छाया
कहाँ पाएँ हम थूप में छाया।
कैसे ठंढी हो अपनी काया।
पहले सड़कों पर हम चलते थे।
दस कदमों पर पेड़ मिलते थे।
चलने से थक जाते थे हम।
छाया में बैठ सुस्ताते थे हम।
पेड़ बने अब मील के पत्थर ।
छाया मिलेगी अब हमें किधर।
हम पेड़ों को काट रहे हैं।
दीमक बनकर चाट रहे हैं।
घर में भरे हुए हैं फर्नीचर।
घट रहे हैं पेड़ भूमि पर।
हमें नहीं पेड़- पौधों पर माया।
कौन देगा फिर हमको छाया।
एक-एक यदि हम पेड़ लगाते ।
शायद छाया का सुख पाते।
सुजाता प्रिय