Tuesday, January 31, 2023

वीर हनुमान (सायली छंद)

 वीर हनुमान (सायली छंद)

      श्री 
    राम के 
सच्चे सेवक हैं 
 भगवान वीर 
    हनुमान।

    सारे 
   जग में 
पूजे जाते हैं 
सबके कृपा
   निधान।

      दया 
    भाव हैं 
सब पर रखते 
 सबके दुःख 
     हारी।

   भक्तों 
  के दुःख 
दूर है करते 
चाहें जितना 
    भारी।

      दूर
   हैं करते 
कुमति को वे 
 देते सबको 
    सुमति।

     रीति
   नीति के
रखवाले हैं वे
  दूर करते 
    दुर्नीति।

     लाल
   सिंदूर से 
हैं अंग सजाते 
 और लगाते 
     भाल।

       लाल 
 माला बाजूबंद 
पैजनी पहनते हैं 
 पहनते लंगोटी 
       लाल।
सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, January 30, 2023

और कहानी छप गयी (हास्य)



और कहानी छप गयी (हास्य )

किसी नगर में एक निर्धन और विद्वान ब्राह्मण रहते थे।उनके द्वार पर उनके शिष्यों भीड़ लगी रहती।सभी को वे उत्तम शिक्षा देते थे।गुरु दक्षिणा के रूप में वे स्वेच्छा से जो कुछ दे देते उसे संतुष्ट भाव से स्वीकार करते। उन्हें कहानियांँ लिखने का बड़ा शौक था।जब भी समय मिलता अच्छी और शिक्षाप्रद कहानियांँ लिखकर लोगों को सुनाते।सभी लोग उनकी कहानियों की खूब प्रशंसा करते। उन्हें लगता काश उनकी कहानियांँ पत्र-पत्रिकाओं में छपती। लेकिन, निर्धनता के कारण वे अपनी कहानियों को छपबा नहीं पाते।
उनकी पत्नी मुर्ख और झगड़ालू स्वभाव की थी।आये दिन वह उनसे झगड़े करती।उनके द्वारा कहानी लिखें जाने को मुर्खतापूर्ण व्यवहार तथा कागज रोशनाई और समय की बर्वादी कहती।अवसर पाते ही उनके शिष्यों को डांट-फटकार कर भगा देती। उन्हें बस टोले-पड़ोसियों की निंदा सुनने एवं चुगली करने में ही मज़ा आता। पंडित जी उन्हें समझाते की निंदा एवं चुगली करना बुरी बात है। संसार में भांति-भांति के लोग हैं। दुर्गुणों और दुराचारियों की ओर ध्यान न देकर भले मानस और गुणवानों की कद्र तथा संगति करनी चाहिए। परंतु पंडिताइन पर उनके उपदेशों का कोई असर नहीं होता।
पंडित जी ने एक पुस्तक में पढ़ी थी कि महापुरुषों की सफलता में किसी-न-किसी नारी का हाथ रहा है। वे सोचते मांँ-बहन तो है नहीं। पत्नी ऐसी मुर्ख है जिसकी दृष्टि में शिक्षा से बुरा कोई कार्य हो ही नहीं सकता। वे सोचते काश वे मुर्ख होते और उनकी पत्नी  कालिदास और तुलसीदास की पत्नी जैसी।
एक दिन पंडित जी किसी काम से बाहर गये हुए थे। पंडित जी की पत्नी झाड़ू लगा रही थी। अचानक उनकी दृष्टि पंडित जी के बिछावन पर पड़ी, जहाँं पंडित जी द्वारा लिखी गई एक नयी कहानी रखी थी। उसने सोचा? क्यों ना इसे बाहर फेंक दूँ। यदि मैं उनके लिखे पन्ने को फेंकती जाऊँगुं तो पंडितजी ऊब कर लिखना ही छोड़ देंगे।ऐसा सोचकर वह कहानी के पन्नों को उठाकर कूड़े के ढेर पर फेंक आयी।
संयोग से उस समय वहाँं से जा रहे एक पत्रकार की नजर उस पन्ने पर पड़ी। उन्होंने उसे कुछ जरूरी कागजात समझकर उठाया और कहानी पढ़ी। उन्हें वह कहानी बहुत ही रोचक और शिक्षाप्रद लगी। अंत में पंडित जी का नाम पता लिखा था। पत्रकार ने उस कहानी को उनके नाम-पते के साथ छपबा दिया।
 जब पंडित जी घर लौटकर आये तो अपने द्वार पर भीड़ देखकर अचंभित हो गये।उनके एक विद्यार्थी ने उन्हें अखबार दिखाते हुए कहा- अखबार में आपकी बहुत अच्छी कहानी छपी है। पंडित जी किंकर्तव्यविमूढ़ सा उन्हें देखते हुए सोच रहे थे-मुझे तो कहानी छपबाने का सामर्थ ही नहीं फिर मेरी कहानी कैसे छप गयी ? अखबार लेकर पढ़ी। सचमुच यह तो उनके द्वारा लिखी गयी कहानी है। कहानीकार के स्थान पर उनका ही नाम है।साथ में उन्हें इस कहानी को लिखने के लिए पुरस्कृत करने के लिए आमंत्रित किया गया है। आखिर यह चमत्कार हुआ कैसे?
वे घर आकर अपनी लिखी हुई कहानी ढूंढने लगे।
पत्नी ने उन्हें ऐसा करते देख तो पूछा क्या ढूंढ रहे हो?
उन्होंने कहा-यहाँं मैंने एक कहानी लिखकर रखी थी।
पत्नी ने कूढ़ते हुए कहा-उसे तो मैंने कूड़े पर फेंक दिया।
अब पंडित जी को सारी बात समझ में आ गयी।वे अपनी मुर्ख पत्नी को देखकर मुस्कुरा उठे।आज उन्हें अपनी मुर्ख पत्नी के कारण यह सफलता प्राप्त हुई थी।
                             सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आया वसंत

आया वसंत (दोहा)

मौसम बड़ा सुहावना, आ गया है वसंत।
लेकर आया साथ में, खुशियाँ देख अनंत।

मुस्काई प्यारी कलियाँ , महक उठी सब डाल।
इस प्यारे मौसम ने, ऐसा किया कमाल।

आम पेड़ की डाल पर,कोयल मारे कूक।
जिसे सुनकर विरहन के,दिल में मारे हूक।

उड़ रही देख तितलियांं, भौंरा छेड़ा तान।
होठों पर सब लोग के, थिरक रही मुस्कान।
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
            स्वरचित, मौलिक

Sunday, January 29, 2023

वसंत ऋतु (धनुष वर्णाकार पिरामिड)

वसंत ऋतु 

हे 
सखी 
वसंत 
ऋतु आयी
सब का मन
नाचे हो मतंग
खुशी से अंग-अंग
भर   गया   उमंग
सखियों के संग
देखूँ हो दंग
प्यारा रंग
अलग
रूप 
है

ये
झूम
रही है
देखो डाल
नव पल्लव
का कर श्रृंगार 
मंजरियां आकर
सजाईं हैं झालर
लाज की घूंघट
लाल कपोल
पुलकित
विकल
मन 
है

Friday, January 27, 2023

गाँधी जी के तीन बंदर

गाँधी जी के तीन बंदर

गाँधी जी के तीन बंदरों ने,
    तीन  बातें हैं हमें सीखाई।

बुरा किसी की कभी न देखो,
   बुरा किसी की कभी न सीखो,
      दूर-दूर तक नजरें तुम फेंको,
        आँखों को ढक कर हमें बताई।

बुरा किसी का कभी न सुनना,
  बुरा किसी को कभी न कहना,
     बुराई को अपने चित न धरना,
       कानों को ढक कर हमें बताई।

जब बोलने को मुख खोलो,
  अपने शब्दों को पहले तोलो।
     बुरा किसी से कभी न बोलो,
        मुंँह को ढक कर हमें बताई।

        सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
           राँची, झारखण्ड
           

Monday, January 23, 2023


दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद है। प्रत्येक छंद की भाँति इस छंद में चार चरण होते हैं। इसके प्रथम और तृतीय चरण को विषम एवं द्वितीय और चतुर्थ चरण को सम चरण कहा जाता है। इसके प्रत्येक पद में 24 (13+11)मात्राएँ होती

Wednesday, January 18, 2023

माँ की शक्ति (लघुकथा)

माँ की शक्ति

हाथियों का झुंड जंगल में भोजन एवं पानी की खोज में इधर घूम रहा था। हाथियों के झुंड में हथिनी और उनके छोटे-छोटे बच्चे भी थे ।सभी मस्ती से इधर-उधर घूमते और पेड़ की डालियों को तोड़ तोड़ कर उसके पत्ते और फलों खाते और मस्ती से झूमते हुए चिंघाड़ते। खाते-खाते उन्हें प्यास लगी । सभी इधर-उधर नजरें घुमाकर पानी ढूंढने लगे। तभी कुछ दूर आगे उन्हें एक बहुत बड़ा सरोवर दिखाई दिया ।सभी प्रफुल्लित हो उधर बढ़ चले। बच्चे तेजी से छलांग लगाते हुए पानी की ओर बढ़े और पानी पीने लगे तभी पहली से पानी के ऊपर लेटे हुए मगरमच्छ ने हाथी के एक छोटे बच्चे  को अपने बड़े जबड़े मे जकड़ लिया।बेचारा हाथी का बच्चा घबराकर जोर-जोर से चिंघाडना शुरू किया।यह देख हाथियों के अन्य बच्चे भयभीत हो दौड़ कर वहांँ से भागने लगे। हाथियों का झुंड  भी डर कर ठिठक गया ।उस बच्चे की माँ हथिनी ने ऊँची आवाज में चिंघाड़ती हुई अपने साथी हाथी -हथिनियों से बच्चे को बचाने की गुहार लगाई।लेकिन अपनी जान जोखिम में डालकर उस बच्चे को बचाने के लिए कोई भी हाथी-हथिनी नहीं बढ़े। मां हथिनी अपने बच्चे को मौत के मुंँह में देख बहुत घबराई और कातर नजरों से अपने झुंड की ओर देखकर बच्चे को बचाने के लिए एक बार फिर मिन्नतें की।लेकिन हाथियों को हतोत्साहित देख हथिनी ने की ममता जाग उठी।अचानक उसमें शक्ति का संचार हुआ।और अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने बच्चे को मौत के मुंँह से बचाने के लिए दौड़ पड़ी ।वह झट जाकर मगरमच्छ के पेट पर अपने मोटे- मोटे चारों पैरों को रखकर मगरमच्छ हो कुचलना शुरू किया मगरमच्छ दर्द से तिलमिला उठा और कराहने लगा। जिसके कारण हाथी का बच्चा उसके जबड़े की पकड़ से ढीला पड़ गया और उसके जबड़े से निकलकर आगे की ओर बढ़ गया ।हाथियों का झुंड दूर से ही उसकी मांँ द्वारा मगरमच्छ पर किया गया प्रहार देख रहे थे।एक मांँ की ममता की आगे एक बलशाली जीव को परास्त होते देख सारे हाथी और हथिनी सूंड उठाकर जोर से सिंघाड़ कर हथिनी का उत्साह बढ़ाया।उनकी विजय नाद सुन मगर मगरमच्छ जल्दी से बच्चे को छोड़ सरोवर के जल में चला गया।
          सुजाता प्रिय समृद्धि