Monday, May 23, 2022

जेठ की दुपहरी ( हाइकु )



जेठ की दुपहरी

जेठ माह की
तपती दुपहरी
ना मन भाए।

सूर्य तपता
लहक-दहक जो
यूं झुलसाए।

अग्नि लपटें
लप-लप झपटे
तन जलाए।

हो गया जीना
अब तो है मुश्किल
जी घबराए।

बंद हुआ है
घूमना औ फिरना
किसे बताएं।

गर्मी के मारे
पढ़ना-लिखना भी
रास न आए।

सूरज भैया
क्रोध क्यों करते हो
बिना बताए।

कंठ हैं सूखे
पानी औ शर्बत ना
प्यास बुझाए।

सूख गए हैं
कूप ताल-तलैया
जल धाराएंँ।

हर प्राणी का
बढ़ी तेरी गर्मी से
मन चिंताएँ।

तुम्हीं बता दो
ये संताप तुम्हारा
किसे बताएँ।

सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

No comments:

Post a Comment