Friday, April 9, 2021

संकल्प हमारा



हम देश को बनाएंगे, गुलशन से भी प्यारा।
बन जाए हिन्द मेरा, संसार में न्यारा।

इसकी गली-गली में,बसे प्यार के ही घर हों।
बसी प्यार की ही बस्ती,बसे प्यार के नगर हों।
पंगडंडियां प्यार की हों,और प्यार के डगर हों।
मंदिर भी प्यार की हो, पूजा जिधर-जिधर हो।
स्वर प्यार के ही गूंजे, संकल्प हमारा।
बन जाए हिंद मेरा..............

इसके वन-उपवन में,लगे वृक्ष प्यार के हों।
पेड़ों की डालियों में,लगे फल भी प्यार के हों ‌।
फुलवारियों में खिलती क‌लियां भी प्यार की हो।
पर्वतों पर इसकी, चोटियां भी प्यार की हों।
नदियों के दोनों कूल में,बहे प्रेम की धारा।
बन जाए हिंद मेरा.................

हम रोशनी करेंगे, प्यार के दिये जलाकर।
दूर होगा अब अंधेरा, नफरतों को मिटाकर।
हम भेद-भाव छोड़े,मन से सभी हटाकर।
दुखित-पीड़ित जनों को,अपने गले लगाकर।
हम एक सुर में बोलें, मिल्लत का नारा।
बन जाए हिंद मेरा...................

हम मातृ भू की मस्तक, सत्कर्म से मढ़ेंगे।
पग-पग कदम मिलाकर,ऊपर तलक चढ़ेंगे।
जब राह ना मिले तो,नव पंथ हम गढ़ेंगे।
हम साथ-साथ चलकर, मंजिल तरफ बढ़ेंगे।
अपने सभी जनों को, देकर के हम सहारा।
बन जाए हिंद मेरा.................
               सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
     स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, April 7, 2021

महक की जरूरत



फूल सुंदर बहुत है चमन में,
    बस महक की जरूरत उन्हें।
 रंग देकर बनाया विधाता,
      है बहुत खूबसूरत उन्हें।

गुल महक के बिना है अधूरा,
       चाहे जितना वो सुंदर दिखे।
 दूर रहती हैं उनसे तितलियां,
         चाहे रूप का समंदर दिखे।
तान भौरों की हो जाती धीमी,
           फूल लगता है मूरत उन्हें।
फूल सुंदर बहुत है चमन में,
       बस महक की जरूरत उन्हें।

जब बहारों का मौसम है आता,
     तो फिज़ा में है गुल मुस्कुराता।
एक भीनी-सी खुशबू हो जिसमें,
    गुल वही है सभी जन को भाता।
रूप चाहे हो जितना भी प्यारा,
           गुण से भाता है सूरत उन्हें।
फूल सुंदर बहुत है चमन में,
         बस महक की जरूरत उन्हें।

फूल तब ही नजर हमको आता,
      जब उसके निकट हम हैं जाते।
पर महक है स्वयं उड़ के आती,
       हम गंध से सुवासित हो जाते।
जिन फूलों में गुण हो महक की,
        लोग कहते हैं खूबसूरत उन्हें।
फूल सुंदर बहुत है चमन में,
         बस महक की जरूरत उन्हें।

           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
              स्वरचित मौलिक

कर्म बदलते भाग्य



कर्म किए जा लगन लगाकर, करके तू ये आस।
कर्म हमारे भाग्य बदलते,मन में रख विश्वास।

कर्म हमारा सच्चा साथी,हर पल चलता संग।
मेहनत से जो काम करें हम,लाता एक दिन रंग।
कर्म के पथ पर बढ़ते जाओ,मत कर मन उदास।
कर्म हमारे भाग्य बदलते,मन में रख विश्वास।

कर्म करो तो इक दिन तुझको मिलेगा इसका फल।
कर्म करने वाले का होता,जीवन सदा सफल।
सफलता तेरे पग चूमेगी, भर जीवन में  उल्लास।
कर्म हमारे भाग्य बदलते,मन में रख विश्वास।

कर्म को अपने बुरा न करना,कर्म ही जीवन सार।
जीवन जीने का मर्म यही है,करो कर्म से प्यार।
कर्म हमारा जीवन धन है,कर्म के हम हैं दास।
कर्म हमारे भाग्य बदलते,मन में रख विश्वास।
                स्वरचित, मौलिक
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
                

Friday, April 2, 2021

माफ करो मेरी गुस्ताखी



अपने चेहरे पर रखकर हाथ।
मुनियां रानी ने ढक लीं आंख।

जिज्ञासा वश कलम को खोली।
स्याही को कापी  पर उढ़ेली।

तभी वहां पर पिताजी आये।
शरारत देख फटकार लगाए।

बिटिया तुने क्या कर डाला।
सारे पन्ने को कर दी काला।

डर से उसका मन घबराया।
नयनों में उसके भय समाया।

अनजाने में काम बिगाड़ी।
कलम से गिरी स्याही सारी।

मन-ही-मन में बोली बात।
छुपी नज़रों में थी जज़्बात।

अपराध बोध मन में आया।
उसने दांतों से जीभ दबाया।

आंखें ढक कर मांगी माफी।
पिताजी माफ़ करो गुस्ताखी।

देख पिता का मन भरमाया।
उठा बिटिया को गले लगाया।

       सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
         स्वरचित, मौलिक

हम भारत की बेटियां हैं



हम भारत की बेटियाँ हैं , इसका मान  बढ़ाएँगे।
देश की रक्षा के निमित हम,हँसकर प्राण गवाँएगें।
कोई भारत माँ पर अपनी,बुरी नजर अब डालेगा।
इसकी धरती पर कब्जे की मन में सपने पालेगा।
हम संहार के लिए खड्ग ले रणचण्डी बन जायेंगे।
देश की रक्षा के निमित्त...........।
हम सती के पुण्य धरोहर, माता दुर्गा की अवतार।
हम मैदां में डटकर रहती,लेकर हाथ खड्ग-तलवार।
हम काली कपालिनी बनकर रिपुदल को मार भगाएंगे।
देश की रक्षा के निमित्त....................।
अब किसी की गुलामी, हमको है स्वीकार नहीं।
मेरी पावन धरती पर,किसी का हो अधिकार नहीं।
अपनी जौहर की ज्वाला में दुश्मन को जलाएँगे।
देश की रक्षा के निमित .................।
हम भारत की नूतन आशा,मन में रखती हूं उल्लास।
कर्मपथ पर बढ़ती जाती, लेकर मन में दृढ़ विश्वास।
हम देश के पावन पन्ने पर नव इतिहास रचाएंगे।
देश की रक्षा के निमित्त...................।
सीमा की रक्षा की खातिर,हम प्रहरी बन जाएगें।
अपने घर के वीरों को भी,अपने साथ लगाएँगे।
हम चुड़ावत की हाड़ा बन,मुण्डमाल बन जाएँगे।
देश की रक्षा के निमित................।

          सुजाता प्रिय'समृद्धि'
     स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, March 31, 2021

आजादी की ओर बढ़ो



आजादी की ओर बढ़ो तुम,                   
                       उठो नारियों भारत की।
झूठे बंधन तोड़ बढ़ो तुम,
                      उठो नारियों भारत की।

कपटी-रावण हर ले जाए,
                         ऐसे पल मत आने दे।
राम अग्नि में तुझे जलाए, 
                         ऐसे पल मत आने दे।
प्रतिकार मुंह खोल करो तुम,
                      उठो नारियों भारत की।

चीर- हरण करे दुशासन, 
                          ऐसे पल मत आने दे।
पत्थर तुमको कर दे गौतम, 
                          ऐसे पल मत आने दे।
बलात् अंधी मत बनो गंधारी-सी 
                        उठो नारियों भारत की।

असुरों को मार गिराने वाली,
                        दुर्गा-सी बन जाओ तुम।
यमराज से टकराने वाली, 
                    सावित्री बन दिखाओ तुम।
अहिल्या-सी पालने डाल दुष्टों को,
                        उठो नारियों भारत की।

गार्गी-सी रच वेद ऋचाएं, 
                        मैत्रेई-सी बन ब्रह्मज्ञानी।
शबरी-सी बन जा सुहृदया,
                      यशोदा मां-सी बलिदानी।
बनो अरूंधति-सी आदर्श देवी,
                        उठो नारियों भारत की।

स्वतंत्र भारत में भी तेरे, 
                         जंजीर पड़ी है पांव में।
क्यों भोली-नादान बन बैठी,
                            डुबने वाली नाव में।
घूंघट के पट खोल बढ़ो तुम,
                       उठो नारियों भारत की।

मत स्वयं को तुम कैद करो, 
                        कुरीति की सलाखों में।
दिल करुणा से भरा हुआ है,
                          नीर भरा है आंखों में।
अंधविश्वास को पीछे छोड़ बढ़ो तुम,
                        उठो नारियों भारत की।

आजादी तुम अगर चाहती,
                 कुछ करतब दिखलाना होगा।
अंग्रेजों से टकराने वाली, 
                       लक्ष्मी-सी टकराना होगा।
हैवानों से लो डटकर टक्कर,
                          उठो नारियों भारत की।
              सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

Tuesday, March 30, 2021

होली के रंग, कोरोना के संग



हम सब होली खेले भाई,रखकर दो गज दूरी।
गुलाल के बदले मुखड़े पर,मास्क लगा जरूरी।

पिचकारी के बदले ले सेनिटाइजर की बोतल।
हैंडवाश साथ में रखी थी,भरी सीसी लोकल।

कोरोना से भयभीत दूर से, खेल रहे थे होली।
दूर रहें भाई-मित्रों से, नहीं बनाए हम टोली।

पिचकारी,गुव्वारे से ही हम पड़ाए सबको रंग।
दूर से गुलाल उड़ाए हम, रहे न किसी के संग।

नानी के दहीबड़े और पुआ, आनलाईन ही खाए।
फेसबुक पर होली मिलन के गीत झूमकर गाए।

बनी यादगार इस बार की होली,कोरोना के संग।
मटमैला गुलाल लगाऔ बड़ा ही फीका सब रंग।

           सुजाता प्रिय 'समृद्धि'
             स्वरचित, मौलिक