एकता में बल
एक दिन एक शिकारी आया।
जंगल में वह जाल बिछाया।
उसके ऊपर वह दाना डाला।
छिपकर बैठा बन रखवाला।
कबूतरों का झुण्ड तब आया।
दाने को देख कर ललचाया।
कबूतरों का राजा तब बोला।
व्यर्थ तुम सबका मन है डोला।
जंगल में अन्न कहाँ से आया।
अवश्य किसी का छल छाया।
पर कबूतरों ने बात न मानी ।
दाना खाया कर के मनमानी ।
जाल में जाकर फंस चुके थे।
लज्जा से उनके सिर झुके थे।
कपोतराज ने फिर मुँह खोला।
बड़े प्यार से उन सबको बोला।
एक साथ चलो उड़ चलें हम।
जाल को लेकर भाग चलें हम।
मानकर कबूतर दादा की बात।
पहुँचे वे मूषक राजा के पास ।
कपोत-राज ने कहा मूषक से।
छुड़ा दे हमको जाल कुतर के।
कुतर मूषक ने जाल को काटा।
उड़े गये कबूतर करते हुए टाटा।
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ReplyDeleteहार्दिक धन्यावाद भाई l कहानी को कविता बनाकर लिखा है मैंने.
Deleteकहानी का सधा हुआ काव्य रुपांतरण किया है आपने
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद
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