Thursday, May 16, 2019

छाया

छाया

कहाँ  पाएँ  हम  थूप में  छाया।
कैसे  ठंढी   हो  अपनी  काया।
पहले सड़कों पर हम चलते थे।
दस  कदमों  पर पेड़ मिलते थे।
चलने  से  थक  जाते  थे   हम।
छाया  में बैठ  सुस्ताते  थे  हम।
पेड़  बने अब  मील के  पत्थर ।
छाया मिलेगी अब हमें  किधर।
हम   पेड़ों   को   काट   रहे  हैं।
दीमक   बनकर   चाट  रहे   हैं।
घर  में  भरे   हुए  हैं   फर्नीचर।
घट   रहे   हैं   पेड़   भूमि   पर।
हमें  नहीं पेड़- पौधों  पर माया।
कौन  देगा  फिर  हमको छाया।
एक-एक यदि हम  पेड़ लगाते ।
शायद  छाया  का  सुख  पाते।
               सुजाता प्रिय

Wednesday, May 15, 2019

अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस पर विशेष:

परिवार की परिभाषा
परिवार की परिभाषा आज,
बदलती  नजर  आ  रही है।
दो,चार लोगों की गिनतियों में,
सिमटती  नजर  आ  रही है।

हम  दो- हमारे दो को ही,
परिवार  माना  जाता  है।
अन्य सभी रिस्तों को अब,
बेकार  माना   जाता   है।

दादा- दादी,नाना- माना को,
पहचानते  तक  नहीं  बच्चे।
चाचा- बुआ,मामा-मौसी को,
जानते   तक   नहीं    बच्चे।

वैसे   तो  सभी   रिस्तेदार ,
अब सबको होते  नहीं  हैं।
जिनको  ईश्वर ने  है  दिया ,
वे रिस्ते अब ढोते  नहीं  हैं।

आधुनिकता व नगरीकरण ने,
सृजित किया  एकल परिवार।
कयोंकि  संयुक्त रूप से रहना,
आज लोगों को नहीं स्वीकार।
                  सुजाता प्रिय

Tuesday, May 14, 2019

मस्ती भरी छुट्टी

गर्मी  का मौसम, छुट्टी  का दिन ।
आओ नाचे तक धिना धिन धिन।
स्कूल  न जाना, मस्ती  है करना।
होमवर्क बनाना,घर में  है पढ़ना।
ठंढी  हवा   में  जाकर   टहलते।
नदी   किनारे  में खूब   उछलते।
तरबूज खीरा और ककड़ी खाते।
दही -छाछ -लस्सी, शरबत पीते।
शाम  को   करते  हैं   बागबानी।
सुबह  हम सींचते फूलों में पानी।
बगीचे में फैलाकर हम हरियाली ।
झूला  झूलते हैं  लगाकर  डाली।
मस्ती  और छुट्टी  का है  संयोग।
छुट्टी का करना है हमें सदुपयोग।
पर्यावरण  स्वचछ  बनाएँगे  हम।
मस्ती  से  छुट्टी  बिताएगें   हम।
नाचे  ताक  धिना- धिन  - धिन।
आहा - हा गिन -गिन कर -दिन ।
                     सुजाता प्रिय

Saturday, May 11, 2019

मातृ दिवस पर प्यारी माँ को समर्पित(कविता)

प्यारी माँ....

धन्य  हो  मेरी  प्यारी  माँ,
तूने  मुझको  जन्म  दिया।
हृदय लगाकर दूध पिलाया,
पाल- पोषकर बड़ा किया।
स्थान तुम्हारा सबसे ऊँचा,
जिसकी तू अधिकारी  माँ।

आँसू पोछी जब मैं रोई,
लोरी  गा  सुलाती   थी।
नींद मेरी  टूट  जाती तो,
रात- रात जग जाती थी।
मेरे संग तू  बनी  सहेली,
तेरी  सूरत   प्यारी   माँ।

हाथ  पकड़ नन्हें कदमों से,
चलना  तूने  हमें  सिखाया।
माया- ममता का पाठ पढ़ाया,
हँसना-गाना हमें  सिखाया।
तुझसे प्रेरित हो मंजिल पायी,
मैं  तुझपर  बलिहारी  माँ।

शिष्टाचार  सिखाया  तूने,
भला  बुरा का ग्यान दिया।
अक्षर-अक्षर पहचान कराया,
शिक्षा  का  वरदान   दिया।
बुनना- सिलना हमें सिखाया,
प्रथम  शिक्षिका प्यारी  माँ।

तेरे  चरणों में  सब तीरथ,
काशी,मथुरा और कैलाश।
मन  मंदिर  में  तेरी मूरत,
रहती है  तू दिल के पास।
प्रथम देवी तुम ही हो माते,
परम  पुज्या  न्यारी   माँ।
                      सुजाता प्रिय

Friday, May 10, 2019

फर्ज का कर्ज (कहानी)

परमेश्वर को लगभग तीन घंटे बाद होश आई।अपनी बूढ़ी आँखों को चारो ओर घूमाते हुए अंदाज लगाया,अवश्य ही वह किसी अच्छे अस्पताल में पड़ा है। अपनी यादास्त पर जोर डाली।उसे यादआई,वह अपनी पत्नी के साथ फल बेचकर वापस घर जा रहा था,तभी किसी वाहन की चपेट में आ गया था।
उसे होश में आया देख उसकी घरवाली ने डॉक्टर को इतला किया।
डॉक्टर ने उसे आराम करने की सलाह दी।
वह चुपचाप वहीं पड़ा रहा । लेकिन ,उसकी आँखों में कुछ प्रश्नचिह्न उभर रहे थे जिसे  पढ़ते हुए उसकी घरवाली ने बताया_ जब तुम घायलावस्था में सड़क पर पड़े थे तो तुम्हें देखने के लिए वहाँ खाशी भीड़ इकट्ठी हो गई थी।उस भीड़ में शामिल एक महान महिला ने मुझ बेसहारा को सहारा दिया।उसने तुम्हें अपनी कार से यहाँ लाकर  इलाज किया ।वह इसी अस्पताल में डॉक्टर है।
बहुत महान महिला है वह ।वरना आजकल उपकार करने वाले लोग कहाँ मिलते हैं।हम गरीबों के लिए तो मशीहा बनकर ही आई।नहीं तो हमारी औकात कहाँ थी,इतने बड़े अस्पताल में.........
पत्नी की बात अधूरी ही रह गई।एक महिला ने वार्ड में प्रवेश किया और सीधी उसी की ओर बढ़ने लगी। उसकी घरवाली ने धीरे- से कहा_ यही है वह महान महिला।शायद तुम्हें होश में आया जानकर ही आ रही है।
कैसी है अब तुम्हारी तबियत बाबा ? उसने परमेश्वर के पास आकर हौले से पूछा।
म- म- मैं तो ठीक हूँ बेटी।लेकिन तुम्हें मेरे लिए कितना कष्ट उठाना पड़ा ?
कष्ट कैसी बाबा।आप बूढ़े होकर मेरे काम कर सकते हैं,तो क्या आपकी सेवा करना मेरा फर्ज नहीं ?
परमेश्वर को उसकी आवाज कुछ जानी- पहचानी सी लगी ।उसने नजरें घुमाकर उसे देखा। उसके मानस पटल पर एक वर्ष पूर्व की कुछ मीठी यादें चलचित्र की भाँति  आने लगी_ _ _ _ _ _ _ _ _ _  वह आम बेच रहा है।एक महिला ने आम के दाम पूछा और पाँच किलो आम तौलबाया।
  ले लो मालकिन इसे भी।परमेश्वर ने अपने थोड़े- से बचे आमों की ओर इशारा करते हुए कहा।
कितने होंगे ये ?
यही कोई तीन ,चार किलो होगें। अब धूप में बैठने का मन नहीं कर रहा।
महिला ने दया भाव से उसे देखा और कहा_
लेकिन मैं इतना वजन उठाकर चल नहीं पाऊँगी।वैसे ही गाड़ी खराब है और रिक्शा नहीं मिला तो पैदल जा रही हूँ ।
कहाँ पर है आपका घर ?
यहाँ से सीधे जाकर जहाँ बाईं ओर सड़क मुड़ती है न वहीं पर।
तो आप ले लिजिए ।इसे मैं आपके घर पहुँचा दूँगा।
यह तो बहुत अच्छी बात है ।
चलिए मैं आपको चाय पिलाऊँगी।
चाय पिलाएँगी आप मुझे ? तब तो मैं नहीं पहुँचाता आपके आम।परमेश्वर ने बच्चों की तरह ठुनकते हुए कहा।
क़्यों महिला ने हैरानी से पूछा ।
कयोंकि यह लालच हो जाएगी।
इसमें लालच की क्या बात है बाबा।आप बूढ़े होकर मेरी मदद कर सकते हैं , तो क्या मैं बेटी बनकर आप की  सेवा नहीं कर सकती ।
महिला के भावनात्मक स्वर सुन आस- पास के लोग उसे प्रसंशात्मक दृष्टि से देखने लगे।
लेकिन परमेश्वर ने कहा- नहीं बेटी तब यह सेवा न होकर सौदा हो जाएगा।फिर परमेश्वर ने बाकी  बचे आमों को बिना तौले ही महिला के थैले में रख दिए।
महिला ने अंदाज लगाया बचे आम भी पाँच किलो से कम नहीं थे।पर जब उसने पैसे दिए तो परमेश्वर ने नौ किलो आम के ही दाम काटे।फिर महिला के साथ आम पहुँचाने उसके घर चल दिया।
घर पहुँचकर महिला ने फिर एक बार उससे चाय पीने के लिए आग्रह किया।किन्तु परमेश्वर उपकार को ब्यापार में नहीं बदलना चाहता था। उसने चाय पीने से सख्त मना कर दिया।
लेकिन उसे उस दिन क्या पता था_ उपकार करना यदि वह अपना फर्ज समझता था तो उस महिला ने भी उसके उस फर्ज को वर्ष भर अपने पास कर्ज के रूप में रखकर डॉक्टर के रूप में उसकी सेवा कर अपना कर्ज उतार देगी।
बाबा अब आप आराम करें।उसे विचारोतल्लिन देख फिर महिला ने उसे टोका।
परमेश्वर ने एक बार फिर उस महान महिला डॉक्टर के चेहरे पर एक मीठी- सी निगाह डाली और धीरे-से अपनी पलकें मूंद ली।
             सुजाता प्रिय

Wednesday, May 8, 2019

तरबूज


फुटबॉल जैसा गोल- गोल,
रंग इसका हरा- हरा।
गुदा इसका लाल-लाल,
मीठा- मीठा रस भरा।,
शीतलता से भरपूर,
ठंढक यह पहुँचाता है।
जहाँ कभी दिख जाता है,
सबका जी ललचाता है।
काले- काले- बीज इस के,
फोड़े फुंसी दूर भगाए।
विटामिनों से यह भरपूर,
आँख- दाँत निरोग बनाए।
बालू व बंजर  में फलता,
फिर भी पानी से भर जाए।
औषधियों की खान  है ,
बड़े- बड़े यह रोग भगाए।
                  सुजाता प्रिय

Sunday, May 5, 2019

मोदीजी कहिन

आज मई का प्रथम रविवार यानि विश्व हास्य दिवस है ।
इस हास्य दिवस पर मेरी एक छोटी- सी रचना।सिर्फ हँसने- हँसाने के लिए।

    मोदीजी कहिन
चुनाव का महौल कुछ गरम है।
जीत और  हार  का भरम है।
राँची दौरे में  मोदीजी पधारे
पुष्प वर्षा हुई लगी मोदी के नारे।
भगवान बिरसा को कर नमन।
जनता को भी किया संबोधन।
आप कमलदबा मतदान करें।
कल देश गढ़ा था आज भी गढ़े।
हे जनता जनार्दन है यह इरादा।
अबकी जीत पर है मेरा वादा।
अगर इस बार मैं जीत जाउँगा।
तो हे भाइयों ,बहनों,देशभक्तों।
आशक्त, सशक्त और निःशक्तों।
मुँह मीठा करने के लिए।
चाय जरूर पिलाउँगा।
            सुजाता प्रिय