Monday, January 26, 2026

दो ही छन्द

दो ही  छन्द 
15,11 पर यति 
मेरे मन की य़ह कामना,पूर्ण करो  भगवान। 
जो लगती अच्छी भावना,उनका रख दो मान।।
हम सब बालक नादान हैं, समझ न पाते बात। 
भाई-बंधु और मeet से, लड़ते हैं दिन-रात।।
छल व कपट जो सदा करे,उसपर कर विश्वास। 
अपने लोगों को दूर कर, बनते उनके दास। ।
मेरे दिल में शुभ प्रेम का,भर दो नव प्रकाश। ।
निश्छल प्रेम दो मुझे, लेकर आई आस।।
हम दिनों के तुम नाथ हो, हरो हमारी पीर। 
आए जो संकट की घड़ी, मन में रखूँ धीर। ।
आपके चरण में हम प्रभो,झुका रहे हैं माथ।
अब जीवन आप smvariye ,दुःख हर दीनानाथ। ।

Friday, January 16, 2026

ज़माना खराब है

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                    कहते  हैं लोग  कि 
                     जमाना खराब है
                     सुनकर हमने भी 
                     ये माना खराब है
                     दोष  जमाने  को
                 सदा तुम मत दो दोस्तों 
            क्योंकि इस जमाने को खराब             
         हमारे द्वारा बनाया जाना खराब है
        जमाने से नहीं हम,सुन लो भाई मेरे !
       इस जमाने को तो, हमने-ही बनाया है 
       जन -जनता और जमाने का  यहाँ पर
        रिश्ता- नाता व दोस्ती  बड़ा पुराना है 
         अब सोंच लो! विचार लो जन सभी  
          किस तरह से सुंदर हमें बनाना है।      
            न कहना कि जमाना खराब है
               चल रे साथी संग मेरे चल

Thursday, January 15, 2026

राम (दोहे)

जय श्रीराम (दोहे)

दशरथ जी  के लालना, राम  बड़े थे वीर।
जीवों  पर  करते  दया, लड़ने  में  रणधीर।
मंझली  मांँ  ने द्वेष  से, दिलवाया वनवास।
पितृ आज्ञा पाये प्रभो,धर मन चले हुलास।।
मातु-पिता और गुरु के,चरणों में रख शीश
गुरु जनों को प्रणाम कर, लेकर वे आशीष।
छोटे भाई लखन जी,जोड़े दोनों हाथ।
बोले भैया आपके, मैं भी चलता साथ।
त्याग राजसी वसन को, पहने वल्कल अंग।
माता सीता भी चली, ख़ुश हो उनके संग।
वन-वन भटके साथ वे, खाते मूल व कंद।
छोटी-सी कुटिया बना,रहते ले आनन्द।
कपटी रावण ले गया, सीता को हर साथ।
एक न माना बात वो, रो कर जोड़ी हाथ।।
विकल हो तब राम-लखन,ढूंढे चारो ओर।
लेकिन सीता का वहाँ,मिला न कोई ठौर।।
जटायु घायल तब मिला, बतलाया यह बात।
सीता के गहने दिखा,झुका लिया वह माथ।।
वानर सेना ले बढ़े, प्रभु लंका की ओर।
रावण से जाकर किया, युद्ध बड़े घनघोर।
आये सीता मात ले, साथ अयोध्या धाम।
अवध वासी हँस-विहस,जपे राम का नाम।।
            '

Thursday, January 8, 2026

स्त्री मन

1,      स्त्री मन 

          उपेक्षा 
        अवहेलना, 
   तिरस्कार फटकार
       सहकर भी
          मन के 
   क्षोभ-भय-तृष्णा 
     को दमन कर 
रखती मन में कामना 
      परिवार की 
     सुख-समृद्धि 
   शांति-सुरक्षा की 
       पूरी करती
          मन्नतें 
   रख व्रत-उपवास 
    माँगती आशीष 
   आँचल फैलाकर 
       हे परमेश्वर!
 दीनानाथ! दया करो, 
     सब पाप हरो 
   भूल-चुक,गलती  
     सब माफ करो
   सबकी भला करो 

सुजाता प्रिय समृद्धि

Sunday, December 14, 2025

मौन

मैं             मैं मौन
             मौन     हूँ 
         मौन  रहती  हूँ 
     मौन रहना पङता है
   मौन रहने की आदत है
 पहले नहीं,अब हो गई  है
लेकिन अगर मेरा यह मौन
जिस दिन मुखर हो जाएगा
 तो न जाने कितने ही राज 
   खुल कर आएँगे  सामने 
    जो अभी तिलिस्म   के
       भीतर गुनहगार   है
         मानो गुमशुदा   है
          चाहे गुमनाम  है
            या गुमसुम  है
              गुमराह   है
                गौन    है
                 गुम   है

कौन

1          कौन
         कौन   हो
       तुम कौन हो
     बताते क्यों नहीं 
    भला क्यों मौन हो
  कहाँ से  आये हो तुम
 कहाँ  है  तुमको   जाना 
कहाँ  है  तुम्हारा घर-बार
 क्या  है  पता   ठिकाना
  आज  तक अभी  तक
      सिर्फ  और  सिर्फ 
        दूसरों  के  नाम 
           से  पहचान 
            है तुम्हारी
               फिर 
              इतनी 
          अकङ  क्यों
         चाल  में ऐठन
       बोली में तीखापन 
    नजरों में तीर-सी चुभन

Monday, December 8, 2025

गणेश वंदना (विधाता छंद)

गणेश वंदना (विधाता छंद)

गजानन जी पधारो तुम, मुझे  विश्वास  तुम  पर है।
अभी आजा हमारे घर, न तुझ बिन शोभता घर है।।

भला  किसको बुलाऊंँ मैं, मुझे  बस आस है  तेरी।
जरा आकर  नजर फेरो, करो  ना आज  तुम देरी।।

लगाकर कूश का आसन, बिठाऊँ आपको उसपर।
नहाकर  साफ  जल से  मैं, सजाकर रेशमी चादर।।

लगाऊंँ  भाल  पर  चंदन, चढ़ाऊँ  पुष्प की  माला।
लगाऊंँ  भोग  लड्डू  का, पिलाऊँ  दूध का  प्याला।।

चरण  तेरे   पडूँ   देवा, जरा  मुझ  पर दया करना।
अगर पथ में रुकावट हो,सुनो उसको अभी हरना।।

बना दो आज बिगड़ी तुम, मिटा दो वेदना मन की।
पकड़  पतवार  हाथों से, उबारो  नाव  जीवन की।।

मुझे  आशीष  दो  इतना, सभी   पूरे मनोरथ  हों।
मुझे  मंजिल  मिले  मेरी, रुके  कोई नहीं  पथ हों।।

मुझे  वरदान  दो  इतना, करूँ सबकी  भलाई  मैं।
कभी भूलूं  नहीं  करना, भले - जन की बड़ाई मैं।।

               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'