बोगी मैं हम दीदी के पास जाकर बैठे।
सामने वाली सीट पर जीजाजी भी आकर बैठे।

जीजा बोले -
बगल सीट की सुंदर रुमाल दिखाकर।
देखना बैठेगी मेरे साथ कोई सुंदरी आकर।

थोड़ी देर में एक आदमी सीट पर बैठने आया।
जीजाजी की बगल अपनी कुतिया को बैठाया।

जीजाजी का चेहरा हमको लगा देखने लायक ‌।
जीजाजी के संग बैठी सुंदरी लगी बड़ी सुखदायक।
           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

Monday, January 18, 2021

चिंता और चिंतन



चिंतन कर ले कभी-कभी पर,चिंता कभी न करना।
चिंतन कर तुम सुन ऐ प्राणि, अंधकार मन के हरना।

चिंता करने से चित हो जाता पानी-पानी भाई।
चिंतन करने से पा सकते होे जीवन की गहराई।
चिंता करने से मानव जन सफल कहां होते हैं।
चिंता करके केवल अपना सर्वस्व सदा खोते हैं।
चिंतन,मंथन और मेहनत से, तुम कभी मत डरना।
चिंतन कर लें कभी-कभी पर चिंता कभी न करना

चिंता मानव के तन को है दीमक बनकर खाता।
चिंता करनेवाला जीवन में कंकाल बन रह जाता।
चिंता मारता नहीं है लेकिन,बेमौत सुला देता है।
चिंता चिता बन मानवजन का सत्व जला देता है।
चिंता करके तुम भी देखो, बेमौत कभी मत मरना।
चिंतन कर लें कभी-कभी पर, चिंता कभी न करना।

चिंता करने से नहीं हम हैं पा सकते मंजिल को।
चिंतन की पतवार पकड़ कर,छू सकते साहिल को।
चिंता से चतुराई घटती है, पर चिंतन से बढ़ती है।
चिंतन करने वाले को अपनी मंजिल भी मिलती है।
चिंतन करके तुम भी देखो, राह नयी नित  गढ़ना।
चिंतन कर लें कभी-कभी,पर चिंता कभी न करना।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
      स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, January 12, 2021

हमारी गीता सभी धार्मिक ग्रंथों की नींव है


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
आज से १२८ वर्ष पूर्व  १८९३ ई० में स्वामी विवेकानंद जी  विश्व धर्म सम्मेलन में अपने देश भारत के हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करने अमेरिका के शिकागो नामक शहर में पहुंचे तो जानबूझ कर उन्हें अपने धर्म के बारे में बोलने के लिए सबसे अंत में अवसर दिया गया। 
इस बात की परवाह नहीं करते हुए उन्होंने अपने भाषण के प्रारंभ में वहां की जनता को संबोधित करते हुए कहा -मेरे प्यारे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों! 
इस बात पर सभागार मिनटों तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजती रही। उनके द्वारा दिया गया यह भाषण पूरी दुनिया में ऐतिहासिक भाषण बन गया।भाषण के बाद अन्य धार्मिक  गुरुओं ने हिन्दू धर्म को नीचा दिखाते हुए विवेकानंद जी से अनेक प्रश्न करने लगे।
 उन्होंने पूछा - आपको अपनी संस्कृति और भाषा के बारे में क्या कहना है ?
विवेकानंद ने तपाक से जवाब दिया - मुझे क्या कहना ? सभी जानते हैं हमारी संस्कृति सभी संस्कृतियों का मस्तक है और हमारी भाषा संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। 
तो लोगों ने वहां एक के ऊपर एक रखी विश्व के सभी धार्मिक ग्रंथों (जिसे उन्होंने ही इस प्रकार से रखा था) को  इंगित करते हुए कहा- तो आपके द्वारा लाया गया यह धार्मिक ग्रंथ 'गीता' सभी ग्रंथों के नीचे क्यों रखा है।
विवेकानंद जी ने उत्तर देते हुए कहा - क्योंकि हमारा धार्मिक ग्रंथ 'गीता' सभी धार्मिक ग्रंथों की नींव है। 
उस धार्मिक गुरु ने स्वामी विवेकानंद जी का अपने देश की संस्कृति  साहित्य ,भाषा एवं धर्म के प्रति निष्ठा और समर्पण देख सम्मान से सिर झुका लिया।🙏

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित, मौलिक

Wednesday, January 6, 2021

मुखड़े पर मुखौटा



आगत युग में नारियों को,
         अपना रूप बदलना होगा।
अपने सुंदर मुखड़े पर हमें,
       अलग मुखौटा रखना होगा।

जगह-जगह पर गिद्ध खड़े हैं,
                 नयन उठाकर देखो।
नोच-खसोट खाने को आतुर,
             जिधर भी नजरें फेंको।
उनको मार भगाने हमको,
               तुरंत सम्हलना होगा।
अपने सुंदर मुखड़े पर हमें,
       अलग मुखौटा रखना होगा।

बहुत बनी हम शील अहिल्या, 
                  बनी द्रौपदी-सीता।
बहुत बनी सुंदर-सुकोमल,
                सुहृदया - सुपुनीता।
सती अनुसूया के पथ पर,
         अब हमको चलना होगा।
अपने सुंदर मुखड़े पर हमें,
     अलग मुखौटा रखना होगा।

उस मुखौटे पर दृढ़ता के,
             छलकाना होगा पानी।
रणचंडी बन रचनी होगी,
        वीरता की अलग कहानी।
अब मन से कोमलता तजकर,
                क्रूरता धरना होगा।
अपने सुंदर मुखड़े पर हमें,
      अलग मुखौटा रखना होगा।

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
        स्वरचित, मौलिक