Tuesday, April 1, 2025

जगत जननी जगदम्बा (विधाता छंद आधारित)

जगत जननी  जगदम्बा 
विधा -विधाता छंद 

जगत जननी सुनो विनती,तिहारे द्वार आई हूँ।
चमेली फूल की अम्बे, बनाकर हार लाई हूंँ।।

उठाकर हाथ से माता,गले में डाल दूंँ तेरे।
सजा दूंँ हाथ में चूड़ा,जड़ा कंगन लगा घेरे।।

सितारे-मोतियों से मैं,सजाई चुन्नरी तेरी।
सजा दूँ आज सिर पर मैं,जगी इच्छा यही मेरी।।

सजाऊँ  मांग  में  टीका,लगाऊँ केश में गजरा।
सजाऊंँ माथ पर बिंदी,लगाऊँ आँख में कजरा।।

लगाऊँ भोग किसमिस का,सुगंधित खीर औ मेवा।
जलाऊँ स्वर्ण का दीपक,करूँ आठों पहर सेवा।।

उसी मंदिर सदा जाऊंँ, जहांँ मैया सदा राजे।
भजन औ आरती गाऊंँ, बजाऊँ ढोल औ बाजे ।।

चरण तेरे पकड़ अम्बे,नमन में हाथ जोड़ूंँ मैं।
मुझे वरदान ऐसा दो, ग्रहण से मुख न मोड़ूंँ मैं।।

                 सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

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