Wednesday, April 1, 2026

चोट (लघुकथा)

चोट (लघुकथा) 

पत्नी की तीखी बोली से संजीव का मन बड़ा आहत था। इतनी बेरूखी से सबके सामने डांँटेगी । यह तो कभी उसने सोचा.......... ।क्या हो गया उसे ?
 इतना भी नहीं सोंचा ऐसे अपमान भरे लहजे से मेरे दिल पर क्या..... ।
यदि मैं सबके सामने उसे ऐसे ही अपमानित...............? 
"करते तो हो........ !  हमेशा... .....।
हर जगह.........।हर समय ,......।
बडो़ं के सामने...... ।
छोटों के............।सहेलियों .......।
पडोसियों........।परिवारों,
सहकर्मियों,नौकरों..... ।"
उसने एक बार तुमसे........ ।
अपमान से दिल लहू-लुहान हो जाता है....... ।लेकिन वह हमेशा आसुओं के घूट पीकर  ........है।तो तुम क्यों विचलित.... ?"
तेरे जैसा उसका दिल..........? नहीं- नहीं! अपनी अंतरात्मा की फटकार सुन वह ............।
होंठों से बुदबुदाते हुए...
..मुझे भी. उसके सम्मान का...............। 

  सुजाता प्रिय 'समृद्धि'