Friday, September 9, 2022

गुरु (दोहे)

गुरुजी देते हैं हमें, विद्या- बुद्धि व ज्ञान।
उनसे से हम  सीखते,साहित्य,व-विज्ञान।।

लक्ष्य-प्राप्ति के लिए, बतलाते हैं राह।
बिना गुरु के जीवन में, मिलता है ना थाह।।

अनगढ़ माटी शिष्य हैं, गुरु होते कुम्हार।
गढ़ते रख कर चाक पर,देत सुगढ़ आकार।।

पाते गुरु से ज्ञान हैं,मन में उच्च विचार।
गुरु ज्ञान के सागर हैं, करें ज्ञान विस्तार।।

गुरु अपने आदर्श से,देते सबको ज्ञान।
गुरु के गुणों को अपना,बनते लोग महान।।

शिक्षा की प्रसाद को पा,बन जाते गुणवान।
शिक्षक के गुण को अपना,बनते गुण की खान।।

गुरु ज्ञान की ज्योत जला, देते हमको ज्ञान।
प्रकाश देना ज्ञान का, शिक्षक की पहचान।।

चरण कमल में सिर नवा, गुरु को करें प्रणाम।
प्रथम देव गुरु आप हैं,मुख में जपते नाम।।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, September 6, 2022

करमा पूजा

करमा पूजा गीत (मगही भाषा)

आज सुदिन हइ करमा वरतिया,
लाइ दा हो भैया करमा के डालिया।

कैसे हमें लइबै बहिन करमा के डालिया,
नदिया में बहिन दोनो कुल पनिया।

नदिया में नाविक खेबै नैया,
ओही पर चढ़ भैया पार उतरिहा।
लाइ दा हो भैया करमा के डालिया।

लेलन सभे भैया कान्धे कुलहड़िया,
लाइ देलन भैया करमा के डालिया।

युग-युग बढ़े भैया तोहरी उमरिया,
भौजी के भैया बढ़े अहिवतिया।

लाई दा हो भैया .........

       सुजाता प्रिय समृद्धि
          स्वरचित

Monday, September 5, 2022

जय श्रीराम (दोहे)

जय श्रीराम

दशरथ जी के लालना,राम बड़े थे वीर।
जीवों पर करते दया,लड़ने में रणधीर।

मझली मांँ ने द्वेष से, दिलवाया वनवास।
पिता आज्ञा पालन को,धर मन चले हुलास।

मातु-पिता और गुरु के,चरणों में रख शीश।
गुरु जन को प्रणाम कर, लेकर वे आशीष।

लघु-भ्राता लक्ष्मण जी,जोड़ कर दोनों हाथ।
बोले भैया आपके, मैं भी चलता साथ।

त्याग राजसी वस्त्र को, पहने वलकल अंग।
माता सीता भी चली, ख़ुश हो उनके संग।

वन-वन भटके साथ वे, खाते मूल और कंद।
छोटी-सी कुटिया बना,रहते ले आनन्द।

कपटी रावण ले गया, सीता को हर साथ।
एक न माना वह उनकी, रोकर जोड़ी हाथ।।

विकल हो तब राम लखन,ढूंढे चारो ओर।
लेकिन सीता का वहाँ,मिला न कोई छोर।।

घायल जटायु तब मिला, बतलाया यह बात।
सीता के गहने दिखा, जोड़े दोनों हाथ।।

वानर सेना ले बढ़े, प्रभु लंका की ओर।
रावण से जाकर किया, युद्ध बड़े घनघोर।

सीता को ले पहुंचे, साथ अयोध्या धाम।
नगर वासी खुश होकर,जपे राम का नाम।।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'



                 सुजाता प्रिय'समृद्धि'
                   स्वरचित, मौलिक

Sunday, September 4, 2022

शिक्षक

                                 शिक्षक
                            ऐसे शिल्पकार
                     जो मंदिर उठाते ज्ञान के।
    शिक्षक   ऐसे   काष्ठकार जो , द्वार  बनाते   ज्ञान  के।      शिक्षक   ऐसे   मूर्तिकार जो,  मूरत बनाते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   बुनकर हैं जो, वस्त्र  बनाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   स्वर्णकार जो, गहने  गढ़ते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   माली हैं जो , फूल खिलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   पंडित हैं जो , पूजन करते   ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   त्रृषि-मुनि हैं जो, दीक्षा देते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   दीपक हैं जो,ज्योत जलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   मार्गदर्शक जो,राह दिखाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   अनुगामी जो,लक्ष्य दिलाते  ज्ञान  के।
    शिक्षक   ऐसे   रक्षक हैं जो,रक्षक हैं बनते  ज्ञान  के।
                          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
                  समस्त शिक्षकों को सादर समर्पित

Saturday, September 3, 2022

एकता और अखंडता का रूप हिंदी

एकता और अखंडता का रूप हिंदी

देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी भाषा की जननी संस्कृत भाषा है।या यूँ कहें हिन्दी  संस्कृत भाषा का ही सरल रूप है।यह एक वैज्ञानिक भाषा है।इस भाषा में कोई उच्चारण दोष नहीं है।इस भाषा को लिखने में स्वरों के मेल के लिए वर्ण नहीं अपितु मात्राओं को प्रयोग में लाया जाता है।संस्कृत हर भाषा की जननी है तो हिन्दी सभी भाषाओं का प्रतिनिधित्व करती है।यह सहजता से समझी और सीखी जाने वाली सरल भाषा है।इसके हर अक्षर और अक्षरों के योग से निर्मित शब्दों में जो माधुर्य है वह किसी अन्य भाषा में नहीं। सच माने तो हिन्दी हमें एकाग्रता के साथ-साथ एकरूपता और अखण्डता  का भी पाठ पढ़ाती है। हिन्दी भारत की हर क्षेत्रिय भाषी लोगों को सहजता से समझ आती है। मान्यता यह भी है कि भारत में हजारों क्षेत्रीय भाषाओं की बोली प्रचलित हैं। हर कोश की दूरी पर भिन्न -भिन्न शब्द और उनके अलग-अलग अर्थ हैं जिन्हें दूसरे क्षेत्र के लोगों को समझना कठिन था ।इसलिए सभी भाषाओं को मिश्रित कर सरल भाषा 'हिंदी' का निर्माण हुआ और उसी भाषा को राजकीय और प्रशासनिक कार्यों में प्रयोग किया जाने लगा।इस प्रकार हिंदी देश की जन- भाषा के रूप में विकसित हुई और इसी कारण से हमारी हिन्दी भाषा को हमारे देश की राष्ट्रीय भाषा बनने का गौरव प्राप्त है।
भारत के हिन्दी साहित्यकार गण हिन्दी भाषा में अपनी बेजोड़ साहित्यिक सृजन कर इस भाषा को लोकप्रिय बनाते हुए 'समृद्धि' की ओर ले जाने का अथक प्रयास कर रहे हैं। इस भाषा में साहित्यारों 'द्वारा लिखे गए  लेख, निबंध, नाटक, कहानी, कविता, उपन्यास इत्यादि काफी सुंदर, सार्थक ,प्रेरक और आकर्षक होते हैं।
इस भाषा को विस्तार देने एवं समृद्ध बनाने में हमारे देश के फिल्म- जगत का योगदान भी सराहनीय है ।जो बड़े-बड़े फिल्म -उद्योग चलाकर देश-विदेश में हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करने का प्रयास कर रहे हैं ।विदेशों में लोग भी बड़ी तन्मयता से  हिन्दी फिल्म देखते और पसंंद करते हैं।एक दिन ऐसा भी आएगा जब देश-विदेश में बोली जाने वाली हमारी हिन्दी सम्पूर्ण जगत में लोकप्रियता को प्राप्त कर अपना उच्च और श्रेष्ठतम स्थान प्राप्त करेगी। हिन्दी साहित्यकार इसे शीर्ष स्थान पर पहुंचाने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं।एक दिन हमें यह सफलता प्राप्त हो कर ही रहेगी, ऐसा हम अपने मन में दृढ़ विश्वास लेकर निरंतर प्रयास कर रहे हैं। हमारी हिन्दी भाषा जल्द ही अखण्ड भारत का निर्माण कर  सम्पूर्ण जगत में अपना अलग पहचान बनाकर रहेगी।
       जय हिन्द,जय हिन्दी।
  🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
         मौलिक रचना

Friday, September 2, 2022

हिन्दी (दोहे)

हिंदी (दोहे)

सरल भाषा हिन्दी का,सदा करें सम्मान।
हिंदी में सब बोलिए, रखिए इसका मान।।

हिंदी देश की बिंदी, अद्भुत है श्रृंगार।
इस भाषा के प्यार को, जान रहा संसार।।

हिन्दी से हिन्दवासी,पाते हैं पहचान।
इस भाषा को बोलिए, मन में रखकर शान।।

इसके जैसी जगत में,नहीं है भाषा एक।
चाहे इसको परख लो,जग में नजरें फेंक।।

जो जन बोले प्रेम से,इस भाषा में बोल।
बोलने में मधुर लगे,जैसे मीठा घोल।।

हिन्दी में जो बाचते,गीता-वेद-पुराण।
उससे ना संसार में, ना है जीव महान।।

हिन्दी को बस मानिए, ईश्वर का उपहार।
इस भाषा को हर घड़ी, मिलता जाता प्यार।।
            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'


Thursday, September 1, 2022

हिंदी भाषा (सायली छंद)

हिंदी भाषा (सायली छंद)

  राष्ट्रीय                     बड़ी 
भाषा हिंदी             गतिशील है 
का हम सब          यह भाषा हिंदी 
मिल  मान             इसकी लिपि
  बढाएंँगे                    सुंदर

   सारी                     बहती 
भाषा छोड़             नदियों की
कर हम सब          धारा - सी  है
 हिंदी को               गति इसके
अपनाएंँगे                 अंदर

    देश                     इस
  में बोली               भाषा में 
यह जाती है         एक  रूपता है 
 जनता की            बहुत सुंदर 
   प्यारी                    भाषा

   सुत्र                    रहती
है सम्पर्क             थी अँग्रेजों
की लगती तो       को  भी  इसे
 कितनी  यह        बोलने   की
     न्यारी।            अभिलाषा 

    भाषा                 भावों 
का मूलाधार      की अभिव्यक्ति 
चक्र है  यह       सरलता से इसमें 
अक्षर इसके           हो पाती
    अच्छे                    है

   देवताओं                  इसी
   को प्यारा             कारण यह 
यह लिपि है     भाषा तो देवनागरी 
सत्य सनातन       लिपि कहलाती
   सच्चे                      है

        सुजाता प्रिय समृद्धि