Friday, April 10, 2026

लेवनी (गेंदरी बनाम गद्दे)

गेंदरी बनाम गद्दे 

होली-दशहरे में आई साड़ियाँ नई।
पुरानी साड़ियाँ जमा हो गयी कई। 
कोई रंग उड़ी,  कोई फटी-चिथड़ी।
कोई - थी मुड़ी, कोई थी  सिकुड़ी। 
उन्हें देखने को नहीं करता था दिल। 
रखना  भी  है उन्हें उनको मुश्किल।
य़ह  सभी अब  तो बेकार की ढेर है। 
इसे  हटाने में करना क्यों  यूं देर  है। 
अम्मा - चाची और  बुआ को  दादी। 
बोली - मत करो तुम इनकी बर्बादी।
इनको  मिला कर  बना लेना गेंदरी।
मतलब  बिछौना अथवा  कहो दरी। 
डर  से अम्मा  और चाची रही मौन। 
बुआ  ने पूछा - इसे बनाएगा  कौन?
दादी बोलीं- तुम ननद-भौजाई मिल।
तह लगा-लगाकर उसको देना सिल।
बुआ के चेहरे पर उड़ पड़ी हवाइयाँ।
माँ और  चाची लेने  लगी जम्हाईयाँ।
बाहर बोला कोई माइक में  हल्ले में। 
आ गया आपके हर गली मुहल्ले में।
कपड़े से  रूई  बनाने वाली मशीन। 
नरम-गरम तोसक बनबाईये हसीन।
सुन- बुआ,चाची व माँ बड़ी इतराई।
झट जा- रुई बनाने वाले को बुलाई। 
सभी पुरानी साड़ियों के बन गए गद्दे।
छूटे कपडों  से  गेंदरी  बनाने के मुद्दे। 

      सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, April 7, 2026

अर्जी

अर्जी.                अर्जी 
        
                           हे                   
                         मित्रों 
                     मन विश्वास 
                  सदा ही तुम रखो 
         आगे बढ़ना है हमको जीवन में 
      महकाना है अपनी इस फुलवारी को 
  मेहनत की सुगंध बिखरा-कर चहुँ दिशा में 
 रिश्तों की डोर पकड़ ,साथियों के हाथ थाम 
चलते चले जाना है,कदम-से-कदम मिलाकर 
                             यही 
                             मेरी
                            मर्जी, 
                            अर्जी 
                             परम 
                             पिता 
                           परमेश्वर
                           से भी है
   
                     सुजाता प्रिय समृद्धि 

Sunday, April 5, 2026

गाँव की नारी

गाँव की नारी 

पुरुषों से कदम मिलाकर चलती,
                           वह गाँव नारी है।
हर पल पुरुषों का साथ निभाती,
                     वह  गाँव की नारी है।

घर का काम निपटाकर बाहर,
             पुरुषों का साथ निभाती है।
पीठ पर बच्चे को बांँध कर,
                संग खेती करने जाती है।

कुदाल चलाती,खेत कोड़ती,
              हल चलाकर खेत जोतती।
मेड़ बनाकर बीज बोती,
              एक-एक कर पौध रोपती।

भला कैसे गुजारा होगा अब, 
                     हाल बड़ा बदहाल है।
करे क्यूँ न मजबूरी में, 
             यह पापी पेट का सवाल है।

फिर भी जन हाथ उठाकर कहते        
                   शक्तिहीना यह नारी है।
है केवल ममता की मूरत, 
           कोमल अबला यह बेचारी है।
         सुजाता प्रिय समृद्धि

Saturday, April 4, 2026

एकता में बल

एकता में बल 

एक दिन एक शिकारी आया। 
जंगल में वह जाल बिछाया। 
उसके ऊपर वह दाना डाला। 
छिपकर बैठा बन रखवाला। 
कबूतरों का झुण्ड तब आया। 
दाने को देख कर ललचाया। 
कबूतरों का राजा तब बोला। 
व्यर्थ तुम सबका मन है डोला। 
जंगल में अन्न कहाँ से आया। 
अवश्य किसी का छल छाया।
पर कबूतरों ने बात न मानी ।
दाना खाया कर के मनमानी ।
जाल में जाकर फंस चुके थे। 
लज्जा से उनके सिर झुके थे। 
कपोतराज ने फिर मुँह खोला। 
बड़े प्यार से उन सबको बोला। 
एक साथ चलो उड़ चलें हम। 
जाल को लेकर भाग चलें हम। 
मानकर कबूतर दादा की बात। 
पहुँचे वे मूषक राजा के पास ।
कपोत-राज ने कहा मूषक से। 
छुड़ा दे हमको जाल कुतर के।
कुतर मूषक ने जाल को काटा।
उड़े गये कबूतर करते हुए टाटा।

Friday, April 3, 2026

संगठन में शक्ति

संगठन में शक्ति 
एक किसान के थे चार बेटे ।
चारो मिलकर खूब झगड़ते ।
किसान ने उनको समझाया। 
पर  बेटों को समझ न आया। 
किसान ने एक योजना बनाई। 
उनसे आठ  लड़कियाँ मंगाई।
चार को  साथ रस्सी से बंधा। 
चार को अलग - अलग रखा। 
प्रत्येक पुत्र को पास बुलाया। 
बँधी लकड़ियों को तोड़बाया।
पर लकड़ियां उनसे नहीं टूटी। 
मिलकर  पाई  थी  मजबूती। 
एक - एक लकड़ी पकड़ाया।
उनको उन चारो से तुड़वाया।
टूटी  वह  बिना  लगाए जोर। 
अकेली लकड़ी थी कमजोर। 
तब लड़कों को समझ आया। 
सब आपस में हाथ मिलाया। 
बोले अब हम सब नहीं लड़ेंगे।
हम-सब मिल- जुलकर रहेंगे। 
संगठन में शक्ति बहुत है भाई। 
है  बँधी लड़कियों -सी सच्चाई।

Wednesday, April 1, 2026

चोट (लघुकथा)

चोट (लघुकथा) 

पत्नी की तीखी बोली से संजीव का मन बड़ा आहत था। इतनी बेरूखी से सबके सामने डांँटेगी । यह तो कभी उसने सोचा.......... ।क्या हो गया उसे ?
 इतना भी नहीं सोंचा ऐसे अपमान भरे लहजे से मेरे दिल पर क्या..... ।
यदि मैं सबके सामने उसे ऐसे ही अपमानित...............? 
"करते तो हो........ !  हमेशा... .....।
हर जगह.........।हर समय ,......।
बडो़ं के सामने...... ।
छोटों के............।सहेलियों .......।
पडोसियों........।परिवारों,
सहकर्मियों,नौकरों..... ।"
उसने एक बार तुमसे........ ।
अपमान से दिल लहू-लुहान हो जाता है....... ।लेकिन वह हमेशा आसुओं के घूट पीकर  ........है।तो तुम क्यों विचलित.... ?"
तेरे जैसा उसका दिल..........? नहीं- नहीं! अपनी अंतरात्मा की फटकार सुन वह ............।
होंठों से बुदबुदाते हुए...
..मुझे भी. उसके सम्मान का...............। 

  सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, March 31, 2026

कब तक (वर्ण पिरामिड)

5,               कब तक 
              (वर्ण-पिरामिड)

                       मैं 
                      जब 
                    राहों में 
                   चलती  हूँ।
                 मन-ही-मन 
               सोचा करती हूँ।
              कब तक मुझको 
             इन  दुर्गम  राहों  में 
           चलते चले जाना होगा? 
          और कब - तलक मुझको 
         इनकी असीमित दूरियों को 
        अपने कदमों से नापना होगा?
       कब तलक मुझको इसके सभी 
      घुमावदार मोड़ों में  मुड़ - मुड़कर 
    दिशा बदल कर, दाएं और बाएँ चल 
  कंक्रीटों से भरे उबड़ - खाबड़,टेढ़े - मेढ़े 
पथ के ठोकरों को सह करके चलना होगा।
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आँखों-ही-आँखों में (लघुकथा)

आँखों-ही-आँखों में 

सुशांत का मन बड़ा अशांत था।आखिर कौन सा ऐसा अपराध  .......? जो सुनीता मैम ने इतनी जोर से........
वह तो कोई भी काम उनसे पूछे बिना............।
उन्होंने जिन सामानों को लाने कहा वह तो लाकर...........!
उन्हें लाने में मेरी जेब भी खाली..... ।
उपर से सबके सामने........।
अपमान का घुट पीकर कॉलेज के आयोजित कार्यक्रम में शामिल.........।लेकिन सुनीता मैडम  से नजरें चुराता.........।
कार्यक्रम की समाप्ति होते ही आयोजक छात्रों ने खर्च के पैसे का  हिसाब और बचे हुए पैसे उन्हें देने लगे ।
वह सोचने लगा-मैं दूँ भी तो क्या  ?
मेरे तो जेब के पैसे भी......
कोई बात नहीं मैं मैम को न हिसाब दूंगा न ही यह बताऊँगा कि ...........
सुशां s s त.....! अचानक मैम ने पीछे से पुकारा  ।
"लो य़ह तुम्हारे रुपये !" उसके पीछे पलटते ही मैम ने रुपये बढ़ाते हुए कहा-
"यह कौन - से रुपये मै  s s म  ?" उसकी आवाज में हकलाहट  ......
"तूने सारे सामन ..........।"  "मैंने पैसे भी......!"
"इसकी कोई जरूरत नहीं .........."
"क्यों नहीं ?" मैम ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ......
वह नजरें उठाकर मैडम की ओर......।
उनके नजरों में वात्सल्य, प्रेम और ममत्व की लहरें हिलोरे ....। 
सारे गिले-शिकवे भूल वह हौले से मुस्कुरा दिया......
मैम का मन भी.....

                    सुजाता  प्रिय "समृद्धि"

Thursday, March 26, 2026

तीखे बोल-(लघुकथा)

जय माँ शारदे 🙏🏽🙏🏽

        तीखे बोल 

अर्चना के पति विलास जी अचानक बीमार पड़े ।डॉक्टरों ने किडनी की बीमारी बताकर वेल्लोर ले जाने को कहा।वह पड़ोसन सोनाक्षी को बच्चों एवं घर की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप कर चल पड़ी।
मोह बस सोनाक्षी सारी जिम्मेदारी बखूबी........।
छह महीने इलाज के बावजूद विलास जी.............।
अंतिम संस्कार गाँव से होने के बाद दुःखी मन से जब अर्चना जी शहर वापस आई तो देखी- बच्चे सोनाक्षी अंटी के दिवाने हो गए हैं। 
हर बात पर सोनाक्षी जी की तारीफों के पुल............।
"आंटी जी ने ऐसा खाना खिलाया, वैसा लंच दिया ! ऐसे घर, कपड़े, फूलों इत्यादि............।तबियत खराब होने पर खूब..........।किसी से लड़ाई झगड़े होने पर बीच-बचाव.............।"
हाँ अब बच्चे उनके अहसान के काईल हो या ममता के वशीभूत हो अंटी के भी ,बाजार के  छोटे-मोटे काम कर देते। 
माँ के मना करने पर कहते- अंटी ने हमें पैसे और मेहनत से जितना सहयोग व सहारा दिया उस अनुपात में तो हम तो कुछ भी नहीं करते मम्मी!" 
उफ्फs s s s s s s s s s
हर समय सोनाक्षी की तारीफ.......
खीज कर वह बच्चों को डाट .....।
इस तरह भी जब बच्चे नहीं मानते तो सोनाक्षी को ही कठोर शब्दों में सुनाती -"मेरे बच्चों जैसा मुर्ख कोई हो ही नहीं सकता। कोई कुछ चिकना-चटपटा खिला देगी तो उसकी जी हजूरी में लगे रहेगें।इनके सीधेपन का फायदा चालबाज  औरतें खूब उठाती हैं। एक तो दुसरे के बच्चों से काम कराने में कोई शर्म नहीं करतीं, ऊपर से खूब वाहवाही भी लूटती हैं।"
सोनाक्षी को समझते देर नहीं लगी- यह फिकरे किस पर......।
उसका दिल लहूलुहान........।
 मन में संकल्प लिया- "चाहे जो हो, अब कभी भी इनके बच्चों की ........।"
      ईश्वर ने जल्द ही वह दिन दिखा दिया। अर्चना की जेठानी जी स्वर्ग सिधार........।
गाँव जाना भी आवश्यक है और बच्चों की छह माही परीक्षा ........।
अब न अर्चना जी को ही मुँह रहा कि बच्चों की देखभाल की...........।
 न ही सोनाक्षी का मन...........।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, March 24, 2026

sur

सुर छेड़o न अभी तुम सांवरिया। 
तेरी सुर सुन होती मैं  बाबरिया।।
सुर छेड़ न.........
मैं तो paniया  भरण को जाती रहीं, 
छलक-छलक छलक जाए मोरी gagriyan

Sunday, March 22, 2026

यमुना किनारे

हरी बोलो!कृष्ण जी बंसी बजावे यमुना किनारे हरि बोलो।
हरि बोलो! वंशी के धुन में सबको रिझाबे हरी बोलो।
हरी बोलो .....
यमुना किनारे कदम की गछिया,
हरि बोलो गाछ पर चढ़कर डाली नवाबे हरि बोलो ।
हरि बोलो ......
सब सखियन मिली वसन उतारे,
हरि बोलो  यमुना के जल में संग नहाबे हरि बोलो
हरि बोलो .......
देख गोपन की स्नान की रीति, 
हरि बोलो धीरे से जाकर कान्हा वसन चुराबें हरि बोलो ।
हरि बोलो ...
सब सखियां मिली अरज करत हैं,
हरि बोलो कान्हां से विनय कर वसना मांगे हरि बोलो।
हरि बोलो....
 कृष्ण जी बोले वसन मत खोलो,
हरि बोलो जल में वरुण के वास बताए हरि बोलो।
हरि बोलो......
                     सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Wednesday, March 18, 2026

तुम से मिलकर

S               तुम से मिल कर 

                तुम  से  मिल कर
                ऐसा लगता है कि 
                कुछ  खोया हुआ 
                पा लिया है हम ने 
            उस रास्ते की याद आई 
        जहाँ कभी हम साथ चलते थे 
     गलबहियाँ डाल,पीठ पर बस्ते लिए 
  नन्हें कदमों से मंजिल की दूरियाँ नापते 
   संजीदगी -से रास्ते की धूल उड़ाते हुए 
    चलते चले  जाते थे, बढ़ते जाते थे, 
       तब  हमारे  मक़सद एक होते थे, 
        और हमारे उद्देश्य एक होते थे,
          सभी सपने भी एक होते थे,
             पर आज हमारा मिलना
              एक सपने से कम नहीं
                
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, March 8, 2026

बुद्धिमान गदहा

एक धोबी था। लोगों के कपड़े धोकर पैसे कमाता। परिवार का भरण-पोषण कर कुछ पैसे बचा भी लेता था।
एक बार उसकी पत्नी बहुत बीमार पड़ी। उसकी इलाज में जब उसके जमा किए गए सारे पैसे खत्म हो गये,तब उसने एक व्यापारी से यह कहकर कुछ पैसे उधार लिए,कि जल्द ही उसके पैसे वापस कर देगा। किन्तु समय पर वह व्यपारी को पैसे वापस नहीं कर पाया। व्यापारी उससे अपने पैसे मांगने आने लगा।इसी बीच उसकी निगाह धोबी के गदहे पर पड़ी। उसने धोबी से कहा- यदि तुम मेरे नहीं वापस कर सकते तो उसके बदले अपने गदहे को ही दे दो।
धोबी ने उससे बहुत कहा कि वह जितने कपड़े धोने के लिए ले जाता और लाता है उसे गदहा ही ढोता है। उसके जाने से कपड़ा धोना कठिन हो जाएगा। लेकिन व्यापारी ने एक नहीं मानी।हारकर धोबी ने व्यपारी  को अपना गदहा दे दिया।
गदहे को अपने मालिक की विवशता देखी नहीं जा रही थी।सोचा व्यपारी के साथ ना जाए।पर नहीं जाने से भी उसके मालिक को पर

Monday, February 16, 2026

सौन्दर्य

देखकर आईने में सूरत निहारती।
बड़े ही जतन से सजाती-संवारती।

साँवली सूरत को गोरी बनाने को।
दागदार चमड़ी को कोरी बनाने को।
सौंदर्य-प्रसाधनों से उसको निखारती।
बड़े ही जतन से..............
केशों को संवारती विभिन्न तरीके से।
गूँथती और बांधती बड़े सलीके से।
देखकर आईना कंघी से हो झाड़ती।
बड़े जतन से... ‌......................
पहनकर वसन बार-बार हो देखती।
आईने में हर बार नज़रे हो फेंकती।
वसन को ठीक करने को हाथ मारती।
बड़े ही जतन से.................
तू काश आईने में अपने मन को देखती।
बस एक बार अंतर में नजर को फेंकती ।
अपनी बुराइयों को थोड़ा सुधारती।
बड़े ही जतन से...................
मन के सौंदर्य को तू निखारती सखी। 
कभी भी किसी जन से करती न बेरूखी।
हृदय- सुन्दरी कह सखी तुम्हें पुकारती 
बड़े ही जतन से ..............     
          सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Sunday, February 8, 2026

सपने

सपने 
                
                कभी 
             लड़कपन में 
        हमने जो देखे सपने 
   काश!अभी वे हो जाते अपने 
ऊँची उड़ान भरते हम भी नभ में 
  खेल तारों संग आँख-मिचौनी 
     फिर चढ़ कर चाँद के ऊपर 
         सारे जग की सैर कर
           आ लौट अपने घर 
              दादी- दादा को 
                हाल सुनाते
                    चंदा 
                  तारे की 
                बात बताते 
          नभ में कैसे वे रहते हैं 
      रात को कैसे चमका करते हैं 

            सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

आईना

1.    आईना 
                        हम 
                   आईने को 
              लाख साफ कर लें 
              चेहरे पर नकाब है 
         तो खुद को पहचान पाना 
                भी मुश्किल है 
                    इसलिए 
               आईने को साफ 
               करने  से  अच्छा  
               चेहरे  साफ रखो 
                     क्योंकि 
            हमारा  प्यारा आईना 
            जितना  साफ   होगा 
            चेहरे  के   धब्बों  को  
            उतनी ही बारीकी  से                                         
             सभी  को  दिखाएगा 
             हमारे होठों की वाणी
             हमारे  चेहरे  के भाव
             आँखों  की  दृष्टि   ही 
              हमारे  प्यारे चेहरे की 
              अनमोल   सुंदरता  है

               सुजाता प्रिय समृद्धि

आया सुंदर भोर

,       आया सुन्दर भोर 

          उठ  भाई अब 
          आलस्य त्याग 
          मिटा   मन  के
          सारे   अवसाद 
     आया प्यारा सुंदर भोर
   सूर्य-किरण फैली चहुँ ओर 
  सभी जीव का मन विहसता
 खुशियों से तन - मन हुलसता
  उड़ी चिरैया भर मन उल्लास
    चहक कर करती परिहास
         खुश कर मन उदास

Friday, January 30, 2026

खुशबू चमन से (ग़ज़ल)

खुशबू चमन से 

चुराया किसी ने है खूशबू चमन से। 
मगर है न जाता महक  मेरे मन से। 

बहारों का मौसम, फिजा में समाया, 
मग़र वह महक न आता वदन से।
 
गुल तो खिलें हैं, बहुत गुलशन में, 
मगर उनमें रौनक नहीं है अगन से। 

कोई मुझसे कह दे जरा पास आकर, 
मिला क्या किसी को,इसके हनन से ।

अगर तोड़ लेता, कोई फूल आकर, 
Aस्क न गिरता फूलों के नयन से ।

फूलों में रहता महक उनकी प्यारी, 
अलग वह न होता, अपने रतन से। 

लगन से

Thursday, January 29, 2026

,माँ शारदे भवानी

माँ शारदे भवानी 

माँ शारदे भवानी इतनी कृपा तू करना। 
मुझ मूढ के हृदय से अज्ञानता को हरना। ।
तेरे चरण में माता हम शीश हैं  नवाते। 
कर जोड़कर विनीत हो  विनती सदा ही गाते। ।
विद्या ददाति  माता !हमको सुघड़ बना दो। 
सन्मार्ग पर भी चलना, हमको तू  माँ सिखा दो। 
छोटा बड़ा सभी माँ हर काम को करें हम ।
विद्या  के ashma में उड़ान भी भरें हम।।
आशीष तुम दो माता, जो कामना करें हम। 
जो दीन और दुखी हो, उन सबका दुःख हरे हम ।।
आकाश से भी ऊंचा, मन भाव  हो  हमारा। 
गंगा बहे हृदय में, हों प्रेम की ही धारा। ।
मस्तक सदा हो ऊंचा, वरदान  मुझको देना ।
किसी का न दिल दिखाऊ, सच्चा विचार देना। ।

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मुहब्बत का पैगाम

          मुहब्बत का पैग़ाम 

          माना कि तुमसे मेरा 
          खून का रिश्ता नहीं 
           पर अहसास से तो
            जुड़े  हुये  हैं  हम 
             तेरी झिड़की पर 
           मेरा शांत  हो जाना 
            मेरी नाराजगी पर 
         तेरा खामोश हो जाना 
    असली मुहब्बत को दर्शाता है 
  क्योंकि रिश्ते को निभाने के लिए 
     शब्द नहीं,नीयत होनी चाहिए 
          एक-दूसरे के दर्द को 
         जज्बा को जज्बातों को 
                 समझना ही 
           मुहब्बत का पैगाम है 
       उन दोनों की शादी हो गई 
            इस समाचार से ही 
          विवाह संपन्न नहीं होता 
       जरूरत होती है,एक-दूसरे के 
       अंतर्मन को जानने-समझने  
            और सहयोग देने की 
                 भावनाओं की 

              सुजाता प्रिय समृद्धि

Tuesday, January 27, 2026

सपने

सपने 
                
                कभी 
             लड़कपन में 
        हमने जो देखे सपने 
   काश!अभी वे हो जाते अपने 
ऊँची उड़ान भरते हम भी नभ में 
  खेल तारों संग आँख-मिचौनी 
     फिर चढ़ कर चाँद के ऊपर 
         सारे जग की सैर कर
           आ लौट अपने घर 
              दादी- दादा को 
                 हाल सुनाते 
                    चाँद 
                  तारे की 
                बात बताते 
          नभ में कैसे वे रहते हैं 
      रात को कैसे चमका करते हैं 

           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Monday, January 26, 2026

१ दहेज ।9

जय मांँ शारदे 🙏🙏 💐💐
जय श्री गणेश 🙏🙏💐💐

दहेज (१)

वहाँ से खिसक गये। लड़कियों को बुलाकर वे अपनी बस में चढ़ाने लगे।मयंक ने देखा तो पागलों की भांति एक बार फिर अपनी सारी शक्ति संचित कर स्वयं को मुक्त कर लिया और उनकी तरफ लपका। लेकिन फिर उसे लोगों ने जकड़ लिया।वह उनकी बाहों से छुटने का जी तोड़ प्रयास कर रहा था।
इसी उपक्रम में उसकी नजरें छत पर चली गई जहांँ मुंडेर से झांकता उसे निरमा का सिर दिखा। क्या निरमा छत पर अकेली है ? उसकी छठी इंद्री उसे कुछ संकेत दे रही थी।एक बार फिर वह जोर लगाकर छुट गया और दौड़ कर सीढियांँ चढ़ने लगा।जब वह छत पर पहुंचा तो देखा निरमा छत की मुंडेर के निकट खड़ी है।वह धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगा।पर निरमा को उसके आगमन का एहसास तक नहीं हुआ था। उसने अपनी दोनों हथेलियांँ रेलिंग पर टिकाए और पैर उचकाकर रेलिंग पर चढ़ गई और फिर नीचे कूदने हेतु छलांग लगा दिए।
पर ,यह क्या ? वह कूद नहीं पाई सिर्फ लड़खड़ा कर रेलिंग पर ही अटक गई। रेलिंग की रगड़ से उसके वदन में कहीं-कहीं खरोंच भी लग गये।पर उसका उसे कोई परवाह नहीं।उसे लगा उसकी चुनरी किसी चीज में फँस गयी है। उसने हाथ बढ़ाकर उसे छुड़ाना चाहा पर उसका हाथ भी किसी ने थाम लिया।वह हड़बड़ा कर पीछे पलटी।देखा मयंक उसे हाथ पकड़कर खींच रहा था।
छोड़ दो मुझे मयंक उसने रोते हुए कहा।
मयंक बिना कुछ कहे उसे रेलिंग से नीचे उतार लिया था।
उसके चेहरे से कठोरता लुप्त हो गई और वहाँ बेचारगी का साम्राज्य स्थापित हो गया।
उसी समय बारात की बस और कारें स्टार्ट हुईं और सड़क पर चल दी। मयंक को ऐसा लगा वह गाड़ियांँ उसके सीने पर चल रही हैं।
छोड़ो मुझे मयंक !अब मैं जीकर क्या करूंगी ? निरमा बेचैनी भरे स्वर में बोल उठी।उसकी आँखों में आंँसुओं की मोटी परत थरथरा रही थी।सीसे -पारदर्शी उन आँसू- परत के पीछे निरमा की आँखों की सफेदी सुर्खी  में बदली नजर आ रही थी।
ठहरो निरमा!इन आँसुओं को गिराकर बर्बाद मत करना। मयंक तड़प कर बोल उठा।
अब किस दिन के लिए जमा करके रखने क हते हो आशु को ?
 मैं मयंक के लहू-लुहान दिल पर जोरदार गुस्सा पड़ा। निरमा की बोली से उसका समूचा वजूद थर्रा उठा। उसे याद आया शादी ठीक होने के बाद निरमा किसी बात पर रो पड़ी थी तो वह उसे चिढ़ाते हुए बोला था रो-रो कर आंसुओं को बर्बाद मत करो निरमा ? कहीं यह आसु बिल्कुल खत्म हो गया सो बिदाई के समय रोओगी भी नहीं ।
और निरमा भी अपने लजीले स्वभाव के विपरित बोल उठी थी- हंसने लगूंगी और क्या।
 मयंक पहले तो मुँह बनाया था फिर बोला यह भी ठीक ही रहेगा। अन्य लड़कियों से निराली रहेगी तुम्हारी विदाई ।
और निरमा खिलखिला कर हंस पड़ी थी ।
लेकिन मयंक की पैनी निगाहों ने उसकी आंखों की कोरों में छलकाए आंसुओं को भी देख लिया था ।लेकिन आज समय आने पर निरमा वह सुख के आंसू नहीं गिरा सकी। उसका दिल सिसक उठा । निरमा के ये आंसू कार की सीट पर गिरने चाहिए थे और गिर रहा है छत पर ।हिम्मत से काम लो निरमा! वह अपने आप इस प्रकार बुदबुदा उठा जैसे खुद को तसल्ली दे रहा हो।
 अब कहांँ से हिम्मत लाऊँ ? जबकि सारा हिम्मत जवाब दे गया निरमा सिसकती हुई बोली।अब तो मुझे मर जाने में ही भलाई है ।अच्छा हुआ जो चाचा नहीं रहे ।नहीं तो वह सहन नहीं कर पाते यह सब ।मुझे भी उन्हीं के पास जाना है। नहीं निरमा! तुम्हारे मर जाने से उन कुत्तों के सेहत में कोई गिरावट नहीं आने वाली ।तुम्हारे जैसे हजारों निरमा होने इस धरती पर अपने प्राण त्यागे हैं। पर इन दहेज लोभियों के जबड़े फैलते ही चले गए। उन निरमाओं की मृत्यु के साथ ही इन दानवों की काली करतूतें भी दफन होकर रह गई ।और तुम मर कर इनकी कृत्य को दफना दोगी। अब तुम एक नया अवतार लेकर इन असमाजिक तत्वों का नाश करोगी । इन्हें सबक सिखाओ कि इस दहेज- सागर में गोते लगाने का अंजाम कितना भयानक हो सकता है।इस दहेज- सागर में कितने बड़े-बड़े जीव अपना विशाल जबड़ा फैला कर घात लगाए हुए हैं। जो किसी भी क्षण अपने जबड़े मैं दबोचकर उसका नामोनिशान तक मिटा सकते हैं । निरमा पर उसकी बातों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उसकी मुठियां भींच गई थी और चेहरे पर ऐसी दृढता उत्पन्न हो गई थी जैसे वह दुनिया की किसी भी बड़ी से बड़ी शक्ति से टकराने का इरादा बना ली हो। उसने स्वीकारात्मक ढंग से धीरे से सिर हिलाया।ही मयंक उसका हाथ थाम कर सीढियों की तरफ बढ़ गया । अगले ही कुछ मिनटों में दोनों नीचे बारात लौटने से शोकाकुल लोगों को समझा कर ढांढस बंधा रहे थे।

दो ही छन्द

दो ही  छन्द 
15,11 पर यति 
मेरे मन की य़ह कामना,पूर्ण करो  भगवान। 
जो लगती अच्छी भावना,उनका रख दो मान।।
हम सब बालक नादान हैं, समझ न पाते बात। 
भाई-बंधु और मeet से, लड़ते हैं दिन-रात।।
छल व कपट जो सदा करे,उसपर कर विश्वास। 
अपने लोगों को दूर कर, बनते उनके दास। ।
मेरे दिल में शुभ प्रेम का,भर दो नव प्रकाश। ।
निश्छल प्रेम दो मुझे, लेकर आई आस।।
हम दिनों के तुम नाथ हो, हरो हमारी पीर। 
आए जो संकट की घड़ी, मन में रखूँ धीर। ।
आपके चरण में हम प्रभो,झुका रहे हैं माथ।
अब जीवन आप smvariye ,दुःख हर दीनानाथ। ।

Friday, January 16, 2026

ज़माना खराब है

11
                    कहते  हैं लोग  कि 
                     जमाना खराब है
                     सुनकर हमने भी 
                     ये माना खराब है
                     दोष  जमाने  को
                 सदा तुम मत दो दोस्तों 
            क्योंकि इस जमाने को खराब             
         हमारे द्वारा बनाया जाना खराब है
        जमाने से नहीं हम,सुन लो भाई मेरे !
       इस जमाने को तो, हमने-ही बनाया है 
       जन -जनता और जमाने का  यहाँ पर
        रिश्ता- नाता व दोस्ती  बड़ा पुराना है 
         अब सोंच लो! विचार लो जन सभी  
          किस तरह से सुंदर हमें बनाना है।      
            न कहना कि जमाना खराब है
               चल रे साथी संग मेरे चल

Thursday, January 15, 2026

राम (दोहे)

जय श्रीराम (दोहे)

दशरथ जी  के लालना, राम  बड़े थे वीर।
जीवों  पर  करते  दया, लड़ने  में  रणधीर।
मंझली  मांँ  ने द्वेष  से, दिलवाया वनवास।
पितृ आज्ञा पाये प्रभो,धर मन चले हुलास।।
मातु-पिता और गुरु के,चरणों में रख शीश
गुरु जनों को प्रणाम कर, लेकर वे आशीष।
छोटे भाई लखन जी,जोड़े दोनों हाथ।
बोले भैया आपके, मैं भी चलता साथ।
त्याग राजसी वसन को, पहने वल्कल अंग।
माता सीता भी चली, ख़ुश हो उनके संग।
वन-वन भटके साथ वे, खाते मूल व कंद।
छोटी-सी कुटिया बना,रहते ले आनन्द।
कपटी रावण ले गया, सीता को हर साथ।
एक न माना बात वो, रो कर जोड़ी हाथ।।
विकल हो तब राम-लखन,ढूंढे चारो ओर।
लेकिन सीता का वहाँ,मिला न कोई ठौर।।
जटायु घायल तब मिला, बतलाया यह बात।
सीता के गहने दिखा,झुका लिया वह माथ।।
वानर सेना ले बढ़े, प्रभु लंका की ओर।
रावण से जाकर किया, युद्ध बड़े घनघोर।
आये सीता मात ले, साथ अयोध्या धाम।
अवध वासी हँस-विहस,जपे राम का नाम।।
            '

Thursday, January 8, 2026

स्त्री मन

1,      स्त्री मन 

          उपेक्षा 
        अवहेलना, 
   तिरस्कार फटकार
       सहकर भी
          मन के 
   क्षोभ-भय-तृष्णा 
     को दमन कर 
रखती मन में कामना 
      परिवार की 
     सुख-समृद्धि 
   शांति-सुरक्षा की 
       पूरी करती
          मन्नतें 
   रख व्रत-उपवास 
    माँगती आशीष 
   आँचल फैलाकर 
       हे परमेश्वर!
 दीनानाथ! दया करो, 
     सब पाप हरो 
   भूल-चुक,गलती  
     सब माफ करो
   सबकी भला करो 

सुजाता प्रिय समृद्धि