Tuesday, April 9, 2019

झूला एक लगा दो माँ


झूला एक लगा दो माँ.........

आम पेड़ की डाली पर,
झूला एक लगा दो माँ।
पेंग बढ़ाकर नभ को छू लूँ,
मुझको जरा झूला दो माँ।

सिंदूरी लालिमा देखो,
आसमान में बिखरा है।
सूरज का मुखडा़ जैसे
नवदुुल्हन - सा बिखरा है।
मैं भी जग रोशन कर डालूं,
ऐसी लगन लगा दो माँ।

देखो कलियाँ क्यारी-क्यारी,
खिल- खिलकर मुसकाती हैं।
पुलकित हो हँस डाली-डाली,
हँसना हमें सीखाती हैं।
मैं भी फूलों-सी खिलकर जाऊँ
मुझको जरा हँसा दो माँ।

काली कोयल पंचम सुर में,
मीठा गाना गाती है।
भौरों की गुनगुनाहट ,
उसमें ताल मुसकाती है।
मैं भी कुछ तो मीठा गाऊँ,
ऐसी गीत सीखा दो माँ।

देखो बागो में पेड़ों की,
हरी- भरी सब डाली  है।
फूल-पेड़,वन- उपवन से,
धरती पर हरियाली है।
हरी- रहे धरती यह मेरी,
कुछ तो पेड़ लगा दो माँ।

10 comments:

  1. व्वाहहह...
    मैं भी कुछ तो मीठा गाऊँ,
    ऐसी गीत सीखा दो माँ।
    बेमिसाल...
    सादर...

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद भाई।सादर आभारी हूँ।

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  2. बेहतरीन..
    लिखते रहिए..
    सादर...

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    1. जी दादाजी सादर आभार उत्त्साहबर्धन एवं प्यार के लिए।

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १२ अप्रैल २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. बहुत- बहुत धन्यवाद स्वेता।पाँच लिंकों का आनंद पर मेरी रचना को साझा करने के लिए सबको दिल से आभार।

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  4. देखो बागो में पेड़ों की,
    हरी- भरी सब डाली है।
    फूल-पेड़,वन- उपवन से,
    धरती पर हरियाली है।
    हरी- रहे धरती यह मेरी,
    कुछ तो पेड़ लगा दो माँ।
    बहुत सुन्दर...

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    1. दिल की गहराइयों से आभार।सादर

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  5. आपको पढना एक सुखद अनुभव है

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